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कानून बदलने का समय
अरुण नेहरू
Updated Fri, 01 Feb 2013 09:31 PM IST
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फरवरी का महीना शुरू हो चुका है और आगामी आम चुनाव में अभी 15 महीने का समय बाकी है। इस महीने का ज्यादातर समय आर्थिक चर्चा में ही बीतेगा। हमारे सामने बहुत मुश्किल आर्थिक हालात हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था की बुरी स्थिति को देखते हुए लगता है कि आगे संकट बढ़ेगा ही और तेल की कीमतों में शीघ्र ही इजाफा हो सकता है। जहां तक संभव हो, हमें अपने बजट को संतुलित बनाना होगा, क्योंकि आज वित्तीय स्थिरता के संकट से हर कोई जूझ रहा है।
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राजनीतिक दुर्घटनाएं लगातार हमारे घरेलू मामलों पर हावी हैं, क्योंकि हम 'जादुई इलाज' ढूंढते हैं। निर्भया गैंगरेप मामले के बाद पूरी सामाजिक व्यवस्था में उथल-पुथल के बावजूद रोज ऐसी त्रासदियां हो रही हैं। महिलाओं के खिलाफ हर तरह के अपराध लगातार हो रहे हैं, लेकिन फास्ट ट्रैक कोर्ट शुरू करके हमने इससे निपटने की दिशा में एक छोटा-सा कदम उठाया है। हां, पूरे तंत्र में जागरूकता जरूर फैली है और ऐसी घटनाओं का प्रतिरोध होते हम देख सकते हैं। वर्मा कमेटी ने बेशक अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। लेकिन दीर्घस्थायी समाधान के लिए उसके सुझावों पर बहस और चर्चा जरूरी है।
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इसकी वजह यह है कि इस तरह की स्थितियों में पारंपरिक ज्ञान काम नहीं करता और न ही कोई कानून पत्थर पर लिखी लकीर होता है कि उसे बदला न जा सके। तथ्य यह है कि अब जनमत का एक बड़ा हिस्सा मृत्युदंड और किशोर अपराधियों के खिलाफ सख्त कानून बनाने के पक्ष में है।
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निर्भया के साथ हुई बर्बरता और उस किशोर अपराधी की विकृत मानसिकता की भला कोई कैसे अनदेखी कर सकता है! आम आदमी को आमूलचूल परिवर्तन से कम कुछ भी मंजूर नहीं है। कानून की अवमानना का भय भी उसे खामोश नहीं कर सकता। फिर जनमत की ताकत के विरुद्ध कोई कैसे जा सकता है! हालांकि औरतों के खिलाफ बर्बरता इससे पहले भी देखी गई है, पर निर्भया के मामले ने लोगों को अंदर तक इतना हिला दिया है कि वे चुप नहीं बैठने वाले।
वर्मा कमेटी की रिपोर्ट पर बहस सुनकर मैं हतप्रभ रह गया। किशोर अपराधियों के हित में काम कर चुके लोगों के लिए मेरे मन में गहरा सम्मान है। लेकिन इस तरह के हर मामले की तह में जाने और खासकर निर्भया की घटना के आलोक में देखें, तो पता चलता है कि न्याय व्यवस्था में कितनी गहरी खामियां हैं। यह स्वीकार लेने में हर्ज नहीं है कि इससे पहले एकाधिक बार स्त्री-विरोधी बर्बरता को चुपचाप सह लेने के हम सब अपराधी हैं।
अब हर कोई जवाबदेह है, लेकिन कुछ लोगों पर यह जवाबदेही ज्यादा है। हमारी आदत बन गई है कि हम हर हादसे के बाद सरकार और पुलिस-प्रशासन को निशाना बनाते हैं, लेकिन अब न्यायपालिका को भी जिम्मेदार बताने का समय आ गया है। हर मुद्दे पर उसका निर्णय महत्वपूर्ण भी होता है और स्वीकार्य भी, पर अभी जो जनमत है, उसमें न्यायपालिका को मजबूती से अपनी भूमिका तय करनी पड़ेगी।
लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और भाजपा के अंदरूनी मामलों पर विचार करने पर हम पाते हैं कि कांग्रेस में शीर्ष पर कम विवाद हैं, लेकिन राज्यों में उसे अन्य दलों से दोस्ती एवं प्रभावी नेता ढूंढने के लिए मेहनत करनी होगी। धरातल पर यह काम करना आसान नहीं है, पर इस दिशा में कांग्रेस की कोशिशें दिखाई दे रही हैं। दूसरी ओर, भाजपा में शीर्ष पर विवाद है, जो उसे नुकसान ही पहुंचाएगा। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस एवं भाजपा ने मिलकर 320 सीटें जीती थीं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि 2014 में वे 270 से ज्यादा सीटें जीत पाएंगी। शायद गठबंधन ही इनका भविष्य तय करेंगे।
राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, और यह उथल-पुथल क्षेत्रीय दलों में कुछ ज्यादा ही हो सकती है। आंध्र प्रदेश या कर्नाटक की स्थिति से हम वाकिफ हैं, लेकिन क्या कोई बिहार के भावी रुझानों के बारे में बता सकता है? क्या वहां जद(यू) एवं भाजपा मिलकर चुनाव लड़ेंगे या अलग-अलग? या क्या हम राजद और लोजपा को फिर से वापसी करते हुए देख सकते हैं, और क्या वहां कांग्रेस 'नया' गठजोड़ करेगी?
हम इसे नई बोतल में पुरानी शराब कहकर खारिज कर सकते हैं, क्योंकि लालू प्रसाद और रामविलास पासवान भारी भीड़ खींच रहे हैं। मुझे लगता है कि बिहार में हमें एक-दो चौंकाने वाली घटनाएं देखने को मिलेंगी। उत्तर प्रदेश (80 सीट), आंध्र प्रदेश (42 सीट), तमिलनाडु (40 सीट), पश्चिम बंगाल (42 सीट), महाराष्ट्र (48 सीट) और कर्नाटक (26 सीट) की घटनाओं पर नजर डालिए। इन राज्यों में 300 से ज्यादा सीटे हैं। क्या इस समय भावी गठजोड़ का संकेत दिया जा सकता है?
हम सरल हल ढूंढते हैं, लेकिन राजनीति का गणित अलग होता है। हमे सावधानीपूर्वक आकलन करना चाहिए और जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालने से बचना चाहिए। एक बात के बारे में मैं स्पष्ट हूं, वह यह कि जब हम हर राज्य की समीक्षा करेंगे, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि राजनीतिक मैत्री अल्पकालीन रही है और एक वर्ष से ज्यादा समय तक जारी रहने वाले रुझानों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। चूंकि अगले लोकसभा चुनाव में अभी एक साल से ज्यादा का वक्त बाकी है, इसलिए कह सकते हैं कि मैदान पूरी तरह खुला है।