यह एक छोटी शुरुआत ही है
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बीते तीन साल से सरकार महंगाई पर अंकुश लगाने की नाकाम कोशिश कर रही है। इसमें भी खाद्य महंगाई दर अब भी दो अंकों में बनी हुई है। इसे लेकर पिछले कई साल से नीतिगत बदलावों का जो मंथन चल रहा था, उसमें सबसे बड़े नीतिगत उपाय का स्थान खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ने ले लिया। जिस दिन इसके विरोध में विपक्षी दलों ने भारत बंद का आयोजन किया, उसी दिन सरकार ने इसे लागू करने की अधिसूचना जारी कर इस पर अडिग रहने के अपने इरादे साफ कर दिए। इसे यूपीए सरकार के सबसे बड़े आर्थिक सुधार के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इसे बहुत महत्वाकांक्षी कदम के बजाय एक छोटी शुरुआत के रूप में देखें, तो बेहतर होगा।
अधिसूचना में जो शर्तें रखी गई हैं, उनके मुताबिक रिटेल क्षेत्र में कारोबार करने वाली कंपनी में विदेशी कंपनियां 51 फीसदी निवेश कर सकती हैं, लेकिन ऑनलाइन ट्रेडिंग नहीं कर सकतीं। उन्हें भारतीय लघु उद्योगों से 30 फीसदी सामान खरीदना होगा, लेकिन यह शर्त पूरी करने के लिए पांच साल का समय मिलेगा। कम से कम 10 करोड़ डॉलर (करीब 500 करोड़ रुपये) का निवेश करना होगा और इसका आधा हिस्सा बैकएंड ऑपरेशन में लगाना होगा। सरकार के मुताबिक, इससे कृषि कारोबार सुधरेगा, किसानों को उत्पादों का सही दाम मिलेगा, बिचौलिये कम होंगे, ग्राहकों को सही कीमत पर उत्पाद मिलेंगे, संगठित क्षेत्र में नए रोजगारों का सृजन होगा और बरबाद होते कृषि उत्पाद बचेंगे, जिससे आपूर्ति बढ़ेगी।
इन दावों से इनकार नहीं। पर तथ्य यह है कि शॉप्स ऐंड इस्टैब्लिशमेंट ऐक्ट के तहत राज्य ही रिटेल कंपनियों को कारोबार की इजाजत दे सकते हैं। इस समय 10 राज्य और केंद्र शासित क्षेत्र ही इसके लिए तैयार हैं। केवल अनुमति देने से काम चलने वाला नहीं। कृषि कारोबार में सुधार के नाम पर सरकार अभी तक कुछ नहीं कर सकी है, क्योंकि इसमें सबसे बड़ी भूमिका एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) ऐक्ट की है, जो हर राज्य का अपना कानून है। जब तक इस कानून में कोई बदलाव नहीं होगा, तब तक कंपनियां किसानों से सीधे खरीद नहीं कर सकतीं।
एक मंडी एरिया भी होता है, जो एक ब्लॉक या तालुका को मिलाकर बनता है और उस मंडी समिति के नियम-कायदे इस पर लागू होते हैं। यह प्रक्रिया राज्य सरकारों के लिए राजस्व का स्रोत भी है, इसलिए उनके लिए इसे तुरंत निरस्त करना संभव नहीं होगा। ऐसा भी नहीं कि एपीएमसी ऐक्ट खलनायक ही है। सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था लागू करने में इस ऐक्ट की अहम भूमिका है। बिहार जैसे राज्य भी हैं, जहां मंडी व्यवस्था है ही नहीं, लेकिन वहां के किसानों को निजी क्षेत्र से आज तक कोई क्रांतिकारी फायदा मिला हो, इसका सुबूत नहीं मिलता।
कंपनियों के सामने एक बड़ी समस्या समान गुणवत्ता वाले उत्पाद की ज्यादा मात्रा जुटाने की होगी, क्योंकि भारत में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील की तरह हजारों एकड़ की जोत वाले किसान नहीं है। यहां 90 फीसदी किसान ऐसे हैं, जिनकी जोत का आकार एक हेक्टेयर से भी कम है। ऐसे में बड़ी कंपनियां कृषि उत्पाद के लिए अपना एजेंट नियुक्त करेंगी। पर यह एजेंट आढ़तिया से अलग कैसे होगा, यह बड़ी चुनौती है। एक उपाय ठेका खेती का है। पर करीब एक दशक पहले पंजाब और हरियाणा में इसकी जो शुरुआत हुई थी, उसके नतीजे अच्छे नहीं रहे।
यह सही मौका है कि कृषि मंत्रालय की स्मॉल फारमर्स एग्री बिजनेस कंर्सोटियम योजना के तहत उत्पादक कंपनी बनाकर किसानों को जोड़ा जाए और उन्हें इन कंपनियों के साथ करार का मौका दिया जाए। वहीं जहां संभव हो, वहां सहकारिता के जरिये किसानों के समूह खड़े किए जाएं। इससे जहां बड़ी कंपनियों को एक साथ अधिक कृषि उत्पाद मिल सकेंगे, वहीं छोटे किसान संगठित होकर बेहतर कीमत के लिए सौदेबाजी कर सकेंगे।
अभी एफडीआई की इजाजत वाले देश के 53 शहरों में ही ये कंपनियां अपने वितरण केंद्र खोलेंगी और अपने कारोबार की जरूरत के आधार पर क्षमता स्थापित करेंगी। जरूरी नहीं कि ये शुरू में ही लाखों टन की क्षमता स्थापित कर लें। हालांकि कुछ घरेलू कंपनियां इसकी शुरुआत कर चुकी हैं। अडानी एग्रीफेश ने हिमाचल में 15,000 टन की कंट्रोल्ड टेंपरेचर स्टोरेज क्षमता स्थापित की है, तो कोनकोर के पास 50,000 टन की क्षमता है। अभी इस क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा। इसलिए एफडीआई का फायदा देश के करीब 10 करोड़ किसानों को रातोंरात मिलेगा, इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए।
असल में केवल एफडीआई कृषि क्षेत्र की बेहतरी की संजीवनी नहीं है। सरकार को कृषि विपणन सुधारों पर नीति साफ करनी चाहिए। इसमें पूरे देश को बाजार के रूप में स्थापित करना सबसे अहम है। वहीं इनके आयात-निर्यात की तदर्थ नीति कृषि क्षेत्र का सबसे बड़ा नुकसान कर रही है, क्योंकि उद्योग जगत फैसलों को सीधे प्रभावित करते रहे हैं। जहां तक किसानों का सवाल है, तो नीतियों के मोरचे पर उनकी राय नहीं ली जा रही, क्योंकि उनका बेहतर प्रतिनिधित्व करने वाले और उनके बीच मजबूत पैठ वाले संगठन देश में नहीं बचे हैं। कॉरपोरेट के इशारों पर काम करने वाले एनजीओ सरीखे संगठन ही इस समय किसानों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जिनके हित किसानों के बजाय कहीं और हैं। सरकार ने उदारीकरण के दो दशक बाद कृषि को सुधारों के एजेंडा में शामिल किया है, पर बेहतर होगा कि टुकड़ों के बजाय वह इसे समग्र रूप में लागू करे।