{"_id":"6adec8f5493fbf24d6079909","slug":"issue-of-sugarcane-farmers-crisis-despite-harvest-worth-one-lakh-crore-raising-questions-natural-2026-10-26","type":"story","status":"publish","title_hn":"गन्ना किसानों के हितों का सवाल: एक लाख करोड़ की पैदावार पर भी संकट से जूझ रहे अन्नदाता, सवाल उठना लाजिमी है","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
गन्ना किसानों के हितों का सवाल: एक लाख करोड़ की पैदावार पर भी संकट से जूझ रहे अन्नदाता, सवाल उठना लाजिमी है
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
गन्ना किसान (फाइल)
- फोटो :
ANI
विस्तार
मार्च, 2027 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब समेत कई गन्ना उत्पादक राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में गन्ने का उचित मूल्य व किसानों के भुगतान का मुद्दा फिर चर्चा के केंद्र में है। अकेले उत्तर प्रदेश के करीब 40 जिलों में गन्ने की खेती होती है। भारत विश्व का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक एवं उपभोक्ता है और वर्तमान में दूसरे नंबर का निर्यातक भी है। भारत में पांच करोड़ किसान और 50 लाख कुशल एवं अकुशल मजदूर इस उद्योग से अपनी आजीविका चलाते हैं। यह उद्योग सालाना एक लाख करोड़ रुपये की आय पैदा करता है। इसके बावजूद, गन्ने की खेती करने वाले किसानों के सामने लागत, उचित मूल्य और समय पर भुगतान जैसी समस्याएं बनी हुई हैं।
कई किसान संगठनों ने गन्ने का लाभकारी मूल्य 500 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग की है। कर्नाटक और महाराष्ट्र के किसान भी आंदोलन कर रहे हैं। इस बीच, कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने केंद्रीय कृषि मंत्री को पत्र लिखकर चीनी का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) संशोधित करने, घरेलू और व्यावसायिक चीनी के लिए अलग-अलग मूल्य तय करने तथा मिलों की क्षमता के अनुसार एथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चा माल आवंटित करने की मांग की है। वहीं, उत्तर भारत में भी गन्ने का मूल्य बढ़ाने की मांग की गई है। केंद्र सरकार उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) तय करती है, जबकि राज्य सरकारें राज्य परामर्शित मूल्य (एसएपी) घोषित करती हैं।
1991 में उदारीकरण और निजीकरण की प्रक्रिया तेज होने का असर इस क्षेत्र पर भी पड़ा। इसके बाद सरकार ने इसे सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के लिए समय-समय पर कई समितियां बनाईं। 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने रंगराजन समिति का गठन किया। इसकी सिफारिशों के आधार पर अप्रैल, 2013 में केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने चीनी उद्योग के नियंत्रण में बड़े बदलाव किए। इसके तहत चीनी मिलों को लेवी चीनी की अनिवार्य व्यवस्था से मुक्त कर दिया गया और बाजार में चीनी जारी करने की मात्रा व समय तय करने की सरकारी व्यवस्था भी समाप्त कर दी गई।
पिछले दिनों केंद्र सरकार ने नीति आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. रमेश चंद की अध्यक्षता में गन्ना किसानों की मांगों व चीनी के एमएसपी पर विचार करने के लिए समिति गठित की है। हालांकि, किसान संगठनों ने इसके गठन का विरोध किया। उनका आरोप है कि अध्यक्ष ने गन्ना किसानों को एसएपी नहीं देने की सिफारिश की है। उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए एसएपी खास महत्व रखता है, क्योंकि राज्य में गन्ने का मूल्य अक्सर केंद्र सरकार के एफआरपी से अधिक तय किया जाता है। किसान संगठनों के अनुसार, समिति में कोई किसान प्रतिनिधि भी नामित नहीं किया गया है। उन्होंने किसानों को मिलने वाले मूल्य को चीनी मिलों की वित्तीय व्यवहार्यता से जोड़ने पर भी ऐतराज जताया है। तर्क है कि इससे मिल मालिकों का प्रभाव बढ़ेगा।
गन्ना पेराई का सीजन शुरू हो चुका है, पर सरकार ने अभी तक समर्थन मूल्य घोषित नहीं किया है। मिल मालिकों की ओर से भुगतान में देरी और सरकारी ढिलाई के कारण किसानों की मुश्किलें बढ़ रही हैं। हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद, मिल मालिक समय पर भुगतान करने से बचते हैं। किसानों को अपनी उपज का बकाया पाने के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है। हालांकि, ‘शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर, 1966’ (भार्गव फॉर्मूला) के तहत मिल मालिकों को 14 दिनों में गन्ने का भुगतान करना और देरी पर 15 फीसदी सालाना ब्याज देना जरूर है, पर मिलीभगत और सरकारी ढिलाई के कारण इसका पालन नहीं होता। इससे किसानों की आत्महत्या के समाचार सुनने को मिलते हैं। गन्ना किसान आंदोलन के नेता सरदार वीएम सिंह की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ का एक निर्णय किसानों के पक्ष में आ चुका है। टाटा इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले वर्ष खेती से होने वाली आय में गिरावट आई है। कृषि मंत्री ने भी संसद में बताया कि किसान परिवार की मासिक आय के आंकड़े क्रमशः 6,426 रुपये और 6,223 रुपये रहे। वहीं, डीजल, बिजली, खाद, मजदूरी और कीटनाशक दवाओं की कीमतों में भारी बढ़ोतरी से किसानों की लागत बढ़ी है और उनकी आर्थिक मुश्किलें गहरी हुई हैं।
यों भी समूचे ग्रामीण क्षेत्र और कृषि पर पूरा नजरिया बदलने की दरकार है। 2014 से 2024 के बीच एक लाख से अधिक, यानी औसतन हर दिन करीब 39 किसानों ने आत्महत्या की। समय आ गया है, जब आर्थिक संकट से निपटने के लिए प्राथमिकताओं की अदला-बदली की जरूरत है।