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मुद्दा: खरीदारी का मासिक उपवास... पर्यावरणीय प्रभावों पर ध्यान देना भी जरूरी
सार
ईरान-अमेरिका युद्ध के बाद मितव्ययिता संबंधी चर्चाओं के आलोक में अंधाधुंध खरीदारी की प्रवृत्ति के पर्यावरणीय प्रभावों पर ध्यान देना भी जरूरी है।
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सांकेतिक तस्वीर।
- फोटो : Adobe
विस्तार
आए दिन सुर्खियों में कोई न कोई विशेष दिन रहता है। नियत दिवस के आयोजनों को यादगार बनाने की सामग्री को आम जन तक पहुंचाने के लिए पूरा बाजार सक्रिय हो जाता है। आजकल तो त्योहारों का मतलब भी खरीदारी के अवसर में तब्दील हो गया है। पहले यह ग्रीटिंग कार्ड या संकेतात्मक उपहार के बाजार तक सीमित था, किंतु बाद में यह समस्त सीमाओं को लांघते हुए विशाल हो गया है।
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वर्तमान संदर्भ में, ऐसा कोई भी अवसर नहीं होता, जब खरीद न की जा सके, जबकि दुनिया भर में पर्यावरण और उससे जुड़े मुद्दों के प्रति गंभीर चिंता व्यक्त की जा रही है। खरीदारी की होड़ में अपने को आगे साबित करने के लिए वह सब भी खरीद लिया जाता है, जिसकी या तो जरूरत नहीं है या जिसे रखने के लिए घर में जगह नहीं है। बाजार की शक्ति का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि सामान बेचने के जुगाड़ में रिटेल थेरेपी का जुमला गढ़ कर उसे मानसिक, सामाजिक स्वास्थ्य का नुस्खा बना दिया गया। विडंबना यह है कि बाजार की चकाचौंध में अंधा हुआ इन्सान खरीदारी करते वक्त उचित-अनुचित में भेद ही नहीं कर पाता। जरूरत से अधिक खरीद के आर्थिक पक्ष को तो प्रत्यक्ष रूप से समझा जा सकता है, किंतु इसके पर्यावरणीय प्रभाव को समझना भी आवश्यक है।
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यह प्रवृत्ति विभिन्न कारणों से युवा पीढ़ी में अत्यंत तीव्रता से फैलती जा रही है। यदि आमतौर पर खरीद के प्रचलन का अध्ययन किया जाए, तो उसमें सर्वाधिक खरीद कपड़ों, सौंदर्य प्रसाधन, जूते-चप्पल एवं इलेक्ट्रॉनिक सामान की होती है। जब रोज ही खरीद की जाए, तो उनके फैशन में भी जल्दी-जल्दी बदलाव होते रहते हैं। ऐसे उत्पादों के निर्माण या उत्पादन में पर्यावरण अनुकूल सामग्री का उपयोग प्रायः कम ही होता है। सीधे तौर पर इसका प्रभाव व्यक्तिगत अनुशासन एवं मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है। सहज रूप में रोजाना खरीदारी की आदत व्यक्तिगत अंकुश को समाप्त कर देती है। जबकि खरीदारी में समझदारी की नितांत आवश्यकता होनी चाहिए।
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लगभग तीन दशक पूर्व दुकान एवं संस्थान अधिनियम के तहत साप्ताहिक अवकाश रखना अनिवार्य हुआ करता था। अभी तो चौबीसों घंटे और उसमें भी रात्रि बाजारों की पुरजोर वकालत की जा रही है। वैसे भी मॉल संस्कृति के उद्भव से लेकर प्रादुर्भाव तक बाजार में अवकाश संबंधी प्रावधान पूर्णतया विलोपित ही हो गया है। हालांकि साप्ताहिक अवकाश के पीछे उद्देश्य कर्मियों को आराम प्रदान करना था, लेकिन दुकानें एवं बाजार बंद होने से उस दिन खरीदारी पर भी विराम लग जाता था। उस समय शहरी परिवहन की सीमाओं के चलते दूरस्थ बाजारों में जाने का प्रचलन भी नहीं था। सामान्य घरेलू वस्तुओं के लिए गांव-शहर में साप्ताहिक हाट-बाजार लगते थे। इस तरह खरीदारी नियोजित एवं अनुशासित होती थी। ई-कॉमर्स एवं क्विक कॉमर्स व्यवसाय प्रणाली ने खरीदारी को सुलभ और सुविधाजनक बना दिया। इसने खरीदारी से पहले सोचने-समझने की शक्ति का क्षरण ही कर दिया है। बड़े शहरों ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों व गांवों तक में अब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिये रोजाना खरीदारी होने लगी है। अनेक परिस्थितियों में खरीद का कारण नहीं मिल पाने से उत्पन्न बेचैनी को समझा जा सकता है। यह भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। खरीदारी की इस प्रवृत्ति से नई पीढ़ी में पैसे और पर्यावरण का कोई महत्व कायम नहीं हो पाता है।
ऐसा नहीं है कि ऑनलाइन खरीद को विराम नहीं दिया जा सकता। सक्षम सरकारी ढांचे के चलते जब परीक्षा और सुरक्षा के लिए इंटरनेट बंद किया जा सकता है, तो महीने में एक दिन के लिए ऑनलाइन कॉमर्स प्लेटफॉर्म क्यों नहीं बंद किए जा सकते? अगर इच्छाशक्ति हो, तो सब संभव है।
रोजाना खरीदारी की यह बेकाबू प्रवृत्ति तेजी से फैलती जा रही है, जिससे लोगों व परिवारों में बचत की भावना न्यून रह गई है। इस पर नियंत्रण के लिए खरीदारी में समझदारी अभियान को मात्र उपभोक्ता जागरूकता तक सीमित न रखते हुए सतत विकास लक्ष्यों के तहत 12वें लक्ष्य उत्तरदायी उपभोग के साथ जोड़ना होगा। शासन को विरोध से विचलित हुए बगैर साप्ताहिक अवकाश की अनिवार्यता को पुनर्स्थापित करना होगा। हर व्यक्ति, परिवार, समाज अगर हर माह एक दिन खरीदारी नहीं करने की प्रतिज्ञा करे, तो पर्यावरण एवं संसाधनों की भारी बचत होगी। यह खरीदारी उपवास अनेक दृष्टि से व्यक्ति से लेकर विश्व तक सकारात्मक प्रभाव छोड़ेगा।