{"_id":"6655439ba7a4a69ea6036c5b","slug":"israel-s-compulsion-to-remain-fanatic-for-its-own-survival-support-may-get-divided-after-raisi-s-death-2024-05-28","type":"story","status":"publish","title_hn":"पश्चिम एशिया: खुद के अस्तित्व के लिए कट्टर बने रहना इस्राइल की मजबूरी, रईसी की मौत के बाद बंट सकता है समर्थन","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
पश्चिम एशिया: खुद के अस्तित्व के लिए कट्टर बने रहना इस्राइल की मजबूरी, रईसी की मौत के बाद बंट सकता है समर्थन
Tue, 28 May 2024 08:08 AM IST
निर्मल कांत
ब्रेट स्टीफेंस, द न्यूयॉर्क टाइम्स
ब्रेट स्टीफेंस, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: निर्मल कांत
Updated Tue, 28 May 2024 08:08 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
दिवंगत इब्राहिम रईसी, बेंजामिन नेतन्याहू
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
इस्राइल को कोसने वाले यह समझें कि वह बदल नहीं सकता, क्योंकि यह लड़ाई उसके अस्तित्व की है। लेकिन अंदरूनी और बाहरी चुनौतियों से जूझ रहा और खुद को इस्लामी क्रांति का अगुआ मानने वाला ईरान भूल रहा है कि लंबे समय में क्रांतियां उन्हीं मूल्यों को नुकसान पहुंचाने लगती हैं, जिनके लिए वे लड़ी गई थीं।
मेरे एक मित्र ने मुझे बताया कि पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट दो तारीखों से संबंधित एक सवाल पर आधारित है कि 1948 और 1979 में से किस ऐतिहासिक क्षण के पलटने की संभावना है? ये तारीखें इस्राइल के निर्माण और उसके 31 साल बाद ईरानी क्रांति से संबंधित हैं। इस प्रश्न का निहितार्थ यह है कि यहूदी राज्य और इस्लामी गणतंत्र स्थायी रूप से एकसाथ अस्तित्व में नहीं रह सकते, कम से कम तब तक, जब तक दूसरा (इस्लामी गणतंत्र) पहले (यहूदी राज्य) को खत्म करने की चाह रखता हो। हाल के दिनों ने उनके पतन के दो संभावित माध्यमों को चर्चा में ला दिया है।
सबसे पहले, अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के अभियोजक करीम खान ने घोषणा की कि वह प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इस्राइल के रक्षा मंत्री योव गैलेंट के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट के लिए आवेदन करेंगे। यह अलग बात है कि इस फैसले से दोषसिद्धि तो दूर की बात है, किसी की गिरफ्तारी भी संभव नहीं है। बाइडन प्रशासन ने पहले ही इस फैसले की निंदा की है और यहां तक कि जिन देशों के इस्राइल से कम दोस्ताना रिश्ते हैं, वे भी मानते हैं कि परमाणु हथियार संपन्न और ताकतवर खुफिया एजेंसी वाले किसी राष्ट्र के नेता की गिरफ्तारी संभव नहीं है। लेकिन यह घोषणा उसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत इस्राइल के विरोधी मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता खत्म करने और अलग-थलग करने से धीरे-धीरे इस्राइल पतन की ओर अग्रसर होगा।
यहां तक कि नेतन्याहू और गैलेंट के साथ हमास के तीन नेताओं की गिरफ्तारी की मांग करने का करीम खान का फैसला भी उसी समग्र रणनीति का हिस्सा है, क्योंकि यह इस्राइली नेताओं को नैतिक स्तर पर आतंकवादियों के साथ रखता है। फिर हाल ही में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी, विदेश मंत्री हुसैन अमीर अब्दुल्लाहियन और छह अन्य लोगों की मृत्यु भले ही दुर्घटनावश हुई हो। लेकिन इस आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि जिस हेलिकॉप्टर में वे थे, उसे घरेलू या विदेशी साजिशकर्ता द्वारा गिराया गया। दुर्घटना का जो भी कारण हो, यह शासन के लिए विश्वासघात और पूर्वाभास को समझने में कमजोरी दोनों को दर्शाता है। 'विश्वासघात' इसलिए कि सक्षम राष्ट्रों को अपने अति विशिष्ट व्यक्तियों को बिना दुर्घटना के विमान में ले जाने में सक्षम होना चाहिए। और 'पूर्वाभास में कमी' इसलिए कि 1980 के दशक में हजारों कैदियों को फांसी पर चढ़ाकर अपना दबदबा कायम करने वाले रईसी को व्यापक रूप से ईरान के 85 वर्षीय सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता था। ऐसे में, उनकी सुरक्षा को लेकर ज्यादा एहतियात बरतनी चाहिए थी।
अब ईरान को 50 दिनों के भीतर चुनाव कराने होंगे, जो शासन की गंभीर अलोकप्रियता को उजागर करेगा। वर्षों से मतदान का प्रतिशत घटता जा रहा है, क्योंकि खामेनेई चुनावी मैदान में सबसे कट्टर उम्मीदवारों को ही उतारते हैं। यह उनके उत्तराधिकार के लिए सत्ता संघर्ष का मंच भी तैयार करता है, खासकर खामेनेई के अलोकप्रिय बेटे मोज्ताबा को उत्तराधिकार सौंपने के प्रति व्यापक अनिच्छा को देखते हुए शासन को उनकी इच्छा से प्रभावी ढंग से राजशाही में बदल दिया गया है।
अगर गंभीर आर्थिक संकट को 2022 के विरोध प्रदर्शन के क्रूर दमन से उपजे गुस्से के साथ जोड़ दें, तो गंभीर अस्थिरता की आशंका या शासन के अचानक पतन का खतरा वास्तविक महसूस होने लगता है। ऐसे में, यही सवाल उठता है कि इस्राइल या ईरान में से किस पर संकट ज्यादा है? जैसा कि पूर्व ईरानी राष्ट्रपति अकबर रफसंजानी ने एक बार कहा था। इस्राइल के लिए सबसे गंभीर खतरा यह है कि 'एक परमाणु बम समूचे इस्राइल को खत्म कर देगा। लेकिन इससे इस्लामी जगत को सिर्फ नुकसान ही होगा। इसलिए, इस पर विचार करना अतार्किक है। ईरान की बढ़ती परमाणु क्षमताओं (और उस बारे में अस्पष्टताओं) को लेकर पश्चिमी दुनिया को जरूर चिंतित होना चाहिए। लेकिन आईसीसी के कदमों से या फिर शैक्षिक संस्थानों में विरोध जताने से इस्राइल को न के बराबर खतरा है। उनकी सोच यह है कि इस्राइली लोगों को एक खास क्षेत्र में बसाया नहीं गया था। यहूदियों का मानना है कि वे मूल रूप से इस्राइल से हैं।
यहूदीवाद इतिहास का सबसे पुराना उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष है, जो रोमन युग में शुरू हुआ था। जहां तक इस्राइली यहूदियों के अपने पूर्वजों की भूमि पर लौट जाने की बात है, तो सवाल उठता है कि उनके पूर्वजों की भूमि कहां है और क्या है। रूसी नरसंहार या अरब नरसंहार या सामूहिक नरसंहार की भूमि ? इस्राइल के कटु आलोचक इसे भूल जाते हैं, लेकिन इस्राइली नहीं। उनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है, यह तथ्य अब यहूदी प्रवासी समुदायों के प्रति नफरतों से उजागर है। इस्राइल पर अपने दुश्मनों के समक्ष नरम पड़ने के लिए जितना दबाव डाला जाएगा, उतना ही यहूदीवाद पैदा होगा। यह कट्टरता यहूदी पहचान से जुड़ी हुई है। ईरान में शासन के लिए मुख्य खतरा भीतर से और नीचे से आता है। वहां की स्थितियों में यह भूलना आसान है कि 2022 में हिजाब और महिलाओं के अधिकारों को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों से पहले भी कई विरोध प्रदर्शन हुए थे। हालांकि शासन बेहद हिंसक तरीकों के असंतुष्टि को दबाने में सफल रहा है, लेकिन इन विरोध प्रदर्शनों की बढ़ती आवृत्ति से स्पष्ट है कि शासन के प्रति जनता का गुस्सा बढ़ता जा रहा है।
रईसी की मौत के साथ शासन को जो समर्थन मिल भी रहा है, वह बंट सकता है। अर्थशास्त्र का एक अनौपचारिक नियम, जिसका नाम हर्बर्ट स्टेन के नाम पर रखा गया है, के अनुसार, जो प्रवृत्तियां जारी नहीं रह सकतीं, वे नहीं रहेंगी। यह नियम राजनीतिक अस्तित्व पर भी लागू हो सकता है। ईरान की तरह इस्राइल में भी घरेलू कमजोरियां हैं, जिनमें से कुछ ही सात अक्तूबर से पहले न्यायिक सुधार को लेकर चल रहे प्रदर्शनों के रूप में सामने आई थीं। लेकिन ईरान के शासकों के लिए जोखिम अधिक गंभीर हैं। उन्होंने हमेशा इस्लामी क्रांति का अगुआ होने का दावा किया है, लेकिन लगता है कि वे यह भूल गए हैं कि क्रांतियों द्वारा उन्हीं मूल्यों को नुकसान पहुंचाने का इतिहास रहा है, जिनके लिए वे लड़ी गई। बड़े पैमाने पर ईरान के लोग इस्लामवादी नहीं रहना चाहते। लेकिन खुद का अस्तित्व बचाए रखने के लिए कट्टर बने रहना इस्राइल की मजबूरी है और वह इसके लिए लड़ेगा।