इस्राइल की परीक्षा: हमास के जाल में उलझे नेतन्याहू को देना होगा परिपक्वता का परिचय
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विस्तार
मैंने लगभग 50 वर्षों तक इस संघर्ष की रिपोर्टिंग की है और इस्राइली एवं फलस्तीनियों को कई भयानक चीजें करते देख चुका हूं। मैं फलस्तीनी आत्मघाती हमलावरों को इस्राइली डिस्को व बसों को उड़ाते और इस्राइली लड़ाकू विमानों को गाजा के उन इलाकों पर हमला करते देख चुका हूं, जहां हमास के लड़ाके रहते हैं, जिससे बड़ी संख्या में बेगुनाह नागरिकों की मौतें भी हुई हैं। लेकिन पिछले सप्ताहांत जो हुआ, वैसा मैंने कभी नहीं देखा-हमास के लड़ाके इस्राइली पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को घेरकर, उनकी आंखों में आंखें डालकर उन्हें गोलियां मार रहे थे। इससे पहले वर्ष 1982 में मैंने बेरुत के साबरा और शतीला शरणार्थी शिविरों में ईसाई लड़ाकों द्वारा फलस्तीनी पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के नरसंहार के दौरान ऐसी बर्बरता देखी थी।
हालांकि मुझे यहूदी राज्य के विनाश के प्रति हमास की लंबी तैयारी को लेकर कोई भ्रम नहीं है, फिर भी मैं आज खुद से पूछ रहा हूं कि सामूहिक हत्या के लिए आईएस जैसी यह क्रूरता आखिर कहां से आई? जाहिर है, इसमें कुछ नई बात है, जिसे समझना जरूरी है।
बेशक इस हमले की योजना हमास नेतृत्व ने महीनों पहले बनाई होगी, लेकिन मुझे लगता है कि इसकी भावनात्मक उत्पत्ति को तीन अक्तूबर को इस्राइली प्रेस में छपी एक तस्वीर से समझाया जा सकता है। इस्राइल सरकार के कुछ मंत्री अपनी पहली आधिकारिक यात्रा पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेने के लिए रियाद (सऊदी अरब) गए थे, जिसे इस्राइली प्रेस में बहुत अधिक कवरेज मिला। लेकिन बेरुत और यरूशलम, दोनों जगह रहने के अपने अनुभवों के आधार पर अखबारों में छपी एक तस्वीर ने मुझे चौंकाया। मुझे पता था कि दोनों दुनिया में पूरी तरह से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं होंगी। वह तस्वीर इस्राइल के संचार मंत्री, श्लोमो करही की टीम ने तब ली था, जब वे अपने होटल के कमरे में इबादत कर रहे थे। उनमें से एक ने इबादत के दौरान अपने एक सहकर्मी की फोटो ली, जो पारंपरिक यहूदी शॉल और यरमुलके टोपी में थे। उनके हाथ में पवित्र धर्मग्रंथ था, जबकि पृष्ठभूमि में खिड़की से बाहर रियाद का क्षितिज दिख रहा था।
इस्राइली यहूदियों के लिए वह तस्वीर एक सपने के सच होने की तरह है। इस्लाम के जन्म स्थान और इसके दो सबसे पवित्र शहरों, मक्का और मदीना वाले मुल्क सऊदी अरब में पवित्र धर्मग्रंथ के साथ इबादत करना वह स्वीकार्यता है, जो हर इस्राइली यहूदी के मर्म को छूती है। लेकिन वही तस्वीर बहुत से फलस्तीनियों में एक तीव्र भावनात्मक क्रोध को प्रज्वलित करती है, विशेष रूप से हमास और फलस्तीनी इस्लामी जिहाद सहित इस्लामी मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े लोगों में। उनके लिए यह तस्वीर इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सर्वोच्च लक्ष्य की पूर्ण अभिव्यक्ति है-अपने विरोधियों को यह साबित करके दिखाना कि वह सभी अरब देशों, खासकर सऊदी अरब के साथ शांति समझौता कर सकते हैं, लेकिन फलस्तीनियों को एक इंच जमीन नहीं देंगे।
मुझे नहीं मालूम कि हमास नेतृत्व ने वह खास तस्वीर देखी या नहीं, लेकिन यह हमला दिखाता है कि वह इस घटनाक्रम से पूरी तरह वाकिफ है। मेरा मानना है कि हमास ने न केवल इस हमले को शुरू किया, बल्कि इसे यथासंभव विनाशकारी बनाने का आदेश भी दिया। उसकी मंशा इस्राइल को भड़काने की थी, ताकि वह गाजा पट्टी पर हमला करे, जिससे बड़े पैमाने पर फलस्तीनी नागरिक हताहत हों। और इस तरह सऊदी अरब को रियाद और यहूदी राज्य के बीच रिश्ते सामान्य करने के लिए अमेरिकी-मध्यस्थता में होने वाले समझौते से पीछे हटने के लिए मजबूर करना था।
साथ ही उसने संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को को, जो अब्राहम समझौते का हिस्सा थे, इस्राइल से रिश्ते खत्म करने की जमीन तैयार की। नेतन्याहू, उनके यहूदी वर्चस्ववादियों तथा अति रूढ़िवादी गठबंधन के लिए हमास का संदेश स्पष्ट है-खाड़ी के अरब भाई चाहे आपको कितनी भी जमीन दे दें, यहां आप आराम से नहीं रह सकते। हम आपको गाजा में सनकी कार्रवाई करने के लिए मजबूर कर देंगे, जो अरब देशों को आपसे दूर रहने के लिए मजबूर करेगा। ध्यान रखना चाहिए कि हमास ने यहूदी बस्तियों पर हमला करने के लिए इस्राइल के कब्जे वाले पश्चिमी तट पर अपने गुर्गों को नहीं भेजा था। उसने अपने हमले को इस्राइली गांवों और किबुत्ज के फार्मों पर केंद्रित किया, जो इस्राइल के कब्जे वाले पश्चिमी तट का हिस्सा नहीं हैं।
मुझे लगता है कि अमेरिका को इस्राइल की मदद करने के लिए तीन काम करने की जरूरत है। पहला, राष्ट्रपति बाइडन इस्राइल से पूछें कि वह गाजा में आगे क्या करने वाला है। उसके सबसे बड़े दुश्मन उससे क्या चाहते हैं और वह ठीक इसके विपरीत कदम कैसे उठा सकता है?
इस्राइल के सबसे बड़े दुश्मन (हमास और ईरान) चाहते हैं कि इस्राइल गाजा पर आक्रमण करे और वहां एक रणनीतिक अतिक्रमण में फंस जाए। इससे विश्व मंच पर इस्राइल द्वारा अर्जित सहानुभूति कमजोर हो जाएगी, तेहरान के निरंकुश शासन से दुनिया का ध्यान भटक जाएगा और इस्राइल को गाजा और पश्चिमी तट पर स्थायी कब्जा करने के लिए अपनी सेना बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ेगा।
मुझे उम्मीद है कि बाइडन नेतन्याहू से यह कहेंगे कि अमेरिका लोकतांत्रिक इस्राइल को हमास के धार्मिक फासीवादियों और लेबनान में हिजबुल्लाह से बचाने में मदद करने के लिए हरसंभव प्रयास करेगा, लेकिन नेतन्याहू को खुद को उदार लोकतांत्रिक इस्राइल से जोड़ना होगा, क्योंकि दुनिया और यह क्षेत्र इस लड़ाई को धार्मिक युद्ध के रूप में नहीं, बल्कि लोकतंत्र और धर्मतंत्र की अग्रिम पंक्ति की लड़ाई के रूप में देखता है। इसका मतलब यह है कि नेतन्याहू को अपने मंत्रिमंडल में बदलाव करना होगा और धार्मिक कट्टरपंथियों को बाहर निकालकर एक राष्ट्रीय एकता सरकार का गठन करना होगा।
दुर्भाग्य से, नेतन्याहू अब भी अपने कट्टरपंथी गठबंधन को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिसकी उन्हें खुद को भ्रष्टाचार के मुकदमे से बचाने और न्यायिक तख्तापलट को पूरा करने के लिए जरूरत है, जो इस्राइल के सर्वोच्च न्यायालय को अक्षम बना देगा। यह वाकई गड़बड़ है। अमेरिका लंबे समय तक इस्राइल को उसके वास्तविक खतरों से नहीं बचा सकता, जब तक कि वहां ऐसी सरकार न हो, जो उसके समाज के सबसे अच्छे लोगों को प्रतिबिंबित करती हो।