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क्या बैंकों का पूंजीकरण ही समाधान है

Narayana Krishnamurti नारायण कृष्णमूर्ति
Updated Sun, 03 Mar 2019 06:22 PM IST
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Is Re-capitalization the only solution for banks
रुपया

वर्ष 2018-19 के बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 65,000  करोड़ रुपये आवंटित किए थे। हालांकि पीयूष गोयल द्वारा पेश अंतरिम बजट में इसका कोई भी उल्लेख नहीं किया गया, लेकिन कुछ दिनों पहले सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बारह बैंकों में 48,239 करोड़ रुपये के पुनर्पूंजीकरण की घोषणा की। ताजा पूंजी डालने की यह घोषणा विगत दिसंबर में सार्वजनिक क्षेत्र के सात बैंकों में 28,615 करोड़ रुपये डाले जाने के बाद हुई है। बैंकों में पैसे डालने (पुनर्पूंजीकरण) की यह कहानी पिछले तीन-चार वर्षों से चल रही है और इसका कारण है गैर निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) का बढ़ता बोझ और खराब ऋण।


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एक बैंक किसी ऋण को खराब तब बताता है, जब 90 दिन या उससे अधिक की अवधि में उसे चुकाया नहीं गया हो। और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के नियमित रूप से काम करने के लिए सरकार को उनमें नई पूंजी लगानी ही होगी, अन्यथा बैंक ध्वस्त हो जाएंगे। लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सरकार ने वर्षों से सुनिश्चित किया है कि विलय के माध्यम से किसी भी भारतीय बैंक को कभी खत्म नहीं होने दिया जाएगा। बैंक ऑफ बड़ौदा, विजया बैंक और देना बैंक का विलय एक और उदाहरण है कि सरकार बैंकों को टूटने से बचाने के लिए किस तरह काम करती है।
 
बैंक दबाव में हैं, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक ने बुरे कर्ज से जूझ रहे सार्वजनिक क्षेत्र के कई बैंकों को त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई (पीसीए) के ढांचे में डालते हुए उनके ऋण देने और जमा बढ़ाने के कार्यों को गंभीर रूप से सीमित कर दिया है। ऐसे परिदृश्य में जहां बैंक ऋण देने में असमर्थ होते हैं और जमा बढ़ाने के काम में शामिल होते हैं, तो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पास पीसीए के ढांचे में ऋण वसूली और पूंजी की तलाश करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।

सार्वजनिक क्षेत्र के कई बैंक त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई की सूची से बाहर निकलने में कामयाब हुए हैं, क्योंकि उन्हें समय पर सरकार द्वारा समर्थन मिला और उसमें पूंजी डाली गई, जो उन बैंकों में बड़ी स्टेकहोल्डर है।

स्रोत और समय के आधार पर एनपीए का आंकड़ा अलग-अलग होगा, लेकिन तथ्य यह है कि संकट का सामना कर रहे उद्योगों को ऋण देने के कारण, मसलन विशेष रूप से दूरसंचार, बिजली और ढांचागत क्षेत्रों में एनपीए की समस्या बढ़ रही है। खराब वसूली का अनुभव बैंकों में उद्योगों को ऋण देने से परहेज करने की भावना पैदा कर रहा है, जो ऋण वृद्धि (क्रेडिट ग्रोथ) में बाधा पैदा कर रहा है। सरकार द्वारा पूंजीकरण का एक हिस्सा क्रेडिट ग्रोथ को आगे बढ़ाने के लिए बैंकों का मनोबल भी बढ़ाता है। हालांकि गैर निष्पादित परिसंपत्ति नौ लाख करोड़ रुपये से अधिक होने के साथ असली चिंता एनपीए की सुस्त वसूली को लेकर है।

दिसंबर, 2018 में संसद में जवाब देते हुए केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 2014-15 से 2017-18 तक के चार वर्षों में 2.33 लाख करोड़ रुपये के बुरे कर्ज की वसूली की, जिनमें से 32,693 करोड़ रुपये बट्टे खाते में थे। यह एक महत्वपूर्ण शुरुआत है, हालांकि वसूली की प्रक्रिया बहुत सुस्त और थकाऊ है। वास्तव में दिवाला एवं दिवालियापन संहित (आईबीसी-जिसने वसूली की राह खोली है) के बावजूद वसूली की रफ्तार बहुत सुस्त है, जिसके चलते सरकार द्वारा बैंकों में लगातार पूंजी डालने की आवश्यकता है।

इसका मतलब यह नहीं कि पुनर्पूंजीकरण ही एकमात्र उपाय है, जिसका खामियाजा पिछले चार वर्षों में वैश्विक स्तर पर तेल की कम कीमत के बावजूद उच्च कर चुकाकर देश के भोले करदाताओं ने भुगता है। लेकिन अब पहले की तुलना में कच्चे तेल की कीमत बढ़ गई है, इसलिए धीमी और खराब वसूली को देखते हुए सरकार के लिए पुनर्पूंजीकरण से तालमेल बिठाना मुश्किल है। फिर भी कर्ज को बट्टे खाते में डालने के चरण से देर से ही सही, वसूली और कड़े आईबीसी कानून जान-बूझकर ऋण न चुकाने वालों के लिए चिंता का कारण बने हुए हैं।

क्या पुनर्पूंजीकरण समाधान है? हां भी और नहीं भी। हां, इसलिए, क्योंकि बैंकों को अपने मूल क्षेत्र में ऋण देने और जमा करने के लिए पुनर्पूंजीकरण आवश्यक है। नहीं, इसलिए, क्योंकि जिस तरह से पुनर्पूंजीकरण किया जा रहा है, उसमें इसका पर्याप्त संकेत नहीं मिलता कि ऐसा उचित योजना के साथ किया जा रहा है। समस्या तो है ही, क्योंकि बहुत-सा धन उन छोटे बैंकों में डाला जा रहा है, जो पीसीए सूची में हैं। मसलन, अप्रैल, 2013 से सरकार द्वारा कुल 14,446 करोड़ रुपये यूको बैंक में उसे चलाने के लिए डाले गए हैं। इस बैंक की कुल संपत्ति स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की कुल संपत्ति का करीब 6.3 फीसदी है, लेकिन बैंक ने भारत की सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक में निवेश की गई पूंजी का लगभग 58.2 फीसदी पूंजी निवेश देखा है। स्टेट बैंक के पास 31 मार्च, 2018 तक कुल 34,54,752 करोड़ रुपये की संपत्ति थी और देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एक तिहाई से थोड़ी ज्यादा संपत्ति है, फिर भी स्टेट बैंक में 24,844  करोड़ रुपये का पुनर्पूंजीकरण किया गया है। पुनर्पूंजीकरण को सार्थक और प्रभावी बनाने के लिए इस असमानता को दूर करने की आवश्यकता है।

सरकार के लिए यह सुनहरा मौका है कि जहां भी संभव हो, बैंकों का विलय किया जाए, जैसा कि उसने विजया बैंक, देना बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा के साथ किया है या 2017 में स्टेट बैंक के पांच सहयोगियों-स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर ऐंड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद और स्टेट बैंक ऑफ पटियाला का एकीकरण किया था। इस तरह बैंकों का विलय सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में स्वच्छ और कुशल व्यवस्था बनाने के लिहाज से लंबा रास्ता बनाने में मददगार होगा, जहां सरकार पहले से ही प्रतिस्पर्धी माहौल में एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करने के बजाय सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए विशेषज्ञता को निर्धारित कर सकती है। ऐसा होने तक पुनर्पूंजीकरण भविष्य में सरकार को फायदा पहुंचाने की उम्मीद में खेला गया एक दांव ही होगा।

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