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ईरान, अमेरिका और भारत

Wed, 04 Jul 2018 06:46 PM IST
मनोज जोशी
मनोज जोशी Updated Wed, 04 Jul 2018 06:46 PM IST
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Iran, America and India
मनोज जोशी
अमेरिका ने मांग की है कि भारत ईरान से तेल खरीदना बंद करे। सबसे पहले भारत ने घोषणा की कि भारत एकतरफा प्रतिबंधों को नहीं मानता है और केवल उन्हीं प्रतिबंधों को लागू करेगा, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा लगाए जाएंगे। अब नई दिल्ली ने चुपचाप अमेरिकी दबाव में समर्पण कर दिया है। 

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अमेरिका ने घोषणा की कि ईरानी तेल के खरीदारों को नवंबर से आयात रोकना चाहिए। पिछले हफ्ते नई दिल्ली की अपनी यात्रा के दौरान संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत निक्की हेली ने प्रधानमंत्री मोदी से कहा कि भारत को निश्चित रूप से ईरानी तेल पर अपनी निर्भरता घटानी चाहिए और अंततः आयात बंद कर देना चाहिए। अमेरिका ने यह कदम तब उठाया है, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान और छह विश्वशक्तियों के साथ 2015 में तेहरान बंधक संकट और उसके परमाणु कार्यक्रम की वापसी के बदले प्रतिबंध हटाने से संबंधित समझौते से हाथ खींच लिया है। इस सौदे को विश्व शक्तियों और संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी मिली थी। 

भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा और चीन के बाद ईरान से तेल मंगाने वाला दूसरा सबसे बड़ा आयातक है। अधिकारियों का कहना है कि उन्हें अमेरिकी मांगों का पालन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, क्योंकि दुनिया के ज्यादातर देशों की तरह भारत अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से प्रभावित है और अमेरिकी धौंस का पालन नहीं करने पर भारतीय कंपनियों को भारी जुर्माना भरना पड़ेगा। बताया जाता है कि रिफाइनरी व्यवसाय में लगी भारतीय कंपनियों ने पहले से ही अपना आयात घटाना शुरू कर दिया है। 

भले ही ईरानी आयात को घटाकर नवंबर तक शून्य करने का लक्ष्य है, लेकिन अमेरिका ने पहले ही घोषणा कर दी है कि छह अगस्त से ईरान को अमेरिकी डॉलर में लेनदेन करने से रोक दिया जाएगा और चार नवंबर को उसे अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली से हटा दिया जाएगा। 

दूसरी ओर ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने हाल में यूरोप की यात्रा शुरू की है, जिसके तहत वह स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रिया जाएंगे। उनका उद्देश्य 2015 के सौदे के लिए यूरोपीय समर्थन जुटाना है, जिससे अमेरिका ने हाथ खींच लिया है। अभी यूरोपीय संघ का अध्यक्ष ऑस्ट्रिया है और 2015 में वियना में ही परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस बीच, ईरान अपने तेल को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए कीमत में छूट देने की भी योजना बना रहा है। 

भूराजनीतिक दृष्टि से भारत, चीन और यूरोपीय संघ अमेरिकी प्रतिबंध का विरोध करते हैं। लेकिन यूरोप अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है और उसके बैंक एवं संस्थान पहले से ही किसी भी ईरानी तेल की जहाजों से होने वाली ढुलाई के लिए वित्त पोषण में कटौती कर रहे हैं। दो देश-चीन एवं तुर्की अब भी ईरान का समर्थन कर रहे हैं। अंकारा ने स्पष्ट रूप से कहा है कि प्रतिबंधों का पालन करने का उसका कोई इरादा नहीं है और वह लगातार ईरान से तेल खरीदेगा। बीजिंग ने कुछ नहीं कहा है, लेकिन ऐसा कोई संकेत नहीं है कि वह प्रतिबंधों का पालन करेगा।

ईरानी उलझन का भारत पर दोनों तरह से -अल्पकालिक और दीर्घकालिक असर पड़ेगा। अल्पकाल में यह भारत को ईरानी तेल का परित्याग करने के लिए मजबूर करता है, जो हमारी रिफाइनरी के लिए उपयुक्त है और तेल खरीदना ज्यादा महंगा हो सकता है। भौतिक रूप से ईरान भारत के लिए निकटतम तेल निर्यातक देश है। लेकिन दीर्घकालिक असर ज्यादा चिंताजनक है।

जैसा कि कहा जाता है, दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। पाकिस्तान और ईरान वास्तव में दुश्मन नहीं हो सकते हैं, लेकिन उनके रिश्ते उतने अच्छे भी नहीं हैं, क्योंकि सुन्नी बहुल पाकिस्तान अपने अल्पसंख्यक शियाओं से अच्छा सुलूक नहीं करता है, जिन पर अक्सर शिया होने के कारण आतंकी हमले होते हैं। 

चूंकि पाकिस्तान भारतीयों और भारतीय व्यापार को अपने क्षेत्र से गुजरने की अनुमति नहीं देता है, ईरान भारत को चाबहार बंदरगाह परियोजना के माध्यम से इस नाकाबंदी की अनदेखी करने के लिए एक रास्ता प्रदान करता है, जिसके जरिये भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक संपर्क बनाने की उम्मीद करता है। 

इसके अलावा, भारत अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) योजना में ईरान से लेकर रूस तक से भी जुड़ा हुआ है। यह बेल्ट और रोड पहल का भारतीय संस्करण है। जहां चीनी प्रणाली नवनिर्मित रेल लाइन के जरिये मध्य एशिया से होते हुए यूरोप तक जा सकती है, वहीं आईएनएसटीसी से उम्मीद है कि कांडला, मुंबई और मंगलौर जैसे पश्चिमी भारतीय बंदरगाह को ईरानी बंदरगाह बांदर अब्बास और चाबहार से जोड़ा जा सकता है और फिर ईरानी रेल से काकेशस और रूस को जोड़ा जा सकता है। इस तरह से ईरान तेल आपूर्तिकर्ता के रूप में, यूरोप और मध्य एशिया तक संपर्क के रूप में और भारतीय कंपनियों के उत्पादों के बाजार के रूप में भारत की क्षेत्रीय नीति का महत्वपूर्ण घटक है। 

भविष्य बहुत अनिश्चित है। चीन शायद ही अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन करे। कुछ भी हो, ईरान पर चीन का प्रभाव बढ़ने की संभावना है। ईरानी तेल के खरीदार के रूप में और इस रणनीतिक देश में उसके निवेश के कारण बीजिंग एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन गया है। भारत के सामने बहुत सीमित विकल्प हैं। अगर वह अमेरिकी नेतृत्व के निर्देशों का पालन करता है, तो यह उसकी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के साथ-साथ उसकी ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा झटका होगा।

निस्संदेह भारत मुश्किल स्थितियों में फंसा हुआ है, लेकिन उसे राष्ट्रीय मुद्रा के उपयोग से व्यापार, बीमा और शिपिंग करने के लिए समझौते करने जैसे अन्य विकल्पों को तलाशने की जरूरत है। लगता है कि खेल खत्म होने से पहले ही नई दिल्ली ने हार मान ली है। ऐसा शायद ही किसी देश में होता है, जो स्वयं को विश्व शक्ति मानता है और रणनीतिक स्वायत्तता का दावा करता है। निश्चित रूप से भारत को अपने हितों का पालन करना चाहिए, जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मार्ग है। लेकिन सबसे पहले उसे यह तय करना होगा कि वास्तव में उसके सर्वोत्तम हित क्या हैं। 

-फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन 
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