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मुद्दा: अदृश्य कण बन रहे सांसों के दुश्मन; गर्मी की आहट के साथ ही बदलने लगा हवा का मिजाज

Sat, 09 May 2026 08:20 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Sat, 09 May 2026 08:20 AM IST
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सार
एक अध्ययन के अनुसार, बढ़ता तापमान पौधों के परागण चक्र को प्रभावित कर रहा है, जिससे दिल्ली जैसे महानगरों में ‘एलर्जिक सीजन’ की अवधि पहले के मुकाबले चार सप्ताह तक बढ़ गई है।
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Invisible particles are becoming enemies of breathing; mood of air is changing with the onset of summer
हीटवेव - फोटो : Adobe stock

विस्तार

मई के पहले हफ्ते में दिल्ली से सटे गाजियाबाद के सरकारी एमएमजी अस्पताल में आए 100 में से दस मरीज अस्थमा से पीड़ित मिले। इनमें बच्चों व बुजुर्गों की संख्या अधिक है। दिल्ली और आसपास के इलाकों में गर्मी की आहट के साथ ही हवा का मिजाज बदलने लगा है। हाल के वैज्ञानिक शोधों ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि इस दौरान केवल धूल और धुआं ही नहीं, बल्कि हवा में तैरने वाले अदृश्य परागकण भी सांसों के दुश्मन बन रहे हैं।


वल्लभभाई पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट और अन्य शोध संस्थानों के आंकड़े बताते हैं कि मार्च से जून के बीच दिल्ली की हवा में परागकणों की सांद्रता सामान्य से कई गुना बढ़ जाती है, जो अस्थमा और फेफड़ों की गंभीर बीमारियों को न्योता दे रही है। द लैंसेट के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, बढ़ता तापमान पौधों के परागण चक्र को प्रभावित कर रहा है, जिससे दिल्ली जैसे महानगरों में ‘एलर्जिक सीजन’ की अवधि पहले के मुकाबले चार सप्ताह तक बढ़ गई है। कैसी विडंबना है कि जो पेड़ पर्यावरण सुधारने के इरादे से सार्वजनिक स्थानों में लगाए गए, वे ही आज लोगों के दम घुटने का कारक बन रहे हैं।


वैज्ञानिकों के अनुसार, परागकणों की असली ताकत उनके भीतर मौजूद प्रोटीन और ग्लाइकॉल प्रोटीन में निहित होती है। जब ये कण सांस के जरिये अंदर जाते हैं, तो मनुष्य के बलगम के साथ मिलकर और भी जहरीले हो जाते हैं। जैसे ही यह प्रोटीन हमारे खून में मिलता है, तो एक तीव्र एलर्जी को जन्म देता है, जो गंभीर श्वसन रोगों का कारण बनती है। दिल्ली के रिज क्षेत्र और शहरी जंगलों में मौजूद विलायती कीकर जैसे पेड़ भी इस मौसम में भारी मात्रा में परागकण छोड़ते हैं। शुष्क हवा के कारण ये सूक्ष्म कण घंटों वातावरण में तैरते रहते हैं, पर जैसे ही जून-जुलाई में हवा में नमी का स्तर बढ़ता है, ये और भी जहरीले होकर रक्त में अवशोषित होने लगते हैं।

यही कारण है कि इन महीनों में सांस के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। तापमान और प्रदूषण का मेल इस स्थिति को और भयावह बना देता है। शोध बताते हैं कि जब तापमान चालीस डिग्री के पार जाता है, तो हवा में मौजूद जहरीली गैसें परागकणों की बाहरी परत को तोड़ देती हैं, जिससे एलर्जी पैदा करने वाले तत्व और भी सक्रिय हो जाते हैं। उन लोगों के लिए खतरा अधिक है, जो पहले से ही दमा या सांस की समस्या से जूझ रहे हैं। इससे न केवल छींकें और आंखों में जलन होती है, बल्कि अचानक अस्थमा का दौरा पड़ने की आशंका भी बढ़ जाती है। फिलहाल, हवा में परागकणों के प्रकार और उनके सटीक घनत्व का पता लगाने की कोई पुख्ता तकनीक भी उपलब्ध नहीं है।

बचाव के लिए केवल मास्क ही काफी नहीं है, बल्कि जीवनशैली में बदलाव की भी जरूरत है। वृक्षारोपण के वक्त यह भी देखना होगा कि हम किन प्रजातियों को चुन रहे हैं। भविष्य में यह संकट और गहरा सकता है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी का मौसम लंबा होता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम विभाग को वायु गुणवत्ता सूचकांक के साथ-साथ ‘पराग सूचकांक’ भी जारी करना चाहिए, ताकि लोगों को पहले से जानकारी मिल सके कि किस दिन हवा में एलर्जी का खतरा अधिक है और वे अपनी सुरक्षा के लिए तैयार रह सकें।
 
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