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टेलीविजन को पछाड़ता इंटरनेट

mukul shrivastava मुकुल श्रीवास्तव
Updated Mon, 12 Mar 2018 07:34 PM IST
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Internet defeat Television
मुकुल श्रीवास्तव

अब एक आम भारतीय के दिन की शुरुआत सुबह चाय पीते हुए अखबार पढ़ने के बजाय इंटरनेट पर वीडियो देखने से होती है। मोबाइल एडवर्टाइजिंग फर्म इनमोबी के एक शोध के मुताबिक, औसत भारतीय सुबह साढ़े छह से साढ़े नौ के बीच इंटरनेट पर सबसे ज्यादा वीडियो देखते हैं और सप्ताहांत में यह उपभोग चरम पर होता है। एक माध्यम के रूप में टेलीविजन अब ज्यादा खतरे में है, जबकि उसे अखबार के मुकाबले मजबूत माना जाता रहा है।


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पिछले कुछ वर्षों में मोबाइल वीडियो का उपभोग बहुत तेजी से बढ़ा है और यह आंकड़ा 2017 में 2016 के मुकाबले दोगुना हो गया। इसका बड़ा कारण सस्ते स्मार्टफोन और किफायती इंटरनेट डाटा प्लान हैं। इनमोबी, ई मार्केटियरकॉम स्कोर और एमएमए रिसर्च का संयुक्त शोध बताता है कि एक भारतीय औसतन साढ़े चार घंटे अपने स्मार्टफोन पर इंटरनेट एक्सेस करने में बिताता है, जो उसके टीवी देखने के समय से ज्यादा है। यही रिपोर्ट बताती है कि 2021 तक देश में कुल इंटरनेट डाटा उपभोग का दो तिहाई हिस्सा वीडियो पर खर्च किया जाएगा। भारतीय अपने स्मार्टफोन का ज्यादा इस्तेमाल बात करने या संदेश भेजने के बजाय इंटरनेट खंगालने में बिता रहे हैं, जिसमें विभिन्न ऐप का इस्तेमाल शामिल है। ऐप इस्तेमाल में सबसे ज्यादा समय क्रमश: ई-शॉपिंग, यात्रा और तकनीक जैसी श्रेणियों में है। 2017 में विभिन्न ऐप डाउनलोड करने के मामले में भारत का स्थान तीसरा रहा।

उल्लेखनीय है कि 2017 में ही इंटरनेट डाटा उपभोग के मामले में अमेरिका और चीन को पछाड़ भारत पहले नंबर पर आ चुका है। एरिक्सन मोबिलिटी रिपोर्ट के अनुसार, अभी भारतीय हर माह औसतन 3.9 जीबी डाटा की खपत कर रहे हैं, जो 2023 में 18 जीबी तक पहुंच जाएगा। जबकि 2014 में यह आंकड़ा मात्र 70 एमबी प्रतिमाह था।

वीडियो की बढ़त देश में ज्यादा इंटरनेट डाटा उपभोग के लिए प्राथमिक रूप से उत्तरदायी है। यहां निरक्षरों की बड़ी संख्या है और वीडियो उन्हें मोबाइल इंटरनेट से जोड़ने का सबसे सुलभ विकल्प है, चाहे वह मनोरंजन का मामला हो या सूचनाओं का। इस कड़ी में शिक्षा भी शामिल है। लोगों को सिखाने के लिए वीडियो से बेहतर विकल्प अभी हमारे सामने नहीं है।

एक माध्यम के रूप में टेलीविजन इंटरनेट से पिछड़ चुका है, क्योंकि उसके पास कार्यक्रमों की विविधता नहीं है। टेलीविजन अपनी लीक तोड़ने के लिए तैयार नहीं है। वह गति के मामले में इंटरनेट से मुकाबला नहीं कर पा रहा है और कंटेंट के स्तर पर हमारी जानकारियों में कुछ नया जोड़ नहीं पा रहा है। दूसरी ओर, मोबाइल वीडियो उपभोक्ता की रुचियों के हिसाब से कंटेंट उपलब्ध कराता है। टेलीविजन ने शिक्षा के क्षेत्र में तो पांव ही नहीं पसारे। जो कुछ हुआ भी, वह सरकारी टेलीविजन चैनलों में हुआ, हालांकि वे कार्यक्रम भी खासे नीरस और प्रभावहीन रहे, जबकि यूट्यूब किसी भी मुद्दे पर वीडियो का विकल्प देता है।

हालांकि एक माध्यम के तौर पर वीडियो से जुड़े कई सवालों के जवाब अभी ढूंढे जाने हैं। टीवी एक व्यवस्थित माध्यम है, जबकि इंटरनेट वीडियो को अभी व्यवस्थित होना है। लाभ के लिए अब भी विज्ञापन एक बड़ा स्रोत है, यद्यपि अमेजन प्राइम वीडियो और नेटफ्लिक्स के सब्सक्रिप्शन प्लान की सफलता ने यह धारणा तोड़ी है कि लोग माध्यमों पर पैसा खर्च करना नहीं चाहते, पर अभी यह काफी शुरुआती अवस्था में है। इसके बावजूद मोबाइल वीडियो का चलन तो निरंतर बढ़ ही रहा है।

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