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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   International Mother Language Day: Languages are not just a means of communication

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस: भाषाएं सिर्फ संवाद का साधन नहीं होती

Sat, 21 Feb 2026 07:01 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Sat, 21 Feb 2026 07:01 AM IST
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सार
दुनिया की हर मातृभाषा अपनी संस्कृति, परंपरा और इतिहास की संवाहक है। इसीलिए, सांस्कृतिक संरक्षण के लिए भाषाई विविधता का संरक्षण बेहद जरूरी है।
 
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International Mother Language Day: Languages are not just a means of communication
अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस - फोटो : Istock

विस्तार

तकनीकी दौर में मातृभाषाएं सबसे ज्यादा संकट में हैं। इसकी वजह यह है कि मातृभाषाओं को बोलना भी तकनीक से प्रभावित हो रहा है और लेखन तो पूरी तरह उसी पर निर्भर हो गया है। तकनीक की खासियत कहें या कमी, वह बाजार के हिसाब से खुद को विकसित करती है और अपने उत्पादों के लिए इसी नजरिये से शोध करती है। चूंकि, कई भाषाओं का इस्तेमाल करने वालों की संख्या इतनी कम है कि उनसे कमाई की संभावना नगण्य है। इसलिए, तकनीक उनके सहज इस्तेमाल में दिलचस्पी नहीं दिखाती। नतीजतन मातृभाषाओं की बड़ी संख्या लुप्त होने के कगार पर है।


वर्ष 1961 की जनगणना के अनुसार, भारत में 1,652 भाषाएं थीं। वर्ष 1971 में यह संख्या घटकर महज 808 रह गई। यह तब हुआ, जब तकनीक का बोलबाला नहीं था। 2013 के भारतीय लोकभाषा सर्वेक्षण के अनुसार, विगत 50 वर्षों में 220 भाषाएं जहां लुप्त हो गई हैं, वहीं 197 भाषाएं खत्म होने के कगार पर हैं। भाषाशास्त्रियों के मुताबिक, व्यक्तिवादी दर्शन, उपभोक्तावाद, सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों में आ रहे बदलावों, शहरीकरण और पारंपरिक मूल्यों के प्रति घटती निष्ठा व रोजगार के साधनों के रूप में भाषाओं की घटती संख्या भी इसकी वजह है। इसके बावजूद, कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो मातृभाषाओं को लेकर कुछ इलाकों में सम्मोहन बरकरार है। इसलिए, इस बार अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के लिए यूनेस्को ने जो थीम रखी है, वह अहम है। यह थीम है, ‘भाषाओं का महत्व : रजत जयंती और सतत विकास’। इसका ध्येय वाक्य ‘अनेक भाषाएं, एक भविष्य’ है।


पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में 1952 में शहीद हुए भाषा आंदोलनकारियों की याद में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की शुरुआत हुई, जिसकी साल 2025 में रजत जयंती थी। तब यूनेस्को ने इस दिवस को भाषाई विविधता, डिजिटल सशक्तीकरण और समावेशी शिक्षा के माध्यम से सतत विकास पर जोर देने पर केंद्रित किया था। इस बार के ध्येय वाक्य से साफ है कि यूनेस्को चाहता है कि विश्व के सतत विकास में मातृभाषाओं की महत्ता को रेखांकित किया जाए। इसलिए, मातृभाषाओं को बचाना और उन्हें सांस्कृतिक लोकतंत्र के प्रतीक के रूप में जिंदा रखना जरूरी हो जाता है।

चूंकि, भाषाएं सिर्फ संवाद का साधन ही नहीं होतीं, बल्कि सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने का अहम औजार भी हैं, लिहाजा प्राथमिक शिक्षा में उन पर जोर दिया जा रहा है। भारत की नई शिक्षा नीति में भी मातृभाषाओं में शिक्षा पर जोर दिया गया है। दुनिया भर के शिक्षाशास्त्री मानते हैं कि मातृभाषा आधारित शिक्षा समावेशी और बच्चों की समझ को बेहतर बनाने में मददगार होती है। जैसे-जैसे भाषाएं विलुप्त होती जा रही हैं, भाषाई विविधता खतरे में पड़ती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, विश्व की 40 प्रतिशत आबादी को उस भाषा में शिक्षा का अवसर नहीं मिल रहा है, जिन्हें वे बोलते या समझते हैं। मातृभाषा व्यक्ति के सर्वांगीण विकास, सांस्कृतिक पहचान व बौद्धिक नींव का आधार है। मातृभाषा में शिक्षा से मनोबल बढ़ता है, संज्ञानात्मक कौशल विकसित होते हैं, और दूसरी भाषाएं सीखना आसान हो जाता है।

दुनिया की हर मातृभाषा अपनी संस्कृति, परंपरा और इतिहास की संवाहक है। इसी वजह से दुनिया भर के मानवशास्त्री मानते हैं कि सांस्कृतिक संरक्षण के लिए भाषाई विविधता का संरक्षण जरूरी है। स्थानीय भाषाएं ज्ञान का खजाना हैं, जिन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित किया जाना आवश्यक है। इसलिए, जरूरी है कि मातृभाषाओं को तकनीक के हिसाब से विकसित किया जाए। यह कार्य सार्वजनिक संस्थान व सरकारें ही कर सकती हैं।  edit@amarujala.com
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