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परिदृश्य: कलाकृतियों के बाजार में भारत, बढ़ती रुचि अगले दशक को लेकर जगाती है उम्मीद

Sat, 07 Oct 2023 08:21 AM IST
वीरेंद्र बहादुर सिंह वीरेंद्र बहादुर सिंह
वीरेंद्र बहादुर सिंह Published by: वीरेंद्र बहादुर सिंह Updated Sat, 07 Oct 2023 08:21 AM IST
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सार
सितंबर में अमृता शेरगिल की एक पेंटिंग 61.8 करोड़ रुपये में बिकी। देश में कलाकृतियों के प्रति जिस तरह रुचि बढ़ रही है, उससे उम्मीदें बढ़ी हैं।
 
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interest towards art increasing in india after Amrita Shergill painting auctioned at record price
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

विगत सितंबर में भारतीय कला जगत ने इतिहास रच दिया। अमृता शेरगिल की 1937 की पेटिंग 'द स्टोरी टेलर' 61.8 करोड़ में बिकी, जो भारत की कला जगत की सबसे महंगी बिकने वाली कृति है। इसके 15-16 दिन पहले ही एसएस रजा की पेंटिंग 'गैस्टासन' लंबी चली नीलामी के बाद 51.75 करोड़ रुपये में बिकी थी। नीलामी करने वाली कंपनी पुंडीले ने तो उसकी बेस प्राइस ही 25 करोड़ रुपये रखी थी। पर उन्हें तब आश्चर्य हुआ, जब दोगुनी कीमत में सौदा तय हुआ। रजा के पहले यह रिकॉर्ड वीएस गाइतोंडे के नाम था। उनकी पेंटिंग 2022 की नीलामी में 48.3 करोड़ रुपये में बिकी थी। इस तरह भारत के कलाकारों का रिकॉर्ड एक के बाद एक टूटता रहा, ऐसा पहली बार हुआ है।



नीलामी करने वाली विश्व की ऐसी शिखर कंपनियों में स्थान रखने वाली 'क्रिस्टी' की अब भारत में भी शाखा है। रजा की पेंटिंग की विश्व में सबसे अधिक मांग है। वर्ष 2018 में 'तपोवन' नाम का उनका आर्टवर्क लंदन की नीलामी में 28 करोड़ रुपये में बिका था, जबकि 'सौराष्ट्र' नाम की पेंटिंग 18 करोड़ में बिकी थी। पेंटर फ्रांसिस न्यूटन सूजा की 'हंगर' शीर्षक वाली पेंटिंग 34.5 करोड़ में बिकी थी। देश के ही अन्य पेंटर तैयब मेहता की कृति 'टू हीड्स' भी प्रसिद्ध है। एमएफ हुसेन और अकबर पद्मसी की पेंटिंग की भी मांग है।


देश में भारतीय और विदेशी आर्टवर्क खरीदने- बेचने और नीलामी करने वाली कंपनियां बढ़ती जा रही हैं। देश की नई पीढ़ी अब आर्ट को केवल शौक के रूप में ही नहीं अपना रही, बल्कि उसे भारत या विश्व के बाजार में किस तरह लाया जाए, इसमें भी रुचि लेने लगी है। इस क्षेत्र में सलाहकार और एजेंट भी बढ़ते जा रहे हैं। नीलामी करके देने वाली स्टार्ट अप कंपनियां भी खुलती जा रही हैं।

देश में कला बाजार पिछले 20 वर्षों में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर का हो गया है। डिजिटल टेक्नोलॉजी के कारण वैश्विक संपर्क आसान हुआ है। आगामी 16 से 19 नवंबर को मुंबई के महालक्ष्मी रेसकोर्स में देश का सर्वप्रथम आर्ट फेयर आयोजित हो रहा है, जिसमें भारतीय शहरों की 50 से अधिक आर्ट गैलरी के अलावा लंदन की ग्रोस्वेनोर भी भाग लेने वाली है। आगामी फरवरी महीने में नई दिल्ली में भी इसका आयोजन होने वाला है।

कलाकृतियों का वैश्विक बाजार 68 अरब डॉलर (5,44,000 करोड़ रुपये) का है, जबकि वर्ष 2022-23 में भारत का आर्ट बाजार 1,120 करोड़ रुपये का था और इसमें भारत की कुल 3,883 कलाकृतियां बिकी थीं। कहा जाता है कि पांच साल में यह आंकड़ा दोगुना हो गया है, और अगले दो साल में इसके भी दोगुना बढ़ने की संभावना है।

विश्व के कुल आर्ट बाजार में अमेरिका का 42 प्रतिशत का हिस्सा है, तो यूरोप का 23 प्रतिशत। भारत की पेंटिंग 18 से 80 करोड़ में बिकती है, तो हमारी आंखें फैल जाती हैं। पर दुनिया की सबसे ऊंची कीमत पर नजर डालें, तो चौंक जाएंगे। इतनी अंधाधुंध रकम देकर यह पेंटिंग खरीदता कौन है? एक ऐसा वर्ग खरीदार है, जो शेयर बाजार में और सोना-चांदी या जमीन में जिस तरह पैसा निवेश करता है, उसी तरह कलाकृति में भी निवेश करता है और भविष्य में जरूरत पड़ती है, तो उसे विश्व बाजार में या नीलामी में रखता है।

दूसरा वर्ग ऐसा है, जो नीलामी में अन्य बोली लगाने वालों को पछाड़ कर बाजार में अपनी आर्थिक ताकत की धाक खड़ी करता है। कला बाजार में कुछ ऐसे भी एजेंट होते हैं, जो किसी खिलाड़ी, फिल्मी कॉरपोरेट हस्ती या श्रीमंत के लिए कलाकृतियां खरीदते हैं। कलाकृतियों की खरीद दरअसल स्मार्ट निवेश है। भारी खर्च दिखाना हो, तो आर्ट कृति इसमें काफी मदद करती है। 25 लाख रुपये की पेंटिंग या कलात्मक वस्तु या एंटीक का दाम एक करोड़ रुपये भी बताया जा सकता है।

आगामी दशक भारत के कलाकारों का हो सकता है, क्योंकि दुनिया का ध्यान भारत ने खींचा है। अब तो कला और डिजाइन की शिक्षा देने वाली संस्थाएं भी खुलती जा रही हैं। एक समय यूरोप विश्व में आर्थिक ताकत था, क्योंकि वह कला और संस्कृति तथा म्युजियम की संस्कृति वाला था। अब हम भी अपनी प्राचीन अतुलनीय परंपरा को जीवित कर सकते हैं।

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