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नीयत और नीति, दोनों साफ

Sun, 13 Nov 2016 06:56 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 13 Nov 2016 06:56 PM IST
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Intention and policy, both clean
तवलीन सिंह

जिस रात प्रधानमंत्री ने टीवी पर घोषित किया कि रात के बारह बजने के बाद न पांच सौ रुपये के नोटों की कोई अहमियत रहेगी और न हजार रुपये के नोटों की, मेरा ध्यान अमेरिका के आम चुनाव पर था। अमेरिकी दोस्तों के फोन आने लग गए थे, यह कहने कि उनको विश्वास था कि डोनाल्ड ट्रंप हार जाएंगे। ऐसी ही बातें राजनीतिक पंडितों ने नरेंद्र मोदी की जीत के पहले भी की थीं और अगले दिन मुंह की खानी पड़ी थी सबको। सीएनएन पर अमेरिकी चुनाव की चर्चा सुन रही थी कि किसी ने फोन करके कहा कि प्रधानमंत्री टीवी पर एक महत्वपूर्ण घोषणा करने जा रहे हैं। देसी चैनल जब लगाया, तो प्रधानमंत्री कह रहे थे कि उन्हें तकलीफ होती है कि एक तरफ ऐसे गरीब टैक्सी चालक और सब्जीवाले हैं, जो किसी ग्राहक के खोए हुए पैसे लौटा देते हैं तो दूसरी तरफ सबसे धनवान नागरिक हैं, जो टैक्स की चोरी करते हैं। फिर ऐलान किया कि कल से भारत के सबसे बड़े नोट बेकार हो जाएंगे।

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मैंने पर्स खोलने पर पाया कि मेरे पास सौ रुपये के नोट बहुत थोड़े हैं और सोचने लगी कि अगले दिन बैंक बंद रहेंगे, तो गुजारा कैसे चलेगा। ऐसा आपमें से कइयों ने भी सोचा होगा। अधिकतर लोग प्रधानमंत्री के इस कदम से खुश हैं, क्योंकि हम सब जानते हैं कि नुकसान उन्हें ज्यादा होगा, जिन्होंने काले धन के भंडार छुपा रखे हैं। इनमें से सबसे ज्यादातर हैं राजनीतिक नेता।
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याद कीजिए उस केंद्रीय मंत्री की कहानी, जिसके घर पर जब सीबीआई ने छापा मारा, तो तीन करोड़ से ज्यादा रुपये मिले चादरों में लिपटे, गद्दों के नीचे छिपाए हुए। इंदिरा गांधी के समय जब भी चुनाव पास आते थे, तो दिल्ली में अफवाहें फैलने लगती थीं कि एक बार फिर मॉस्को से बक्सों में रुपये भर कर आए हैं। बहुत बाद में जब सोवियत संघ टूट के बिखर गया, तो केजीबी के वसिली मित्रोखिन ने अपनी किताब में स्पष्ट शब्दों में लिखा कि उस समय के कई आला मंत्री और अधिकारी सोवियत सरकार से रिश्वत लेते थे।
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मैंने अपनी आंखों से चुनाव के समय राजनेताओं के घरों में काले धन के भंडार देखे हैं, जो इकट्ठा किए जाते हैं उद्योगपतियों से। मुंबई के बड़े उद्योगपति दोनों तरफ पैसा देते हैं, ताकि जो भी दल जीते सिकंदर वही रहते हैं। यह पैसा चुपके से देना पड़ता है, सो काला धन रखने का एक अहम कारण यह भी है। बड़े-बड़े सरकारी सौदों में तो तकरीबन हर सौदे में मंत्रीजी को रिश्वत देने की गुंजाइश रहती है। यह आदत अब सरपंचों और ग्राम प्रधानों ने भी डाल ली है। ऐसा नहीं है कि काला धन व्यापारियों और उद्योगपतियों के पास नहीं होता है। होता है, लेकिन अक्सर पाया जाता है उन छोटे व्यापारियों के पास, जिनके पास इतना पैसा नहीं होता है कि किसी वकील या मुनीम को टैक्स भरने का काम दे सकें। टैक्स भरना इतना पेचीदा काम है कि बिना किसी की मदद के मुझसे होता ही नहीं है। सो प्रधानमंत्री से विनती है कि वह हम सबके वास्ते इसे आसान बनाएं। और देश के वास्ते राजनीतिक दलों के धन बटोरने में पारदर्शिता लाई जाए। यह दो कदम अगर शीघ्र नहीं उठाए जाते, तो कुछ ही महीनों में फिर से फलेगी काली अर्थव्यवस्था। फर्क इतना होगा कि जहां आज काला धन हजार रुपयों के नोटों में है, भविष्य में दो हजार रुपये के नोटों के रूप में होगा। नीयत आपकी साफ है और नीति भी, पर अब यह दो कदम और चलकर दिखाने होंगे।

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