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असुरक्षा का बेवजह हल्ला
तवलीन सिंह
Updated Sun, 10 Jun 2018 06:31 PM IST
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तवलीन सिंह
पिछले दिनों ईसाई पादरियों ने इतना हल्ला मचाया कि ऐसा लगने लगा कि भारत में ईसाइयों पर अत्याचार अचानक बढ़ गए हों। पहले दिल्ली के आर्चबिशप ने पत्र लिखकर घोषित किया कि संविधान को इतना खतरा है कि देश में मुसीबत आने वाली है। फिर मुंबई के वृद्ध और प्रसिद्ध पुलिस अधिकारी जूलियस रिबेरो ने इसी को दोहराते हुए अंग्रेजी के एक अखबार में लंबा लेख लिखा। यह सिलसिला चल ही रहा था कि गोवा के आर्चबिशप ने भी पत्र लिखकर यही बातें कहीं। इतना हल्ला मचा कि मैंने सोचा कि जरूर कुछ ऐसी घटनाएं हुई होंगी, जिनके कारण यह सब हो रहा है।
अखबारों और इंटरनेट को खूब टटोलने के बाद जब ईसाइयों पर अत्याचार की एक भी घटना सामने नहीं आई, तब मैंने ट्वीट करके पूछा कि क्या कोई मुझे अत्याचार की हाल में घटी किसी घटना के बारे में बता सकता है। सवाल का जवाब एक प्रसिद्ध हिंदी पत्रकार से मिला कि ईवैंजेलिकल फेडरेशन ऑफ इंडिया नाम की संस्था के मुताबिक, 2017में ईसाइयों पर अत्याचार की 351 घटनाएं हुई हैं।
मैंने ट्वीट करके नेशनल हेराल्ड की इस संपादक से 10 घटनाओं की सूची मांगी और उसका जवाब जब नहीं मिला, तो मुझे विश्वास होने लगा कि यह हल्ला उसी किस्म का है, जो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के फौरन बाद मचने लगा था। तब भी इन्हीं लोगों ने कहा था कि गिरजाघरों और अन्य ईसाई संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं। बाद में पता लगा कि यह काम कुछ छोटे-मोटे चोर कर रहे थे और धर्म-मजहब से इन घटनाओं का कोई वास्ता नहीं था।
सो सवाल यह उठता है कि ईसाइयों को भारतीय जनता पार्टी के इस दौर में इतनी तकलीफ क्यों हो रही है कि आज कौम के बड़े-बड़े नेता कांग्रेस का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। इस सवाल का जब मैं जवाब ढूंढने लगी, तो मुझे याद आया कि कांग्रेस के दौर में ईसाइयों और ईसाई संस्थाओं को खास दर्जा दिया गया था। मेरा निजी तौर पर किसी ईसाई संस्था से वास्ता बहुत वर्ष पहले तब हुआ, जब मुझे शिमला के एक ईसाई कॉलेज में पढ़ने का मौका मिला था। शिक्षा के मामले में वह कॉलेज काफी कमजोर था, लेकिन धर्म-मजहब के मामलों में इतना तेज था कि रोज कहीं न कहीं हमको ईसाई बन जाने के लिए प्रेरित करने की बातें हुआ करती थीं।
मैं तकरीबन नास्तिक हूं, सो धार्मिक विचारों में मुझे खास रुचि नहीं है, लेकिन उस कॉलेज में तब मेरा भी खून खौलने लगा था, जब एक बार मदर मार्ग्रेट नाम की एक कनाडियन सिस्टर ने खुलकर कहा कि जिनको स्वर्ग तक पहुंचने की उम्मीद है, उनको मरने के बाद ईसाई बनना ही पड़ेगा। मुझे याद है कि हम सब उठकर उसकी कक्षा से निकल आए थे। उस घटना के बाद थोड़ी-बहुत तहकीकात करने से हमें यह भी मालूम पड़ा कि उस कॉलेज में ईसाई लड़कियों को हमसे आधी फीस देने की छूट थी।
ऐसा कई ईसाई शिक्षा संस्थानों में होता है, लेकिन किसी हिंदू कॉलेज में अगर यह नियम होता, तो क्या होता, जरा सोचिए। ज्यादा सोचने की जरूरत ही नहीं है, अगर आप इस बात को ध्यान में रखें कि एक पूर्व राष्ट्रपति को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय में जाने पर कितना हल्ला मच गया है। कहने का मतलब यह है कि कांग्रेस की परंपरा रही है कि ‘सेक्यूलरिज्म’ सिर्फ हिंदुओं के लिए अनिवार्य है, मुसलमानों और ईसाइयों के लिए नहीं। नरेंद्र मोदी के दौर में इस परंपरा को तोड़ने की थोड़ी-बहुत कोशिश हुई है, सो हंगामा हो जाता है कभी-कभी उस समय भी, जब हंगामा करने का कारण न हो।
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अखबारों और इंटरनेट को खूब टटोलने के बाद जब ईसाइयों पर अत्याचार की एक भी घटना सामने नहीं आई, तब मैंने ट्वीट करके पूछा कि क्या कोई मुझे अत्याचार की हाल में घटी किसी घटना के बारे में बता सकता है। सवाल का जवाब एक प्रसिद्ध हिंदी पत्रकार से मिला कि ईवैंजेलिकल फेडरेशन ऑफ इंडिया नाम की संस्था के मुताबिक, 2017में ईसाइयों पर अत्याचार की 351 घटनाएं हुई हैं।
मैंने ट्वीट करके नेशनल हेराल्ड की इस संपादक से 10 घटनाओं की सूची मांगी और उसका जवाब जब नहीं मिला, तो मुझे विश्वास होने लगा कि यह हल्ला उसी किस्म का है, जो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के फौरन बाद मचने लगा था। तब भी इन्हीं लोगों ने कहा था कि गिरजाघरों और अन्य ईसाई संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं। बाद में पता लगा कि यह काम कुछ छोटे-मोटे चोर कर रहे थे और धर्म-मजहब से इन घटनाओं का कोई वास्ता नहीं था।
सो सवाल यह उठता है कि ईसाइयों को भारतीय जनता पार्टी के इस दौर में इतनी तकलीफ क्यों हो रही है कि आज कौम के बड़े-बड़े नेता कांग्रेस का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। इस सवाल का जब मैं जवाब ढूंढने लगी, तो मुझे याद आया कि कांग्रेस के दौर में ईसाइयों और ईसाई संस्थाओं को खास दर्जा दिया गया था। मेरा निजी तौर पर किसी ईसाई संस्था से वास्ता बहुत वर्ष पहले तब हुआ, जब मुझे शिमला के एक ईसाई कॉलेज में पढ़ने का मौका मिला था। शिक्षा के मामले में वह कॉलेज काफी कमजोर था, लेकिन धर्म-मजहब के मामलों में इतना तेज था कि रोज कहीं न कहीं हमको ईसाई बन जाने के लिए प्रेरित करने की बातें हुआ करती थीं।
मैं तकरीबन नास्तिक हूं, सो धार्मिक विचारों में मुझे खास रुचि नहीं है, लेकिन उस कॉलेज में तब मेरा भी खून खौलने लगा था, जब एक बार मदर मार्ग्रेट नाम की एक कनाडियन सिस्टर ने खुलकर कहा कि जिनको स्वर्ग तक पहुंचने की उम्मीद है, उनको मरने के बाद ईसाई बनना ही पड़ेगा। मुझे याद है कि हम सब उठकर उसकी कक्षा से निकल आए थे। उस घटना के बाद थोड़ी-बहुत तहकीकात करने से हमें यह भी मालूम पड़ा कि उस कॉलेज में ईसाई लड़कियों को हमसे आधी फीस देने की छूट थी।
ऐसा कई ईसाई शिक्षा संस्थानों में होता है, लेकिन किसी हिंदू कॉलेज में अगर यह नियम होता, तो क्या होता, जरा सोचिए। ज्यादा सोचने की जरूरत ही नहीं है, अगर आप इस बात को ध्यान में रखें कि एक पूर्व राष्ट्रपति को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय में जाने पर कितना हल्ला मच गया है। कहने का मतलब यह है कि कांग्रेस की परंपरा रही है कि ‘सेक्यूलरिज्म’ सिर्फ हिंदुओं के लिए अनिवार्य है, मुसलमानों और ईसाइयों के लिए नहीं। नरेंद्र मोदी के दौर में इस परंपरा को तोड़ने की थोड़ी-बहुत कोशिश हुई है, सो हंगामा हो जाता है कभी-कभी उस समय भी, जब हंगामा करने का कारण न हो।