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निवेश बढ़ाने से ही खत्म होगी असमानता

Mon, 10 Feb 2020 03:04 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Mon, 10 Feb 2020 03:04 AM IST
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Inequality will end only by increasing investment
स्वास्थ्य - फोटो : a

सरोज (छद्म नाम) मेरे यहां अंशकालिक घरेलू सहायक के रूप में काम करती है। उसने तीसरी कक्षा के बाद स्कूली पढ़ाई छोड़ दी थी। वह दक्षिण दिल्ली के पांच घरों में काम करती है और देश की राजधानी दिल्ली में मुश्किल से उतना ही कमा पाती है, जितने में किसी का गुजर-बसर हो सके। जिस झुग्गी में वह रहती है, वह अस्वास्थ्यकर है। इसलिए अक्सर वह बीमार पड़ जाती है। इसके बावजूद डॉक्टर के पास जाने से वह बचती है, क्योंकि इसके लिए उसे काम से ज्यादा छुट्टी लेनी पड़ती है और कभी-कभी खर्च भी अधिक हो जाता है। वह कहती है कि उसके पास इतना समय नहीं है कि वह सरकारी अस्पतालों की लंबी कतार में खड़ी रहे। सरोज की त्रासदी यह है कि उसके पास कोई विकल्प नहीं है। अगर कोई उसे घरेलू कामों में मदद के लिए नहीं रखे, तो वह भूखी रह जाएगी। सरोज ने इस बारे में कभी सोचा नहीं कि अगर दस साल बाद उस जैसों की नौकरी कम हो जाएगी, तो क्या होगा। अभी वह छब्बीस साल की है।


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ऐसे ही लाखों भारतीय युवा हैं, जो शब्दों और मुहावरों को यांत्रिक रूप से दोहराकर अपनी आजीविका कमाते हैं। जिसने टेली मार्केटर के फोन का अनुभव किया है, वह इसे जानता है। कोई उनसे उनके काम के बारे में गंभीर सवाल पूछे और जो वस्तु या सेवा वे बेच रहे होते हैं, उसके बारे में जानना चाहे, तो वे नहीं बता पाएंगे। अगर इस तरह की नौकरियां भी खत्म हो गईं, तो क्या होगा? तब ये भारतीय युवा क्या करेंगे? उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि उन्हें क्या करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है?

देश की आबादी में युवा लोगों की संख्या ज्यादा हैं, लेकिन कटु सच्चाई यह है कि देश इन युवाओं को रोजगार देने में सक्षम नहीं है। 20-24 वर्ष की उम्र के 37 फीसदी लोगों के पास ही रोजगार है। जबकि देश की 65 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है। यह वास्तव में चिंता की बात है कि भारत मानव पूंजी के एक बड़े संकट का सामना कर रहा है। इसका मतलब यह है कि लोगों के पास ऐसी नौकरी या काम तो नहीं ही है, जो उन्हें सभ्य जीवन प्रदान कर सके, लाखों युवाओं के पास शिक्षा, कौशल और स्वास्थ्य सुविधाओं का भी अभाव है, जिसके चलते वे जीवन सोपान पर आगे नहीं बढ़ पाते और काम की नई उभरती दुनिया में नहीं पहुंच पाते।

दूसरी ओर अनेक ऐसे युवा भी हैं, जिनके माता-पिता के पास धन, संपर्क और बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने की महत्वाकांक्षा है और जिसे वे देश के भीतर और बाहर पैसे से खरीद सकते हैं। यह उन युवाओं को भविष्य का कौशल हासिल करने का लाभ प्रदान करता है, और अगर वे प्रतिबद्ध हैं तथा अपने जीवन में आने वाले अवसरों को पकड़ते हैं, तो वे जीवन में अच्छा करने में सक्षम होते हैं। बुनियादी मजबूती में यह व्यापक अंतर असमानताओं को गहरा करेगा, जो ज्यादा सामाजिक अशांति और परेशानी खड़ी कर सकता है। सामाजिक क्षेत्र, खासकर स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक संरक्षण पर सरकारी खर्च बढ़ती सामाजिक/आर्थिक असमानता से निपटने के लिए काफी महत्वपूर्ण है। लेकिन वह भी नहीं हो पा रहा। यह व्यापक तौर पर माना जा रहा है कि 2020-21 के केंद्रीय बजट में सामाजिक क्षेत्र के लिए बहुत कम आवंटन किया गया है। हालांकि वित्त मंत्री ने तीन-सूत्री एजेंडे 'आकांक्षी भारत', 'आर्थिक विकास' और 'देखभाल करने वाले समाज' का लक्ष्य हासिल करने के बारे में बातें कीं, ताकि सभी नागरिकों को जीवन में सहूलियत हो सके।

आकांक्षी भारत के तहत सरकार बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की स्थिति तक पहुंच के जरिये अपने नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस ऐंड पॉलिसी के एन आर भानुमूर्ति और भबेश हजारिका ने हाल ही में एक राष्ट्रीय दैनिक में टिप्पणी की कि इस दिशा में 2019-20 के बजट के संशोधित अनुमानों की तुलना में 11.79 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 2020-21 के लिए सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र में 1.64 लाख करोड़ रुपये के बजट का आवंटन किया गया है। सबसे बड़ी कामकाजी आबादी होने की भारत की क्षमता को पहचानते हुए यह बजट गुणवत्तापूर्ण कार्यबल तैयार करने के लिए नई शिक्षा नीति का संकेत देता है। लेकिन भारत में नीतियों की कभी कमी नहीं रही है। असल समस्या है उन नीतियों के क्रियान्वयन की। हालांकि बजट में अधिक समतामूलक समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों को समायोजित करने की कोशिश की गई है, पर सबसे बड़ी चुनौती योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर है। अक्सर जमीनी स्तर की क्रियान्वयन एजेंसियों के बीच क्षमता में अंतर पाए जाते हैं। इस बजट में कुछ हद तक क्षमता संबंधी अंतराल को पाटने के लिए शहरी निकाय स्तर पर युवा इंजीनियरों के लिए इंटर्नशिप कार्यक्रम का प्रस्ताव रखा गया है, जो स्वागतयोग्य कदम है। संसाधनों का कुशल उपयोग सुनिश्चित करना राज्य सरकारों और जिला अधिकारियों पर निर्भर करता है।

सामाजिक क्षेत्र पर केंद्रीय व्यय समग्र सार्वजनिक व्यय का एक छोटा-सा अनुपात है। शिक्षा पर करीब 15 फीसदी और स्वास्थ्य पर करीब 25 फीसदी केंद्र खर्च करता है, शेष खर्च राज्य सरकारों द्वारा वहन किया जाता है। भारत को शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान व विकास और श्रम बाजार के बुनियादी ढांचे में अधिक समग्र निवेश की आवश्यकता है। हमें निजी क्षेत्र के निवेश पर फौरी प्राप्ति के तर्क से पीछे हटने की जरूरत है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा पर निवेश और मानव पूंजी को मजबूत करने का परिणाम तुरंत मिल भी सकता है और नहीं भी, लेकिन मध्यम अवधि और दीर्घकाल में इनके बिना न तो कोई व्यक्ति और न ही कोई देश सफल हो सकता है। हमें औसत उत्पादकता स्तरों में भी सुधार की जरूरत है।

सरोज जैसी लाखों युवतियां हैं। उनके पास विकल्प होना चाहिए। लेकिन मात्र तीसरी कक्षा तक शिक्षा के कारण उसके विकल्प बेहद सीमित हैं। वे भारत का भविष्य हैं। हमें इस दिशा में कदम उठाने की जरूरत है। सामाजिक असमानता बढ़ने का मतलब है जनसांख्यिकी लाभांश के बजाय ज्यादा सामाजिक अशांति और जनसांख्यिकी आपदा।

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