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'इनडोमिटेबल स्पिरिट'
ओम गुप्ता
Updated Sat, 19 Jul 2014 09:11 PM IST
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आप जीवन में क्या बनना चाहते हैं? आप किस रूप में अपने को याद किया जाना पसंद करेंगे, इसे एक कोरे कागज पर लिख डालिए। हो सकता है, यह पन्ना मानव की विकास यात्रा का एक अविस्मरणीय पृष्ठ बन जाए और आपको अपने राष्ट्र के इतिहास में उसी पेज के लिए याद किया जाए। यह इकलौता पन्ना एक नई खोज का हो सकता है, एक नए सूत्र को जन्म दे सकता है। या फिर एक नए अनुसंधान की शुरुआत हो सकता है वह अन्याय के विरुद्ध बजाया गया बिगुल।
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इन प्रेरक शब्दों के रचयिता हैं, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम। भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति। वे सीधे-सादे शब्दों में अपनी बात कहते हैं। मुहावरों या लोकोक्तियों की लच्छेदार भाषा में नहीं। ऐसी जुबान जो सीधी दिल में उतर जाए। कलाम ने एक सपना देखा था। सन् 2020 में भारत का एक सुनहरा सपना। इसे उन्होंने अपनी पुस्तक 'इनडोमिटेबल स्पिरिट' में लिपिबद्ध किया। यह एक प्रेरक ग्रंथ है। इसकी चर्चा आज तक होती है। यह एक तिलिस्म था। भारत को गौरवशाली बनाने का। इसमें उन्होंने महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी चिंताओं को अभिव्यक्त किया है। इसमें अनेक विषयों पर उनकी सोच झलकती है। इनका ताल्लुक मानवीय, राष्ट्रीय और सार्वभौमिक प्रश्नों का समाधान ढूंढने से है। डॉ. कलाम की लेखनी विश्वास जगाती है, लगभग जादुई शब्दों में यह पाठक के दिलो-दिमाग में सीधे प्रवेश करती है।
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अटूट संकल्प को तत्कालीन राष्ट्रपति कलाम ने लगातार उठाया, लेकिन वे इसका मंत्रजाप नहीं करते थे। यह केवल जोशीला संवाद नहीं होता था। यह उनकी अपनी जीवन यात्रा की छवि प्रस्तुत करता था, जो उन्होंने रामेश्वरम के समुद्र तट से शुरू करके राष्ट्रपति भवन के भव्य गलियारों तक तय की।
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अटूट संकल्प मानवीय मूल्यों, विचारों, आदर्शों को एक कड़ी में पिरोता है। इन उद्गारों को उन्होंने समय-समय पर अपने उद्बोधनों में शामिल किया। वे अपने संस्मरणों और देखे-सुने का भरपूर इस्तेमाल करते थे। इससे उनका कथन जीवंत हो उठता था। 'इनडोमिटेबल स्पिरिट' एक अनूठे ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को प्रस्तुत करती है। इसमें एक व्यक्ति का संघर्ष है, एक वैज्ञानिक की मेधा है, एक अध्यापक का चिंतन है और एक राष्ट्रपति की दिव्यदृष्टि भी।
पुस्तक में अपनी मां को पूर्णिमा के चांद को देखते हुए उन्होंने एक कविता रचीः
मैं उस दिन दस का था,
तुम्हारी गोद में लेटा हुआ,
बड़े भाई-बहन को चिढ़ाता हुआ
पूरे चांद की रात थी, पर मेरे
जीवन में केवल तुम थीं, मेरी मां सिर्फ तुम
आधी रात को जब जागा तो
आंसू मेरे घुटने पर गिर रहे थे।
तुम ही समझी थीं, मेरा दर्द मेरी मां
तुम्हारे सहलाते हाथ मेरी मां
तुम्हारा प्यार, मिटाता दर्द मेरा,
प्रेम, फिक्र, ताउम्र हारा विश्वास मेरा संबल
बिना डॉ. के दुनिया के सामने और मेरा ईश्वर
हम फिर मिलेंगे,
उसके दरबार में, आखिरी फैसले के दिन।
अंत में कलाम लिखते हैं, हर किसी को खोजना होता है, खुद को और गढ़नी होती है खुद की जिंदगी।
अपने आत्मविश्वास पर वे लिखते हैं- ‘मुझे सात वर्ष के लिए एक बालक सौंपो। इसके बाद चाहे भगवान कोशिश करे या फिर शैतान। वे उस बालक का कुछ नहीं बिगाड़ सकता।’ उनका अध्यापकों पर गहन यकीन है। दुनिया में अध्यापन से बड़ा कोई पेशा नहीं है। एक अच्छा अध्यापक, जो सुनियोजित हो, वही ज्ञानी कहलाता है। अध्यापकों का मिशन होता है, युवा मानस को प्रज्जवलित करना। किसी राष्ट्र की नींव में अध्यापक का खून पसीना होता है। उन्हें हमेशा बौद्धिक ईमानदारी और करुणा जाग्रत करनी होती है।
अंत में वे लिखते हैं- ‘फूल को देखो, कितनी उदारता से यह सुगंध और शहद देता है। फूल इनके बदले कोई उम्मीद नहीं करता। फूल की तरह बनो। तमाम गुणों के बावजूद बिना किसी अहंकार के।’