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भारतीय चिंतन : संकीर्ण मानसिकता से सर्वाधिक खतरा, आखिर मतांतरण को 'सेकुलर' कवच कब तक?

Sun, 20 Nov 2022 06:21 AM IST
Balbir Punj बलबीर पुंज
Updated Sun, 20 Nov 2022 06:21 AM IST
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सार
भारत में जो वाम-उदारवादी और स्वघोषित संविधान-रक्षक एकेश्वरवाद प्रेरित मतांतरण का 'मौन-समर्थन' करते है और उसके विरोध को 'मजहबी स्वतंत्रता पर खतरा', 'बहुसंख्यकवाद का दमन' बताकर दूषित नैरेटिव स्थापित करते हैं, वे ब्रिटेन आदि देशों के 'सेकुलरवाद' को अनुकरणीय मानते हैं।
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Indian thought: biggest danger from narrow mindedness, how long will secular shield for conversion last
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

'जबरन मतांतरण करना न केवल मजहबी स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है, अपितु यह देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा हो सकता है।' यह वक्तव्य न ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का है, न किसी भाजपा नेता या मोदी सरकार का। यह टिप्पणी 14 नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश एमआर शाह और न्यायाधीश हिमा कोहली की खंडपीठ ने एक संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए की है। 



मतांतरण पर बहस एक शताब्दी से अधिक पुरानी है। इसके समर्थक इसे 'आस्था की स्वतंत्रता' के अधिकार से जोड़कर देखते हैं। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अन्य मानवाधिकारों की तरह पसंदीदा पूजा-पद्धति अपनाने का अधिकार भी अक्षुण्ण होता है। इन अधिकारों को जहां कई घोषित इस्लामी-ईसाई गणराज्यों के साथ चीन रूपी वामपंथी देशों में चुनौती मिलती है, वहीं भारत में उसकी अनंतकालीन बहुलतावादी सनातन संस्कृति के अनुरूप सभी प्रकार के मानवाधिकारों के साथ पसंदीदा पूजा-पद्धति अपनाने की स्वतंत्रता है। परंतु 'आस्था के अधिकार' का उपयोग छल-कपट या लालच-लोभ से किसी का मजहब परिवर्तन करना क्या सभ्य समाज को स्वीकार्य होगा?- वह भी भारत जैसे देश में, जिसे मजहब के नाम पर 75 वर्ष पहले दो हिस्सों में बांट दिया गया था। 


पाकिस्तान-बांग्लादेश अस्तित्व में क्यों आए? क्योंकि अविभाजित भारत की जनसंख्या के एक बड़े भाग ने यह कहकर विभाजन की मांग कर दी कि उनकी सभी पहचानों (राष्ट्रीयता सहित) में से मुस्लिम पहचान सर्वोच्च है। उसी मजहबी पहचान ने देश तोड़ दिया। आज वही टूटा हिस्सा- पाकिस्तान न केवल खंडित भारत को अपना घोषित शत्रु मानता है, अपितु उसे 'हजारों घाव देकर मौत के घाट उतारने' की नीतिगत योजना भी बनाता रहता है। इस मानसिकता को स्वामी विवेकानंद ने वर्ष 1899 में रेखांकित किया था। उन्होंने तब प्रबुद्ध भारत पत्रिका से बात करते हुए कहा था, 'जब हिंदू समाज का एक सदस्य मतांतरण करता है, तो समाज की एक संख्या कम नहीं होती, बल्कि हिंदू समाज का एक शत्रु बढ़ जाता है।' इसी भावना को सर्वोच्च न्यायालय ने दूसरे शब्दों में दोहराया है। 

जिस मोहम्मद अली जिन्ना ने ब्रितानियों और वामपंथियों के साथ मिलकर सैयद अहमद खान के 'दो राष्ट्र सिद्धांत' को मूर्त रूप देकर पाकिस्तान को जन्म दिया था- उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि गुजराती हिंदू थी। मोहम्मद इकबाल, जिन्होंने 1931 में पाकिस्तान का भौगोलिक खाका खींचा था- के पूर्वज कश्मीरी हिंदू थे। कश्मीर को इस्लाम के नाम पर संकट में झोंकने वालों में शामिल शेख अब्दुल्ला के पूर्वज भी हिंदू थे। किसी को लालच देकर मतांतरण हेतु प्रेरित या विवश करना- क्या 'आस्था की स्वतंत्रता' होनी चाहिए? इसे 'आत्मा का व्यापार' कहा जाता है। जब मनुष्य देह के खरीद-फरोख्त (मानव-तस्करी सहित) को अनैतिक और आपराधिक कहा जाता है, तो 'आत्मा के व्यापार' को सभ्य समाज कैसे स्वीकार कर सकता है? 

मतांतरण से स्थानीय संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ता है? विगत 1,413 वर्षों में अरब से विश्व के जिस भू-भाग में इस्लाम ने प्रवेश किया- उस क्षेत्र की मूल संस्कृति, परंपरा और जीवन शैली को कालांतर में तलवार के बल पर या तो बदल दिया गया या फिर उसका प्रयास आज भी हो रहा है? भारतीय उपमहाद्वीप के कई क्षेत्रों के अतिरिक्त ईरान, इराक, सीरिया, कोसोवो आदि इसके प्रमाण हैं। यह बहुत दिलचस्प है कि भारत में जो वाम-उदारवादी और स्वघोषित संविधान-रक्षक एकेश्वरवाद प्रेरित मतांतरण का 'मौन-समर्थन' करते है और उसके विरोध को 'मजहबी स्वतंत्रता पर खतरा', 'बहुसंख्यकवाद का दमन' आदि बताकर दूषित नैरेटिव स्थापित करते है, वे यूनाइटेड किंगडम आदि देशों के 'सेकुलरवाद' को अनुकरणीय मानते हैं। 

क्या ऐसा है? ब्रिटेन में 'चर्च ऑफ इंग्लैंड', जिसके संरक्षण हेतु ब्रितानी राजघराना प्रतिबद्ध और शपथबद्ध है- उसके कुल 42 में से 26 बिशप-आर्कबिशपों के लिए ब्रितानी संसद के उच्च सदन 'हाउस ऑफ लॉर्ड्स' में स्थान आरक्षित होता है। शासकीय वरिष्ठता में कैंटरबरी के आर्कबिशप ब्रितानी प्रधानमंत्री से ऊपर होते हैं। वहां राजकीय खर्च पर चर्च प्रेरित स्कूलों में लाखों छात्र पढ़ते हैं। यह सुविधा अन्य मजहबों को प्राप्त नहीं। क्या ऐसा 'सेकुलरवाद' आदर्श हो सकता है? वास्तव में, यह विवाद 'आस्था की स्वतंत्रता' का नहीं है। 

एक ओर भारतीय सनातन संस्कृति है, जिसका मूल मंत्र है-एकं सत विप्रा बहुधा वदंति-अर्थात  ईश्वर एक है, उस तक पहुंचने के कई मार्ग हो सकते हैं। दूसरी तरफ एकेश्वरवादी चिंतन है, जिसमें केवल उनका ईश्वर 'सच्चा', शेष 'झूठे' और 'फरेब' होने का सिद्धांत है। इसी तथाकथित 'झूठ' और 'फरेब' को मिटाने हेतु विश्व में कई मजहबी संघर्ष- क्रूसेड और जिहाद हुए हैं। इसमें लाखों निरपराध इसलिए मार दिए गए, क्योंकि वे उनके अनुसार 'सच्चे' नहीं थे। मानवता विरोधी यह युद्ध आज भी जारी है, जिसका समयानुसार, स्वरूप बदल गया है- बाकी उद्देश्य और एजेंडा अब भी अपरिवर्तित है। विश्व शांति और मानव-कल्याण को इस संकीर्ण मानसिकता से सर्वाधिक खतरा है।

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