{"_id":"1b8fa386-d058-11e2-8462-d4ae52bc57c2","slug":"indian-politician-charan-singh","type":"story","status":"publish","title_hn":"राजनीति की जमीन पर जनता का एक आदमी","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
राजनीति की जमीन पर जनता का एक आदमी
कल्लोल चक्रवर्ती
Updated Sat, 08 Jun 2013 09:56 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
यह भारतीय राजनीति की बड़ी विडंबना है कि देश के सबसे बड़े राज्य का जननेता कहलाने और पूरा जीवन किसानों की बेहतरी के लिए बिता देने के बावजूद चरण सिंह को वैसी राष्ट्रीय पहचान नहीं मिली, जैसी उनके एकाधिक पूर्ववर्तियों और समकालीनों को मिली।
विज्ञापन
बल्कि सुनियोजित ढंग से उनकी जैसी छवि बना दी गई, वह तो और भी दुर्भाग्यपूर्ण थी। मसलन, बतौर मंत्री उन पर गरीब पू्र्वी उत्तर प्रदेश के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया गया, तो एक जाति विशेष की राजनीति करने की बात कहकर उनका कद छोटा करने की कोशिश भी की जाती रही।
विज्ञापन
जबकि वह उन बिरले राजनेताओं में थे, जो उत्तर प्रदेश की पिछड़ी जातियों को गोलबंद करने की क्षमता रखते थे। भूमि सुधार को अंजाम देने वाले चरण सिंह विकास का तर्क देकर छोटे राज्यों की वकालत करते थे। लेकिन उनके आलोचकों का कहना था कि वह उत्तर प्रदेश का विभाजन चाहते हैं, ताकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एकछत्र नेता बन सकें!
विज्ञापन
चरण सिंह के व्यक्तित्व में ऐसा क्या था, जिस कारण जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी, दोनों ने उनसे दूरी बरती? चरण सिंह वस्तुतः जमीन से जुड़े खांटी नेता थे, जो खेती-किसानी का इस हद तक समर्थन करते थे कि सरकारी नौकरियों में साठ फीसदी इन्हीं के परिवारजनों के लिए आरक्षित रखने के हिमायती थे।
वह उन बड़े उद्योगों के भी घनघोर विरोधी थे, जिन्हें नेहरू ने भारत के नए मंदिर की संज्ञा दी थी। कांग्रेस की चारण संस्कृति तो उन्हें नापसंद थी ही, उनका पश्चिमी उत्तर प्रदेश का होना भी शायद कांग्रेस नेतृत्व की नापसंदगी का एक कारण रहा हो।
चूंकि चरण सिंह पर ब्रिटिश लेखक पॉल आर ब्रास की किताब का यह दूसरा खंड 1957 से 1967 पर ही केंद्रित है, लिहाजा इसके आधार पर चौधरी जी के पूरे राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन मुमकिन नहीं। लेकिन पंडित संपूर्णानंद के मुख्यमंत्री काल में राजस्व मंत्री से लेकर सुचेता कृपलानी की सरकार में मंत्री और फिर कांग्रेस से बाहर निकलकर मुख्यमंत्री बनने तक का उनका सफर एक ईमानदार राजनेता के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में ही ज्यादा बताता है।
अपने कठोर व्यक्तित्व के कारण चरण सिंह मुख्यमंत्रियों के प्रियपात्र भी नहीं रहे और उनके महत्वपू्र्ण सुझावों की भी लगातार अनदेखी की जाती रही। यह किताब उत्तर प्रदेश के बहाने आजादी के बाद के भारत में व्याप्त राजनीतिक भ्रष्टाचार के बारे में भी बताती है।
इसमें राजनेताओं और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार के विवरण तो हैं ही, भ्रष्ट लोगों को बचाने की कवायद के ब्यौरे भी हैं। मुख्यमंत्रियों को उपहार देने के लिए उगाही की परंपरा भी उत्तर प्रदेश में नई नहीं है, साठ के दशक में ही इसकी शुरुआत हो चुकी थी। ऐसी भ्रष्ट राजनीति के बीच चरण सिंह का जीवन सचमुच प्रेरणा देता था।