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फार्मा इंडस्ट्री: दवा के लिए भारत पर निगाहें, वैश्विक आपूर्ति शृंखला को बनाना होगा मजबूत
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यकीनन इस समय देश का दवा उद्योग घरेलू और वैश्विक मांग की पूर्ति करने के लिए छलांगें लगाकर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। दुनिया भर के देशों से दवाई की आपूर्ति बढ़ाने के निर्यात आदेश मिल रहे हैं। वित्तमंत्री ने दवा उद्योग के लिए अनुसंधान एवं नवाचार के जोरदार प्रावधान किए हैं। फार्मा उद्योग का जो बजट पिछले वर्ष करीब 100 करोड़ रुपये का था, उसे बढ़ाकर करीब 1,250 करोड़ रुपये किया गया है।
अमेरिका, यूरोप और रूस सहित अनेक देशों में दवाइयों की आपूर्ति में कमी के बीच दवा के लिए दुनिया की निगाहें अब भारत की ओर लगी हुई हैं। ऐसे में भारत दुनिया की नई फार्मेसी और वैक्सीन हब के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। इस समय भारत दवा उत्पादन के मामले में विश्व में तीसरे स्थान पर है और दवाई के मूल्य के मद्देनजर 14वें क्रम पर है। वैश्विक मंदी के बीच भी वित्त वर्ष 2022-23 में भारत से दवा का निर्यात 27 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर को छू सकता है।
भारत से दवाओं का निर्यात न केवल गरीब और विकासशील देशों को, बल्कि अमेरिका व यूरोप सहित विभिन्न विकसित देशों में भी किया जा रहा है। इस वर्ष अनेक भू-राजनीतिक कारणों से दवाओं की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित रही, लेकिन भारत ने दवाओं का निर्यात जारी रखा। इससे हमारे दवा उद्योग पर दुनिया का भरोसा बढ़ा है और अप्रैल, 2022 से सितंबर, 2022 तक देश के फार्मास्यूटिकल्स और चिकित्सा उपकरणों के क्षेत्र में एफडीआई प्रवाह 8,081 करोड़ रुपये रहा है।
चूंकि भारत में दवाई उत्पादन की लागत अमेरिका एवं पश्चिमी देशों की तुलना में बहुत कम है, इसलिए भारत घरेलू और वैश्विक बाजारों के लिए उच्च गुणवत्ता और कम लागत वाली दवाओं के निर्माण में प्रभावी भूमिका निभा रहा है। दुनिया की करीब 70 प्रतिशत जेनेरिक दवाओं की मैन्यूफैक्चरिंग भारत में ही होती है। जेनेरिक दवाओं के मामले में अफ्रीका की कुल मांग का 50 प्रतिशत, अमेरिका की मांग का 40 प्रतिशत तथा ब्रिटेन की कुल दवा मांग का 25 प्रतिशत हिस्सा भारत से ही जाता है। दुनिया की 60 फीसदी वैक्सीन का भी उत्पादन भारत में होता है। इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन की अनिवार्य टीकाकरण योजनाओं के लिए 70 प्रतिशत टीकों की आपूर्ति भारतीय कंपनियों द्वारा की जाती है।
कोरोना महामारी से जूझ रहे दुनिया के 150 से अधिक देशों को भारत ने जरूरी दवाइयां मुहैया कराई। कोरोना काल में फार्मा सेक्टर की कई वस्तुओं का भारत बड़ा उत्पादक और निर्यातक बन गया। भारत दुनिया में सर्जिकल मास्क, मेडिकल गॉगल्स और पीपीई किट का बड़े पैमाने पर निर्यात कर रहा है। भारत हेपेटाइटिस बी से लेकर एचआईवी व कैंसर जैसी घातक बीमारियों के लिए भी काफी सस्ती दवा बना रहा है।
केंद्र सरकार ने दवाई उत्पादन में आत्मनिर्भरता लाने, अधिक कीमतों वाली दवाइयों के स्थानीय विनिर्माण को प्रोत्साहन देने और चीन से आयात होने वाले दवाइयों के कच्चे माल-एपीआई के भारत में ही उत्पादन हेतु ढाई वर्ष पहले प्रोडक्शन लिंक इंसेंटिव्स (पीएलआई) स्कीम शुरू की थी, जिसे बड़ी सफलता मिली है। देश में पीएलआई स्कीम के कारण फार्मा उत्पादों के आयात में भारी कमी आई है। लेकिन फार्मा सेक्टर में जो चमकीली संभावनाएं निर्मित हुई हैं, उन्हें बरकरार रखने के लिए पीएलआई योजना से दवाई उत्पादन बढ़ाने पर और अधिक ध्यान केंद्रित करना होगा। कच्चे माल की उपलब्धता में सुधार करने हेतु देश के विभिन्न राज्यों में फार्मा सेक्टर से संबंधित कच्चे माल की विनिर्माण इकाइयों तथा इनक्यूबेटर सेंटरों की स्थापना के लिए सरकार को समर्थन बढ़ाना होगा। फार्मा सेक्टर से संबंधित बुनियादी ढांचे को मजबूत करना होगा। निवेश के लिए इंटरनेशनल पार्टनर्स तलाशने होंगे। वैश्विक आपूर्ति शृंखला को मजबूत बनाने बारे में रणनीति बनानी होगी।
उम्मीद करें कि भारत का फार्मा सेक्टर जो वर्तमान में 50 अरब डॉलर से अधिक मूल्य का है, वह 2030 तक करीब 130 अरब डॉलर और 2047 तक करीब 450 अरब डॉलर की ऊंचाई पर दिखाई दे सकेगा।