जानना जरूरी है: राधा की उपासना के लिए पितामह ब्रह्मा ने दिया षोडशाक्षर मंत्र, फिर भगवती तुलसी का प्रादुर्भाव
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विस्तार
राजा धर्मध्वज अपनी पत्नी माधवी के साथ गंधमादन पर्वत पर रहते थे। कुछ समय बाद माधवी ने कार्तिक की पूर्णिमा पर एक कन्या को जन्म दिया। कन्या का मुख शरद पूर्णिमा के चंद्रमा के समान मनोहर था। उसके नेत्र शरत्कालीन प्रफुल्ल कमल के समान सुंदर थे। अधर पके हुए बिंबा फल की तुलना कर रहे थे। हाथ और पैर के तलवे लाल थे। नाभि गहरी थी। शीतकाल में उसके संपूर्ण अंग गरम रहते और उष्णकाल में वह शीतलांगी बनी रहती थी। उसकी कांति पीले चंपक की तुलना कर रही थी। स्त्री और पुरुष उसे देखकर किसी के साथ तुलना करने में असमर्थ थे; अतएव विद्वान पुरुषों ने उसका नाम ‘तुलसी’ रखा। जन्म लेते ही कन्या सुयोग्या बन गई। लोगों के मना करने पर भी उसने बदरीवन में जाकर कठिन तपस्या करने का निश्चय किया। वह भगवान नारायण को पति रूप में पाना चाहती थी। हजारों वर्षों की कठोर तपस्या से उसका शरीर अत्यंत क्षीण हो गया था। आखिर उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा उसे वर देने के लिए प्रकट हुए। चतुर्मुख ब्रह्माजी बोले, ‘तुलसी! तुम्हारी जो इच्छा हो, वही वर मांग लो। मैं तुम्हें कोई भी वरदान देने के लिए तैयार हूं।’ तब तुलसी ने कहा, ‘पितामह! मैं पूर्वजन्म में तुलसी नाम की गोपी थी। गोलोक मेरा निवास स्थान था। मुझे भगवान श्रीकृष्ण की प्रिया और उनकी प्रेयसी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। परंतु एक दिन रास की अधिष्ठात्री देवी राधा ने रोष में मुझे शाप दिया, ‘तुम मानव-योनि में उत्पन्न होओ।’ यह सुनकर गोविंद मुझसे बोले, ‘देवी! तुम भारतवर्ष में रहकर तपस्या करो। ब्रह्मा तुम्हें वर देंगे, जिससे तुम श्रीविष्णु को पति के रूप में प्राप्त करोगी।’
कृष्ण के वचन के बाद मैंने वह शरीर त्याग दिया और फिर भूमंडल पर उत्पन्न हुई। मैंने यह तपस्या भगवान नारायण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए की थी। अब आप मेरी अभिलाषा पूर्ण करने की कृपा करें।’
ब्रह्मा बोले-‘श्रीकृष्ण के अंश से उत्पन्न सुदामा नामक एक गोप ने भी राधिका के शाप से दनु के कुल में जन्म लिया है। वह ‘शंखचूड़’ नाम से प्रसिद्ध है। वह इस समय समुद्र में विराजमान है। उसे पूर्वजन्म की सभी बातें स्मरण हैं। तुम भी पूर्वजन्म के सभी प्रसंगों से परिचित हो। इस जन्म में वह श्रीकृष्ण का अंश तुम्हारा पति होगा। इसके बाद भगवान नारायण तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। लीलावश वे नारायण तुमको शाप देंगे, जिसके कारण तुम्हें वृक्ष बनकर भारत में रहना पड़ेगा और समस्त जगत को पवित्र करने की योग्यता तुम्हें प्राप्त होगी। संपूर्ण पुष्पों में तुम प्रधान मानी जाओगी। भगवान् विष्णु तुम्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय मानेंगे। तुम्हारे बिना पूजा निष्फल समझी जाएगी। वृंदावन में वृक्ष रूप में रहते समय लोग तुम्हें ‘वृंदावनी’ कहेंगे। तुमसे उत्पन्न पत्तों से गोपी और गोपों द्वारा भगवान माधव की पूजा संपन्न होगी। तुम मेरे वर के प्रभाव से वृक्षों की अधिष्ठात्री देवी कहलाओगी।’
ब्रह्मा की अमर वाणी सुनकर तुलसी हर्षित हो गई। उसने ब्रह्मा को प्रणाम किया और बोली, पितामह! दो भुजा से शोभा पाने वाले श्यामसुंदर भगवान श्रीकृष्ण को पाने के लिए मेरी जैसी अभिलाषा है, वैसी चतुर्भुज श्रीविष्णु के लिए नहीं है; परंतु उन गोविंद की आज्ञा से ही मैं चतुर्भुज श्रीहरि के लिए प्रार्थना करती हूं। भगवन! आप ऐसी कृपा करें कि उन्हीं गोविंद को मैं पुनः प्राप्त कर सकूं। साथ ही मुझे राधा के भय से भी मुक्त कर दीजिए। ब्रह्माजी बोले, ‘मैं राधा के षोडशाक्षर मंत्र का उपदेश तुम्हें देता हूं। तुम इसे हृदय में धारण कर लो। इसके प्रभाव से तुम राधा को प्रिय हो जाओगी। भगवान गोविंद के लिए तुम वैसी ही प्रेयसी बन जाओगी, जैसी राधा हैं। इस प्रकार ब्रह्मा ने तुलसी को भगवती राधा का षोडशाक्षर मंत्र प्रदान किया। साथ ही स्तोत्र, कवच, पूजा की संपूर्ण विधियां तथा किस क्रम से अनुष्ठान करना चाहिए-ये सभी बातें भी बतलाईं। इसके बाद देवी तुलसी ने भगवती राधा की उपासना की और उनकी कृपा से वह भी राधा के समान सिद्ध हो गईं। उस मंत्र के प्रभाव से ब्रह्मा ने जैसा कहा था, वैसा ही फल तुलसी को प्राप्त हुआ। तपस्या-संबंधी जो भी क्लेश थे, वे मन से सदा के लिए दूर हो गए।