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दर्रे पर दरार: नेपाल वाकई समाधान चाहता है, तो व्यावहारिक ढंग से आए पेश
लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी क्षेत्रों को लेकर नेपाल पहले भी आवाज उठाता रहा है, लेकिन इस बार उसका स्वर अधिक औपचारिक और दृढ़ है। काठमांडो ने कूटनीतिक संवाद की इच्छा जताई जरूर है, पर अगर वह वाकई समाधान चाहता है, तो उसे व्यावहारिक ढंग से पेश आना होगा।
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हाल ही में लिपुलेख दर्रे को कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए दोबारा खोलने की भारत की घोषणा और उस पर नेपाल की नई बालेन सरकार द्वारा आपत्ति जताना, भारत और नेपाल के बीच समय-समय पर उभरते तनाव की उसी कड़ी का हिस्सा है, जो पहले भी दोनों पड़ोसियों के बीच संबंधों में कूटनीतिक खटास पैदा करती रही है। दरअसल, नेपाल का तर्क पुराना है, पर इस बार उसका स्वर अधिक औपचारिक व दृढ़ है। काठमांडो का कहना है कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी महाकाली नदी के पूर्व स्थित वे क्षेत्र हैं, जो 1816 की सुगौली संधि के अनुसार नेपाल का हिस्सा हैं, और भारत व चीन बगैर उसकी सहमति के इस क्षेत्र को तीर्थ व व्यापार मार्ग की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। गौरतलब है कि 2019 में जब भारत ने जम्मू-कश्मीर का विभाजन कर दो केंद्रशासित प्रदेश बनाए, तब भी नेपाल ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कालापानी को अपना क्षेत्र बताया था। भारत का पक्ष भी उतना ही स्पष्ट है। नई दिल्ली का कहना है कि लिपुलेख मार्ग से कैलाश-मानसरोवर यात्रा कोई नई व्यवस्था नहीं, बल्कि 1954 से प्रचलित परंपरागत मार्ग है। भारत के लिए यह केवल धार्मिक यात्रा का प्रश्न नहीं, बल्कि उत्तराखंड से तिब्बत तक जुड़ा एक पुराना संपर्क बिंदु भी है, जिसे वह प्रशासनिक व ऐतिहासिक रूप से अपना मानता है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी की काठमांडो यात्रा प्रस्तावित है। ऐसे में, यह विवाद केवल एक सीमा-रेखा का नहीं, बल्कि भारत-नेपाल संबंधों की संवेदनशीलता, पड़ोस नीति की परिपक्वता और हिमालयी भू-राजनीति की जटिलताओं से जुड़ा प्रश्न भी बन गया है। समस्या केवल दावों और प्रतिदावों की नहीं है। मूल प्रश्न यह है कि आखिर ऐसे विवादों का स्थायी समाधान क्या हो सकता है। भारत-नेपाल संबंधों की प्रकृति किसी सामान्य पड़ोसी देशों जैसी नहीं है। खुली सीमा, रोटी-बेटी का रिश्ता, गहरी सांस्कृतिक निकटता और सामरिक परस्परता, ये सभी दोनों देशों को अनिवार्य साझेदार बनाते हैं। यही वजह है कि दोनों के बीच सीमा विवाद, चाहे वह कितना ही पुराना क्यों न हो, राजनीतिक रूप से बहुत जल्दी भावनात्मक रूप ले लेता है। नहीं भूलना चाहिए कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से ही भारत ने कालापानी में चौकियां स्थापित कीं और वहां से कभी हटा भी नहीं। नेपाल ने भी पूर्ववर्ती ओली सरकार से पहले दशकों तक इस मामले में चुप्पी साधे रखी। अब बालेन सरकार ने भारत के साथ कूटनीतिक वार्ता जारी रखने की मंशा जताई है, लेकिन अगर काठमांडो वास्तव में समाधान चाहता है, तो उसे घरेलू राजनीति से ऊपर उठकर व्यावहारिक ढंग से संवाद की दिशा में बढ़ना होगा।
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