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एआई के वैश्विक नक्शे में भारत: डिजिटल क्रांति अपनाने में अमेरिका-जापान पीछे

mukul shrivastava मुकुल श्रीवास्तव
Updated Fri, 24 Apr 2026 07:00 AM IST
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सार
भारत 92 फीसदी एआई एडॉप्शन दर के साथ विश्व के अग्रणी देशों की सूची में शीर्ष पर है। यह भारत की डिजिटल शक्ति को तो दर्शाता ही है, वैश्विक तकनीकी नक्शे पर बदलाव का संकेत भी देता है।
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india leads global ai adoption rate 92 percent digital transformation future economy us japan behind
आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वैश्विक अर्थव्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) अब एक तकनीकी शब्द नहीं, बल्कि ‘चौथी औद्योगिक क्रांति’ का मुख्य स्तंभ बन चुका है। हाल ही में, बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप रिपोर्ट 2025 के आंकड़ों के अनुसार, भारत 92 फीसदी एआई एडॉप्शन दर के साथ विश्व के अग्रणी देशों की सूची में पहले स्थान पर है। यह आंकड़ा भारत की डिजिटल शक्ति को तो दर्शाता ही है, वैश्विक तकनीकी मानचित्र पर बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत भी देता है।


रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने स्पेन (78 फीसदी) और ब्राजील (76 फीसदी) जैसे उभरते बाजारों को बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया है। हैरानी की बात है कि अमेरिका व जापान जैसे तकनीकी परिपक्व देश एआई एडॉप्शन की दौड़ में पिछड़ रहे हैं। यहां ‘एडॉप्शन’ का अर्थ केवल एआई के परिचय से नहीं, बल्कि सप्ताह में कई बार सक्रिय उपयोग से है। भारत की बढ़त के पीछे कई तर्क दिए जा सकते हैं, जिनमें प्रमुख है भारत की विशाल युवा आबादी का ‘डिजिटल नेटिव’ होना। संज्ञानात्मक लचीलापन युवाओं में अधिक होता है, जिससे वे नई जटिल तकनीकों को शीघ्र आत्मसात कर लेते हैं। दूसरा है, लीपफ्रॉगिंग की प्रवृत्ति, यानी भारत ने कई पारंपरिक चरणों को छोड़कर सीधे उन्नत डिजिटल समाधानों को अपनाया है। तीसरा कारण है, भारतीय श्रम बाजार में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा का होना। यहां एआई को ‘जॉब रिप्लेसमेंट’ के बजाय ‘जॉब एनहांसमेंट’ टूल के रूप में देखा जा रहा है, जिससे उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि होने की संभावना है।


भारत की ‘नंबर 1’ रैंकिंग ‘एआई रेडीनेस’ (एआई तत्परता) को भी रेखांकित करती है। भारत सरकार का ‘इंडियाएआई’ मिशन, नेशनल स्ट्रेटजी फॉर एआई और प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में एआई पाठ्यक्रमों का समावेश इसे आधार प्रदान कर रहा है। नीति आयोग का भी कहना है कि एआई अपनाने से 2035 तक जीडीपी में 957 अरब अमेरिकी डॉलर और देश की वार्षिक विकास दर में 1.3 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। एआई को प्रशिक्षित करने के लिए डाटा ही ईंधन है। जापान व अमेरिका जैसे देशों में निम्न एडॉप्शन दर के पीछे ‘संस्थागत जड़ता’ और ‘सख्त नियामक ढांचे’ उत्तरदायी हैं, जिसमें एआई के लिए जरूरी आंकड़ों की पूर्ति के लिए सख्त नियम हैं। दूसरा, वहां डाटा गोपनीयता व कॉपीराइट कानूनों की जटिलता ने तकनीक के मुक्त प्रसार को धीमा किया है, जबकि भारत में ‘ओपन-सोर्स कल्चर’ और नवाचार के प्रति उदार दृष्टिकोण ने इसे गति दी है। भविष्य में भारत को भी ऐसे कई सवालों से दो-चार होना पड़ेगा। सबसे जरूरी है कि भारत में एआई इस्तेमाल का स्वरूप कैसा होगा? क्या भारत केवल वैश्विक एआई मॉडल्स का उपभोक्ता बना रहेगा, या खुद के ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स’ (एलएलएम) विकसित कर पाएगा? इसका उत्तर अभी स्पष्ट नहीं है।

हमें एल्गोरिदमिक पूर्वाग्रह और डाटा संप्रभुता पर शोध की जरूरत है, ताकि तकनीक निष्पक्ष हो और डिजिटल उपनिवेशवाद से बचा जा सके। एल्गोरिदमिक पूर्वाग्रह डाटा में छिपे सामाजिक पूर्वाग्रहों को दोहराता है, जिससे एआई द्वारा भेदभावपूर्ण निर्णय संभव है। वहीं, डाटा संप्रभुता सुनिश्चित करती है कि भारतीयों का डाटा देश की सीमाओं व कानूनों के अधीन रहे। 92 फीसदी एडॉप्शन रेट प्रमाण है कि भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था भविष्य की चुनौतियों के लिए न केवल तैयार है, बल्कि उन्हें आकार देने में सक्षम है।     
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