चीन के संकट से अछूता नहीं भारत
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चीन के संपत्ति और शेयर बाजार में गंभीर उतार-चढ़ाव का जो चक्र दिख रहा है, उसने कई विश्लेषकों को यह कहने के लिए मजबूर किया है कि अगली एशियाई मंदी चीन में आएगी। ठीक उसी तरह, जैसे वर्ष 2008 में अमेरिकी शेयर एवं संपत्ति बाजार में गिरावट ने वैश्विक मंदी को जन्म दिया था। इसे लेकर आम सहमति बढ़ रही है कि संपत्ति, वस्तुओं और शेयरों में अत्यधिक निवेश की वजह से चीन का जो वित्तीय संकट गहरा रहा है, वह एशिया और चीन के साथ व्यापार व निवेश से गहरे जुड़े अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में मंदी के रुझान पैदा कर सकता है।
भारत पहले से ही चीन की मंदी के प्रभाव को महसूस कर रहा है, और अब जब उसने युआन का अवमूल्यन किया है, तब स्टील, एल्यूमीनियम, टायर और रसायनों के भारी आयात की संभावना बढ़ गई है। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने कहा है कि चीन और अन्य देशों द्वारा मुद्रा का अवमूल्यन चिंता की बात है और भारत को इसके लिए जरूरी कदम उठाने की जरूरत पड़ सकती है। भारतीय मुद्रा पहले ही डॉलर की तुलना में 65 रुपये से नीचे चली गई है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि वर्ष के अंत तक यह 68 रुपये तक जा सकता है। जब अन्य देश अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करते हैं, तब भारतीय वस्तुएं वैश्विक बाजार में होड़ करने में पिछड़ जाती हैं। जैसे कि पिछले आठ महीनों में भारतीय निर्यात में नकारात्मक विकास दिखा है। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने घरेलू उद्योग पर चीन के सस्ते आयात के प्रभाव को निर्धारित करने के लिए एक अध्ययन शुरू किया है। इस मामले में पहले ही खतरे की घंटी बज चुकी है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले पूर्व कार्यकारी निदेशक अरविंद विरमानी कहते हैं, 'एक मायने में एशिया में चीन प्रेरित आर्थिक मंदी पहले से ही है और हमें देखना होगा कि यह कब तक जारी रहती है। भारत पर चीन की अधिक्षमता का असर पड़ सकता है, जो एशिया में अपने सभी व्यापारिक साझेदारों को अंधाधुंध निर्यात करता रहेगा।' वह तर्क देते हैं कि यह संकट तब तक रहेगा, जब तक चीन की अधिक्षमता का अपने आप समाधान नहीं निकलता और मांग व आपूर्ति के बीच एक नया संतुलन स्थापित नहीं होता। हालांकि इसमें कुछ वर्ष लगेंगे।
इसलिए चीन के इस संकट पर सभी अर्थव्यवस्थाओं, खासकर एशियाई पड़ोसियों को सतर्क नजर रखने की जरूरत है। इंडोनेशिया के उप राष्ट्रपति जूसुफ कल्ला ने हाल ही में कहा कि वह यूनान से ज्यादा चीन की घटनाओं से चिंतित थे।
चीन की अर्थव्यवस्था की हवा निकलने का सबसे पहला बड़ा संकेत यह है कि सिंगापुर पहले से ही नकारात्मक विकास दर (-4.5 फीसदी) से जूझ रहा है। अधिक से अधिक विदेशी व्यापार और निवेश प्रवाह पर निर्भर सिंगापुर को आर्थिक कसौटी के तौर पर देखा जाता है।
भारत को भी भारी मात्रा में चीन के सस्ते स्टील आयात से जूझना पड़ रहा है। अप्रैल, 2014 से स्टील आयात में अप्रत्याशित रूप से 70 फीसदी की वृद्धि हुई है, जिसमें से ज्यादातर आयात चीन से हुआ है। यह तब हो रहा है, जब घरेलू स्टील उद्योग की उत्पादन क्षमता पिछले छह-सात वर्षों में दोगुनी हुई है। चूंकि चीन भारतीय बाजार में सस्ते दामों पर स्टील का लगातार निर्यात कर रहा है, ऐसे में कारोबार प्रभावित होने के कारण देश की कई स्टील कंपनियां हाल के महीनों में बैंकों का कर्ज न चुकाने के कारण डिफॉल्टर हो गई हैं। भारतीय इस्पात उद्योग पर बैंकों के कर्ज का करीब 50 अरब डॉलर बकाया है। और यदि चीन स्टील की दर और कम करता है, तो न केवल हमारे घरेलू इस्पात उद्योग का संकट बढ़ेगा, बल्कि उन्हें कर्ज दे चुके बैंक भी प्रभावित होंगे।
इसलिए भारत चीन के इस संकट से अछूता नहीं है, जैसा कि कुछ नीति-निर्माता संभवतः मान सकते हैं। तथ्य यह है कि वैश्विक जीडीपी में चीन अकेला सबसे ज्यादा योगदान (35 फीसदी से ज्यादा) करता है। यदि इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था आगे के महीनों में आंशिक तौर पर भी संकट में फंसती है (जिस पर अर्थशास्त्रियों में सहमति है), तो चीन की विकास दर पांच फीसदी के करीब रहने के लिए बाध्य होगी। अभी चीन सात फीसदी जीडीपी दर का दावा कर रहा है, लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि यह छह फीसदी के करीब है और आने वाले वर्षों में पांच फीसदी तक जा सकती है।
2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को 600 अरब डॉलर का प्रोत्साहन दिया था। उस प्रोत्साहन पैकेज के बूते ही चीन का सकल घरेलू उत्पाद 2009 के 50 खरब डॉलर से दोगुना होकर अब सौ खरब डॉलर हो चुका है। पर चीन अब पिछली मंदी की तरह प्रोत्साहन पैकेज का बोझ नहीं झेल सकता। इसलिए वहां आंशिक आर्थिक सुस्ती अपरिहार्य है।
इसका असर अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ेगा। अब तक न तो हमारे प्रधानमंत्री और न ही वित्त मंत्री ने इस संकट के बारे में कुछ कहा है। अरविंद विरमानी कहते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से पर, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है, तब तक नकारात्मक असर पड़ेगा, जब तक कि चीन की अधिक्षमता का स्वयं हल नहीं निकलता। हालांकि विरमानी को भारतीय अर्थव्यवस्था के उन क्षेत्रों से उम्मीद है, जो चीन और उसके फलस्वरूप एशियाई आर्थिक सुस्ती से प्रभावित नहीं हो सकते हैं।
राजग सरकार ने सड़क, रेलवे और अन्य परिवहन ढांचों में अपनी गतिविधि बढ़ाई है (जिनमें ज्यादातर सार्वजनिक क्षेत्र से वित्तपोषित हैं), ताकि एशिया में चीन प्रेरित मंदी के नकारात्मक प्रभाव को कुछ हद तक कम किया जा सके। अन्यथा भारत आठ फीसदी की दर से विकास नहीं कर सकता, जब ज्यादातर विकासशील अर्थव्यवस्था या तो मंदी में हैं या गंभीर आर्थिक सुस्ती से जूझ रही हैं। चीन के घटनाक्रम के मद्देनजर भारत को एक स्पष्ट रणनीति बनाने की जरूरत है, जो अब तक नहीं हुआ है।