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संविधान: चौहत्तर साल की विकास यात्रा, इस राह पर 50 देशों से बेहतर है हमारा रिकॉर्ड

Sat, 25 Nov 2023 07:00 AM IST
Harbansh Dixit हरबंश दीक्षित
Updated Sat, 25 Nov 2023 07:00 AM IST
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सार
बीते वर्षों में हमने संविधान के तमाम आदर्शों के पालन का प्रयास किया है और अधिकतर मामलों में हमारा रिकॉर्ड शानदार रहा है। हमारे साथ आजाद हुए करीब 50 देशों में से कहीं भी लोकशाही वहां के जनजीवन में वह पैठ नहीं बना पाई है, जो हमारे देश में बनी है।
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India has excellent record to follow all ideals of constitution and democracy in 74 years out of 50 countries
भारतीय संविधान - फोटो : amar ujala

विस्तार

चौहत्तर वर्ष पहले 26 नवंबर, 1949 को हमने अपने संविधान को अधिनियमित तथा अंगीकृत किया था। किसी राष्ट्र के जीवन काल में यह बहुत बड़ा कालखंड नहीं माना जाता, किंतु इन वर्षों में उस राष्ट्र के भविष्य की पीठिका तैयार हो जाती है। संविधिक विकास के लिहाज से शुरुआती कुछ दशक अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इनमें कानूनी व्यवस्था का नया ढांचा तैयार होता है, उसे आत्मसात करने की परंपरा विकसित की जाती है तथा कानून की न्यायिक व्याख्या की दिशा तय होती है। संविधान के माध्यम से हमने अपने राष्ट्र को प्रभुता संपन्न, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया तथा समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय देने का संकल्प लिया। हमने ऐसे समाज की परिकल्पना की, जिसमें विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म तथा उपासना की स्वतंत्रता के साथ ही सभी नागरिकों के लिए प्रतिष्ठा और अवसर की समानता हो।



संविधान आजादी और खुशहाली के वादे का दस्तावेज होता है। संविधान हमें सपने देखने और उसके मुताबिक समाज निर्माण करने की आजादी और जज्बे को भी निरूपित करता है। उसमें केवल काले-सफेद अक्षरों की भरमार नहीं होती, बल्कि वह सुशासन के लिए लिपिबद्ध भावपुंज भी होता है। लेकिन उसे मजबूती देने के दायित्व का निर्वहन उसके नागरिकों को करना होता है। हमारे संविधान के माध्यम से हमारे पूर्वजों ने रामराज्य का सपना देखा था, जिसमें सभी समान हों। सभी लोग कानून की मर्यादा में रहें। राज्यसत्ता को राम की खड़ाऊं मानकर तथा अपने आपको उसका सेवक मानकर जनता की सेवा करें। कानून का पालन निष्पक्षतापूर्वक हो। निर्णय लेते समय किसी का भय न हो तथा किसी वस्तु का लालच उन्हें विचलित न कर सके।


बीते वर्षों में हमने संविधान के तमाम आदर्शों के पालन का प्रयास किया है। और अधिकतर मामलों में हमारा रिकॉर्ड शानदार रहा है। हमारे साथ आजाद हुए करीब 50 देशों में से कहीं भी लोकशाही वहां के जनजीवन में वह पैठ नहीं बना पाई है, जो हमारे देश में बनी है। हमारे पड़ोसी देशों-पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे किसी भी देश में लोकतंत्र कभी खुली हवा में सांस नहीं ले पाया। वह हर समय सैनिक तानाशाही की संगीनों से भयभीत रहा। इस बीच हम सत्रह बार आम चुनावों के माध्यम से केंद्र की सत्ता के शालीन हस्तांतरण के गौरवपूर्ण क्षणों के साक्षी रहे हैं। आम आदमी का जीवन स्तर बेहतर हुआ है। भारतीयों ने पूरे विश्व में अपनी क्षमता की छाप छोड़ी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हम सम्मान से देखे जाते हैं। इसके बावजूद कुछ ऐसे क्षण आए हैं, जब हमने संविधान की मर्यादा से छेड़छाड़ की है, उसे चोट पहुंचाई है और उसकी अवमानना की है। हमारे इस आचरण ने संविधान की प्रतिष्ठा और हमारे लोकतंत्र को चोट पहुंचाई है। हमें उन पर ध्यान देने की जरूरत है। उन दोषों के परिकरण की आवश्यकता है।

हमारा संविधान सामाजिक और आर्थिक न्याय का जीवंत दस्तावेज है। आजादी के बाद के वर्षों में किए गए प्रयास इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। जमींदारी उन्मूलन जैसी ऐतिहासिक उपलब्धियां राष्ट्र के खाते में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हंै। विश्व के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब कुछ हजार जमींदारों से जमीन लेकर लाखों भूमिहीन किसानों को दे दी गई और यह सब कुछ बगैर किसी का खून बहाए हुए शांतिपूर्वक संपन्न हुआ। दुनिया में कोई ऐसा दूसरा उदाहरण नहीं है, जहां इतने व्यापक भूमि सुधार इतने शांतिपूर्वक संपन्न हुए हों। कम्युनिस्ट देश अपने लाखों नागरिकों का खून बहाकर भी भूमि सुधारों के क्षेत्र में जो कुछ हासिल करने में सफल नहीं हो पाए, उसे हमने शांतिपूर्वक लागू कर दिया, जिसका लाभ आज पूरे देश को मिल रहा है।

शिक्षा सामाजिक उन्मेष की आधारशिला है। यह ज्ञान की नई दुनिया का प्रवेश द्वार खोलती है, स्वतंत्र विचारधारा विकसित करने में मदद करती है, भ्रांतियों के अंधकार से बाहर निकालती है और आत्मविश्वास व स्वाभिमान में वृद्धि करती है। इसे संविधान के अनुच्छेद 21(क) के रूप में मूल अधिकार का दर्जा दिया गया है। राज्यों की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के प्रयास हो रहे हैं, ताकि कोई भी बच्चा अशिक्षित नहीं रहे, उसे आगे बढ़ने में कोई बाधा न रहे। यह बहुत बड़ा कदम है।
संविधान का अनुच्छेद 370 और अदृश्य अनुच्छेद 35(अ) हमारे मर्मस्थल पर चुभे हुए कांटे जैसा था। चार वर्ष पहले इस दिशा में की गई सार्थक पहल ने समता, स्वतंत्रता और स्वाभिमान को व्यापकता दी। जम्मू-कश्मीर के अलगाववाद से निपटने में आने वाली सबसे बड़ी बाधा दूर हुई। एक राष्ट्र, एक विधान और एक निशान का संकल्प पूरा हुआ। अब वहां जाने के लिए किसी परमिट की जरूरत नहीं है। देश के दूसरे हिस्से की तरह अब वहां पर शेष भारत का कोई भी व्यक्ति बस सकता है और संपत्ति खरीद सकता है। महिलाओं को बराबरी का हक हासिल हुआ और वंचित-शोषित लोगों को आरक्षण का अधिकार मिला। अनुच्छेद 370 और 35(अ) हमारी राजनीतिक पराजय का प्रतीक था। देश ने उसे संविधान से हटाकर अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल की है।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में दिए गए अपने भाषण में कहा था कि किसी भी देश के संविधान की सफलता उस देश के नागरिकों तथा संविधान को चलाने वालों के चरित्र और उनकी नीयत पर निर्भर करती है। उन्होंने आगे कहा था कि चाहे कितना भी अच्छा संविधान क्यों न हो, यदि उसके चलाने वालों में संविधान के मूल्यों के प्रति समर्पण और उसे लागू करने का जज्बा न हो, तो संविधान निर्जीव अक्षरों का समूह मात्र बना रहेगा। इसके उलट यदि किसी संविधान में कोई कमी रह गई हो, किंतु उसका पालन करने वाले लोग यदि संविधान के उद्देश्यों के प्रति निष्ठावान हैं, तो उन कमियों को दूर करके जीवंत समाज का निर्माण करेंगे। पिछले 74 वर्षों के हमारे अनुभव ने डॉ. आंबेडकर के कथन को अक्षरशः सही होते हुए देखा है। संविधान के उच्च आदर्शों के प्रति हमारी निष्ठा ने बीते वर्षों में हमें अग्रिम पंक्ति तक पहुंचा दिया है। हम केवल वहीं विफल हुए हैं, जहां हमारे नागरिकों और शासक वर्ग ने संविधान के मूल्यों की अनदेखी की है।
-लेखक तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद में विधि संकाय के डीन और प्रोफेसर हैं।

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