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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   India China Border Dispute : This is not China of 1962

यह 1962 का चीन नहीं

Thu, 18 Jun 2020 02:30 AM IST
sudheesh pachauri सुधीश पचौरी
Updated Thu, 18 Jun 2020 02:30 AM IST
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India China Border Dispute : This is not China of 1962
भारत-चीन के बीच वार्ता - फोटो : ANI

हमारा समाज दुहरे तनाव में आ गया है। कोरोना का तनाव तो था ही, अब चीनी हमले का तनाव भी है। यह लगभग वही हालत है, जो 1962 में हुई थी। हां, एक फर्क अवश्य है कि न यह 1962 है, न यह सरकार पंचशीलवादी है। फिर भी, सरकारी जवाब भी एकदम रक्षात्मक नजर आते हैं।


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एक गैर जिम्मेदार विपक्ष, खासकर कांग्रेस इसी बात पर खुश नजर आती है कि चीन की इस चोट ने ‘छप्पन इंच की छाती’ को ‘पांच दशमलव छह इंच’ की छाती बना दिया है। इस अवसर पर भी अगर किसी को मसखरी सूझती है, तो वह चीन की ही मदद करती है। अपना जनतंत्र चीन के लिए ‘सुवेध्य’ बनता है।

यह ठहरकर कर नई विश्व स्थितियों में अपने हित की नई रणनीति व विदेश नीति के बारे में सोचने का वक्त है। जो चीन को जानते हैं, वे खूब जानते हैं कि चीन एक ही साथ कई मोर्चों को खोलने का आदी रहा है। जिस वक्त चीन में माओ की सांस्कृतिक क्रांति चल रही थी, जिसके तहत चीन में माओ द्वारा विपक्ष का सफाया किया जा रहा था।

उसी वक्त वह कम्युनिस्ट वियतनाम से सीमा को लेकर सैनिक कार्रवाई करने में लगा था और कुछ बाद में उसने पूर्व सोवियत संघ से भी सीमाओं के लिए सीमा पर युद्ध छेड़ दिया था। आज चीन जो कुछ कर रहा है, उसके कुछ संकेत 2017 में हुई चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की सत्रहवीं कांग्रेस में चुने गए महासचिव शी जिनपिंग द्वारा तीन घंटे से भी अधिक लंबे भाषण में उपलब्ध हैं।

अपने उस भाषण में शी जिनपिंग ने भविष्य की चीनी रणनीति के बारे में कुछ महत्वपूर्ण संकेत देते हुए एलान किया था कि ‘इस नए युग में केंद्र में चीन होगा; विल टेक सेंटर स्टेज ...इस नए युग में हम ‘चीनी विशेषताओं वाला समाजवादी चीन’ बनाएंगे..। कहने की जरूरत नहीं कि चीन को विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति बनाने का एक सपना कभी माओ ने देखा था, इन दिनों शी जिनपिंग देख रहे हैं।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी से भिन्न है। सोवियत पार्टी इंटरनेशनलिस्ट थी। चीनी पार्टी ‘कन्फ्यूसियसवादी’ और घोर ‘नेशनलिस्ट’ है। सोवियत पार्टी ने पूंजीवादी मुनाफाखोरी को कभी न अपनाया, जबकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी दुनिया की एमएनसीज की बड़ी पूंजी से और उनके मुनाफे के साथ न केवल फ्लर्ट कर रही है, बल्कि पूंजी को गोद में बिठाकर पालती पोसती है।

चीन सिर्फ प्रशासन में कम्युनिस्ट है, बाकी समाज में सबसे घटिया किस्म का पूंजीवादी शोषक है, जो अपने यहां के एक किस्म के ‘स्लेव लेबर’ से बहुराष्ट्रीय निगमों की फैक्टरियां चलवाता है और दुनिया के बाजारों को अपने ‘नो गारंटी वाले, किंतु सस्ते माल से पाटकर अकूत मुनाफा कमाता है और विदेशी कंपनियों को भी कमाई करवाता है।

उसका अपना चीनी गूगल है और अनेक आईटी सिस्टम हैं। यही नहीं, अपना माल दुनिया के बाजारों में बेरोक-टोक पहुंचाने के लिए उसने बहुत से देशों में कॉरिडोर बना दिए हैं। यह हमारे जाने हुए ब्रिटिश या फ्रेंच या अमेरिकी साम्राज्यवाद से एकदम भिन्न किस्म का शी जिनपिंग के चीन का ‘नव साम्राज्यवाद’ है।

यह 1962 वाला सिर्फ ‘विस्तारवादी चीन’ नहीं है, बल्कि नए किस्म का साम्राज्यवादी चीन है, जो अपने माल को बेचने के लिए दुनिया भर में संजाल बिछा चुका है और जहां नहीं बिछा पाया, वहां बिछाने के चक्कर में है। भारत उसके संजाल का विरोधी है, इसलिए वह उसके टारगेट पर है।

गलवां इसी का नतीजा है। उसके कुछ प्रवक्ताओं को, जो हमारे टीवी चैनलों में चीन का पक्ष रखते हैं, उनकी बातें देखें तो साफ हो जाता है कि चीन ने जो वायरस युद्ध छेड़ा है, उसका फलागम वह पहले से जानता था। नेपाल को उकसाकर, श्रीलंका को उम्मीद से रखकर अपने स्पर्धी भारत को दबाव में लाने का चीनी उपक्रम अचानक नहीं है।

क्लासिकल मार्क्सवादी विचार मानता रहा है कि कम्युनिस्ट तंत्र के साथ निरे पूंजीवाद का निर्वाह संभव नहीं। पुराने मार्क्सवादी मानते हैं कि कम्युनिज्म और पूंजीवाद दो विपरीत विश्व व्यवस्थाएं हैं, इनके बीच मित्रता संभव नहीं, क्योंकि इनके बीच ‘न सुलझ सकने वाले अंतर्विरोध’ काम करते हैं।

पूंजी और तंत्र के इस प्रकट अंतर्विरोध के बारे में अब तक यही माना जाता रहा है कि कम्युनिस्टों को जब पूंजी मिलती है, तो जल्द ही वे पूंजीवादी सोच के आदी हो जाते हैं और इस तरह एक दिन ऐसा आता है कि पूंजीवादी विचार बढ़कर कम्युनिस्ट विचारों को धराशायी कर देते हैं। सोवियत संघ में ऐसा हुआ और एक दिन वह खत्म हो गया। 

लेकिन यह सब तब हुआ, जब पचास साल चलाए गए लंबे शीतयुद्ध के दौरान पूंजीवादी देशों ने अरबों डॉलरों के निवेश के जरिये जगह-जगह  ‘सोवियत स्टडीज’ बनाए। समाजवादी गुलामी के बरक्स ‘स्वतंत्रता’ का नारा खोजा और प्रचारित किया, समाजवादी निरंकुशता को लेकर बहसें चलाई, वैचारिक सांस्कृतिक मोर्चे खोले। तब जाकर सोवियत संघ गिरा।

लेकिन अमेरिका यूरोप के कॉरपोरेटों के पास चीन को उखाड़ फेंकने को लेकर ऐसा कोई सोच विचार नहीं है। इसके उलट बहुराष्ट्रीय निगमों का तो हित इसी में है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अपने लेागों से उनकी फैक्टरियों में सस्ता श्रम कराती रहे, दुनिया के बाजार में उनका माल बिकता रहे और चीन के खजाने को हिस्सा मिलता रहे।

इसीलिए आज कोविड की मार से त्राहि-त्राहि करते पश्चिमी देशों में अगर चीन द्वारा छेड़े इस ‘जैविक युद्ध’ को लेकर कोई बहुत गुस्सा नहीं दिखता, तो इसीलिए कि उनके कॉरपोरेट चीन में हैं, जहां से वे बिना किसी ट्रेड यूनियनबाजी के झंझट के कमाई करते हैं।

चीन ने विश्व के पूंजीपतियों की इसी कमजोर नब्ज का फायदा उठाया और इसीलिए कोविड जैसे जैविक अस्त्र चलाकर भी वह रक्षात्मक नहीं है। जैसी दीर्घकालीन रणनीति कभी सोवियत संघ को रोकने के लिए बनाई गई थी, वैसी चीन के खिलाफ नहीं बनाई गई। और मान लिया गया कि एक दिन पूंजी का लालच उसे भी गिरा देगा।

ऐसे लोग भूल गए कि मार्क्स ने यह भी लिखा था कि कई बार आदमी की ‘इच्छाशक्ति’, वस्तुगत स्थितियों पर भारी पड़ती है। चीन यही कर रहा है। चीन का सदियों से हमेशा पिटते रहने का कटु अनुभव और जागा हुआ राष्ट्रवाद आज दुनिया को जीत लेने के चक्कर में है। जब शी जिनपिंग ने कहा कि चीन ही केंद्र में होगा, तो वह यही कह रहे थे कि अब दुनिया में चीन का ही बोलबाला होगा।

यही तो वह ‘चीनी विशेषताओं वाला समाजवाद’ है, जो बड़ी पूंजी के साथ खेलते हुए इन दिनों पूंजी को बना रहा है। जब तक हम चीन की रणनीति के ऐसे अनेक नए मुहावरों और संकेतों को नहीं समझेंगे, हम चीन को नाथ नहीं पाएंगे। और ऐसे सक्षम विचार केंद्र बनाने के लिए अमेरिका आगे नहीं आएगा, यह पहल अब भारत को ही करनी होगी! (लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)

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