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शिक्षा: युवाओं को सीमित विकल्पों में न बांधें... सभी हितधारक मिलकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करें

Thu, 24 Apr 2025 06:27 AM IST
दीपक कुमार शर्मा प्रो. गरिमा गुप्ता और प्रो. दुष्यंत कुमार राय
प्रो. गरिमा गुप्ता और प्रो. दुष्यंत कुमार राय Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Thu, 24 Apr 2025 06:27 AM IST
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सार
नई शिक्षा नीति में किसी कोर्स में प्रवेश के भी कई द्वार हैं और साथ ही उससे बाहर आने के भी। लेकिन इसके विरोध के पीछे सियासत के सिवाय कुछ नहीं।
 
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India and NEP 2020 Do not restrict youth to limited options stakeholders should ensure quality education
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

भारत की शैक्षणिक यात्रा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (एनईपी 2020) एक ऐसा परिवर्तनकारी दस्तावेज बनकर उभरी है, जो ज्ञान की प्राप्ति, उसके वितरण और व्यवहार में क्रांतिकारी बदलाव लाने की क्षमता रखती है। शिक्षाविदों, राज्यों और विभिन्न हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद तैयार की गई यह नीति शिक्षा की पहुंच, गुणवत्ता और समावेशन के बीच की खाई को पाटने का गंभीर प्रयास करती दिखती है।



इसके बावजूद कुछ राज्यों ने इस नीति पर गंभीर आपत्तियां उठाई हैं-जिनमें उनकी प्रमुख चिंता भाषाई पहचान और संघीय ढांचे की स्वायत्तता को लेकर है। तमिलनाडु को यह आपत्ति है कि इससे हिंदी भाषा को उन पर अप्रत्यक्ष रूप से थोपा जा रहा है, जबकि एनईपी में तो यह सुनिश्चित करने का प्रयास है कि शिक्षा मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं के जरिये दी जाए, जिससे अधिगम अधिक प्रभावी हो। तीन-भाषा सूत्र को लचीले ढंग से प्रस्तुत करते हुए, यह नीति किसी भी एक भाषा को अनिवार्य नहीं बनाती, बल्कि राज्यों और विद्यार्थियों को यह स्वतंत्रता देती है कि वे अन्य कितनी भी भाषाओं को अपना सकें-बशर्ते उनमें से दो भारतीय मूल की हों। यह दृष्टिकोण भाषाई विविधता को सम्मान देते हुए बहुभाषिकता को प्रोत्साहित करता है, जो मौजूदा वैश्विक युग में अहम दक्षता है। भाषा का ज्ञान केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि रोजगार, सांस्कृतिक संवाद और बौद्धिक विकास की भी कुंजी है। सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में अपने एक फैसले में कहा, ‘किसी भाषा के प्रति हमारी गलत धारणाओं और पूर्वाग्रहों को सच्चाई से परखा जाना चाहिए। आइए, हम हर भाषा से दोस्ती करें।’ वास्तव में भाषा विभाजन नहीं, बल्कि संवाद की संगम भूमि का उत्सव है, जिसमें सभी की भागीदारी होनी चाहिए।


कई राज्यों में अनेक प्रतिष्ठित निजी विद्यालय-जहां प्रभावशाली वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं-पहले से ही त्रिभाषा नीति का पालन करते हैं। ऐसे में सरकारी विद्यालयों के छात्रों को इससे वंचित रखना कितना उचित होगा? जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 के निष्प्रभावी होने के बाद वहां दशकों से चली आ रही आधिकारिक भाषा उर्दू व अंग्रेजी के साथ हिंदी, डोगरी और कश्मीरी को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा दे दिया गया। जम्मू विश्वविद्यालय ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए स्थानीय भाषाओं और बोलियों में विचार-विमर्श और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को शैक्षणिक गतिविधियों का हिस्सा बना दिया है।

भाषा के अतिरिक्त, एनईपी उच्च शिक्षा के जिस ढांचे की वकालत करती है, वह बेहद दूरदर्शी और समकालीन है। यह नीति बहुविषयक, समग्र और लचीली शिक्षा का समर्थन करती है-जिसमें छात्र विज्ञान, मानविकी, कला, व्यवसाय आदि किसी भी समूह में से विषय का चयन कर सकते हैं। पारंपरिक अनुशासन व विषयों की कठोर दीवारें अब दरकने लगी हैं। इस क्रम में जम्मू विश्वविद्यालय का डिजाइन योर डिग्री कार्यक्रम अनुकरणीय उदाहरण है। यह एक संशोधित शैक्षणिक पद्धति है, जो नवाचारों और रचनात्मक उद्यमिता को बढ़ावा देती है। इसमें परियोजना-आधारित और समाधान लक्षित शिक्षण को बढ़ावा दिया जाता है। डिग्री अब रेडीमेड नहीं रही, छात्र अपनी डिग्री खुद डिजाइन कर रहे हैं। इसमें छात्रों को विषय चयन की स्वतंत्रता दी जाती है और उनका शिक्षण क्षेत्रीय संदर्भों के माध्यम से किया जाता है।

नई शिक्षा नीति में किसी कोर्स में प्रवेश के भी कई द्वार हैं और साथ ही उससे बाहर आने के भी। यही नहीं, छूट चुकी पढ़ाई को वापस उसी स्तर से शुरू करने का भी विकल्प मौजूद है। श्रेणीबद्ध क्रेडिट बैंक और राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत प्रवेश परीक्षाओं जैसे सुधार छात्रों को अधिक लचीलापन प्रदान करते हैं। हालांकि, कुछ आलोचकों ने आशंका जताई है कि सामान्य प्रवेश परीक्षाएं ग्रामीण और आर्थिक रूप से वंचित छात्रों के लिए चुनौती बन सकती हैं। यह चिंता जायज है, लेकिन इसका समाधान राज्य प्रायोजित तैयारी केंद्र, डिजिटल संसाधनों की समान पहुंच और क्षेत्रीय भाषाओं में परीक्षा सामग्री उपलब्ध कराकर किया जा सकता है।

राज्य सरकारों को यह ध्यान रखना होगा कि कहीं राजनीतिक लड़ाई की कीमत उनके युवाओं को न चुकानी पड़ जाए। एनईपी 2020 का मूल उद्देश्य ज्ञान और कौशल के ऐसे सुसंगत संयोजन को खोजना है, जो भारत के युवाओं को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए समर्थ बना सके। अंततः प्रश्न केवल एक नीति का नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की दिशा का है। परिवर्तन के इस दौर में, क्या हम अपने युवाओं को सीमित विकल्पों में बांधना चाहते हैं? या उन्हें नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना चाहते हैं? समय आ गया है कि राजनीति से ऊपर उठकर, सभी हितधारक मिलकर हर विद्यार्थी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करें। -(लेखकद्वय जम्मू विश्वविद्यालय के पत्रकारिता और मीडिया अध्ययन विभाग में प्रोफेसर हैं)

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