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खाद्य तेलों के क्षेत्र में ऐसे बदलेगी तस्वीर: तेल की जमाखोरी और सट्टेबाजी पर अंकुश लगाना जरूरी
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खाद्य तेल (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो :
pixabay
विस्तार
पिछले कुछ समय से किसानों के लिए अच्छी खबर यह आ रही है कि बाजार में सरसों के लिए उन्हें 7,000 से 8,000 रुपये प्रति क्विंटल तक का भाव मिल रहा है। जबकि पहले उन्हें इसका आधा या उससे भी कम भाव मिला करता था। यानी सरसों किसान की आमदनी इस साल बढ़ी है। सरसों के लिए सरकार यों तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा करती है, लेकिन सामान्यतः सरकार सरसों की खरीद स्वयं नहीं करती, क्योंकि यह सरकार के बफर स्टॉक का हिस्सा नहीं है।
सरसों की खरीद तेल मिलें करती हैं। देश में सरसों के तेल की भारी मांग है और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ता इसी का अधिक उपयोग करते हैं। वर्ष 1950-51 में पूरे देश में रेपसीड और सरसों की खेती 20 लाख हेक्टेयर भूमि पर होती थी। पिछले 70 वर्षों में यह रकबा बढ़कर 62 लाख हेक्टेयर तक ही पहुंच पाया है, जबकि इस बीच प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार 368 किलोग्राम से बढ़कर 1,500 किलोग्राम तक पहुंच चुकी है। यानी सरसों का रकबा और पैदावार, दोनों में वृद्धि हुई है, पर खाद्य तेल की बढ़ती मांग के सामने यह वृद्धि कम है। यही कारण है कि आज भी हम 150 लाख टन से अधिक खाद्य तेलों का आयात करते हैं, और 2019-20 में खाद्य तेलों का हमारा आयात बिल 69,000 करोड़ रुपये रहा।
कुछ समय पहले तक भी हमारा देश खाद्य तेल और दाल के आयात पर निर्भर हो गया था। पर हाल के वर्षों में इन दोनों के आयात में कमी आई है और देश आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। हमारा दाल उत्पादन दशकों तक 120 से 140 लाख टन तक सीमित रहा। बढ़ती मांग के चलते दालों का आयात लगातार बढ़ता रहा, पर उत्पादन वृद्धि का कोई प्रयास नहीं दिखा। पिछले चार-पांच साल से केंद्र सरकार ने दालों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करना शुरू किया है, जिससे दाल उत्पादकों को प्रोत्साहन मिला है। नतीजतन मात्र चार-पांच साल में ही दाल उत्पादन 170 लाख टन से बढ़कर 2020-21 में 255.6 लाख टन तक पहुंच गया।
अन्य खाद्य तेलों के मुकाबले सरसों के तेल की उपभोक्ता मांग में काफी वृद्धि हुई है, जबकि उसकी आपूर्ति काफी कम है। आज भी मात्र 32 हजार हेक्टेयर भूमि पर ही सरसों की खेती होती है। सरसों के प्रति किसानों की बेरुखी का प्रमुख कारण यह है कि उन्हें सही कीमत नहीं मिल पाती। इसलिए वे इस मौसम में गेहूं की खेती करना ज्यादा पसंद करते हैं, क्योंकि गेहूं वे सरकार को एमएसपी पर बेच सकते हैं। उल्लेखनीय है कि हमारा देश पहले खाद्य तेलों के लिए विदेशों पर निर्भर नहीं था। पर वैश्विक कंपनियों के षड्यंत्र,
सरकारों की अनदेखी, अंधाधुंध आयात और किसानों के प्रोत्साहन में कमी आदि वजहों से हमारा देश आत्मनिर्भरता से परनिर्भरता की स्थिति में पहुंच गया।
वर्ष 2020-21 में तिलहनों का उत्पादन 366 लाख टन होने की संभावना है। इसके बावजूद खाद्य तेलों में हमारी निर्भरता विदेशों पर बनी हुई है। हालांकि हमारा खाद्य तेल आयात 2016-17 के 73,039 करोड़ रुपये से घटकर 2019-20 में 68,558 करोड़ रह गया। तिलहन का उत्पादन इस साल 10 प्रतिशत बढ़ा है, फिर भी अभी खाद्य तेल की कमी है। यह स्थिति कहीं न कहीं हमारे खाद्य उत्पादन प्रबंधन पर सवाल खड़ा करती है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि फसल चक्र और फसलों के चयन में बदलाव के जरिये हम हालात बदल सकते हैं। तभी देश खाद्य तेलों के मामले में आत्मनिर्भर होगा, जिससे विदेशी मुद्रा तो बचेगी ही, किसानों की आमदनी भी बढ़ेगी।
खाद्य तेलों के आयात के कारण जहां भारी मात्रा में बहुमूल्य विदेशी मुद्रा विदेशों में जाती है, वहीं हमारी खाद्य सुरक्षा पर भी खतरा उत्पन्न होता है। खाद्य तेलों में देश को आत्मनिर्भर बनाने को लेकर सरकार चिंतित है। गौरतलब है कि बाजार आधारित व्यवस्था में बाजार के संकेतों के माध्यम से ही फसल चक्र में बदलाव संभव है। सरकार द्वारा पिछले कुछ समय से आर्थिक प्रोत्साहन के जरिये तिलहन उत्पादन बढ़ाने के प्रयास जारी हैं। जैसे पिछले एक-दो साल में पाम ऑयल के प्रमुख आपूर्तिकर्ता मलयेशिया से इसके आयात पर रोक लगाने के साथ पाम ऑयल पर आयात शुल्क में भी वृद्धि की गई है। इसके अलावा भी कई तरीके अपनाकर हम तिलहन उत्पादन बढ़ाकर देश को खाद्य तेलों में
आत्मनिर्भर बना सकते हैं।
अभी देश में बड़े आयातक बड़ी मात्रा में सस्ते और अधिकांश घटिया तेल का आयात कर उसका भंडारण कर लेते हैं। इस कारण देश के तिलहन उत्पादकों का उत्साह समाप्त हो जाता है। दशकों से जारी इस रवैये को रोकने की जरूरत है। वर्तमान में कृषि जिंसों को आवश्यक वस्तु अधिनियम से बाहर कर देने के कारण इसे सीधे तौर पर रोकना संभव नहीं है। पर यदि तिलहन आयातकों के लिए यह अनिवार्य कर दिया जाए कि वे अपने सौदों को एक प्राधिकरण के पास पंजीकृत कराएं, तो फिर सरकार के पास खाद्य तेल के प्रकार, उसके उद्भव, कीमत और आने के समय के बारे में जानकारी आ जाएगी। ऐसे में उन पर प्रभावी नियंत्रण संभव हो सकेगा। इसके अलावा आयातकों को अभी बैंकों द्वारा 90 से 150 दिनों तक का उधार दिया जाता है। खाद्य तेल तो 10 से 20 दिन में भारत पहुंच जाता है, पर शेष दिनों में उस उधार के दम पर आयातक सट्टेबाजी करने लगते हैं, जिससे तेल उपभोक्ता के लिए तो महंगा हो जाता है, पर किसानों को कीमत बढ़ने का कोई लाभ नहीं मिलता।
यदि यह उधार 30-40 दिनों का कर दिया जाए, तो तेल की जमाखोरी और सट्टेबाजी पर अंकुश लगेगा। अभी सरकार द्वारा किए गए नकद प्रोत्साहनों, आयात शुल्कों में वृद्धि के साथ-साथ खाद्य तेल आयातकों को नियंत्रित करने का कार्य भी किया जाता है, तो देश में किसानों को सरसों सहित अन्य खाद्य तेल उत्पादन के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। इससे खाद्य तेलों में हम आत्मनिर्भर होंगे, किसानों की आमदनी बढ़ने के अलावा बहुमूल्य विदेशी मुद्रा बचेगी और दीर्घकाल में खाद्य तेल की कीमत नियंत्रित करने में भी हम सफल हो सकेंगे।
-स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक