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नीति: पूर्वोत्तर की ओर देखें, राजनीतिक अस्थिरता और भौगोलिक चुनौतियां विकास की राह में रोड़ा

Tue, 06 Feb 2024 07:34 AM IST
P. S. Vohra पीएस वोहरा
Updated Tue, 06 Feb 2024 07:34 AM IST
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सार
इन राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता और भौगोलिक चुनौतियों के कारण औद्योगिक जरूरतों के अनुरूप पर्याप्त संरचना का विकास नहीं हो पाया है।
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inadequate infrastructure development in North East due to political instability geographical challenges
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

पूर्वोत्तर के राज्य आम जन के मुद्दों में ज्यादा सम्मिलित नहीं रहते हैं। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, परंतु इन्हें आर्थिक विकास में लगातार दूसरे राज्यों के समान प्रोत्साहन मिलना जरूरी है, जो इनका लोकतांत्रिक अधिकार है तथा यह देश के तेजी से आर्थिक विकास के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।


हालांकि पिछले दिनों मोदी सरकार द्वारा प्रस्तुत किया गया अंतरिम बजट आने वाले चुनावों की छत्रछाया में बनाया गया बजट नहीं था, कुछ दूरगामी सोच रखे हुए था। फिर भी यह अब अत्यंत अपेक्षित हो गया है कि आने वाली नई सरकार जब अपना पूर्ण वित्तीय बजट पेश करे, तो उसमें इन आठ पूर्वोत्तर राज्यों-अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा पर एक विशेष आर्थिक नीति शामिल हो। ये राज्य भारत की सामरिक संरचना के मद्देनजर बहुत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनकी वर्तमान वित्तीय स्थिति को देखते हुए आशंका है कि पूर्वी एशिया महाद्वीप के पड़ोसी मुल्क, जिनमें चीन भी शामिल है, इन राज्यों में परोक्ष रूप से अपनी भागीदारी न बढ़ा लें। इससे भारत के लिए बहुत विपरीत स्थिति पैदा हो सकती है।


पंद्रहवें वित्त आयोग के अनुसार, अन्य दूसरे राज्यों की तुलना में भारत के ये आठ पूर्वोत्तर राज्य अपने आर्थिक विकास के लिए केंद्र सरकार के द्वारा दिए गए वित्तीय कर्ज अथवा केंद्र सरकार से मिलने वाले वित्तीय करों में हिस्सेदारी पर अधिक निर्भर रहते हैं। मिजोरम की अर्थव्यवस्था में 87 फीसदी वित्तीय आय केंद्र सरकार के वित्तीय करों में हिस्सेदारी तथा केंद्र सरकार से प्राप्त विशेष अनुदान से हो रही है। गौरतलब है कि 15वें वित्त आयोग के मुताबिक, पिछले वर्ष में पूर्वोत्तर के इन आठ राज्यों की वित्तीय कर्ज में देनदारी 33 फीसदी से ज्यादा है। असम हालांकि बेहतर स्थिति में है, जहां पर वित्तीय कर्ज जीडीपी का मात्र 25 फीसदी है।

मुख्य समस्या इस बात की है कि इन राज्यों में अर्थव्यवस्था की विकास दर तथा उसका जीडीपी बहुत अधिक अस्थिर रहता है। इस कारण राज्यों के वित्तीय करों के स्रोत बहुत कम रह जाते हैं, जिसके चलते इन्हें वित्तीय सहायता हेतु केंद्र सरकार पर बहुत अधिक निर्भर रहना पड़ता है। यहां पर यह समझना भी अत्यंत आवश्यक है कि इन राज्यों में आर्थिक विकास का मुख्य आधार कृषि तथा सेवा क्षेत्र ही है। सेवा क्षेत्र में पर्यटन मुख्य आधार है, लेकिन बुनियादी ढांचों का अच्छी तरह विकसित न होना इस संबंध में एक मुख्य समस्या बन जाता है।

मोदी सरकार ने पिछले समय से इन राज्यों के लिए चली आ रही नॉर्थ ईस्ट की नीति को बदलकर एक्ट ईस्ट नीति बनाई, जिसके अंतर्गत वाणिज्य, संस्कृति और संपर्क को मुख्यधारा में रखा गया है। लेकिन इन राज्यों में लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता और भौगोलिक चुनौतियों के कारण आधुनिक औद्योगिक जरूरतों के अनुरूप पर्याप्त संरचना का विकास नहीं हो पाया है।

इन राज्यों के विकास में एक अवरोध निजी निवेश का न होना भी है। एक मुख्य समस्या यह भी है कि इन राज्यों की वित्तीय आय तथा केंद्र से मिले अनुदानों का बहुत बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन तथा वित्तीय कर्जों के ब्याज के भुगतान में चला जाता है, जिसके चलते राज्यों के पास बुनियादी ढांचे को खड़ा करने के लिए वित्तीय उपलब्धता कम रहती है।

अब समय आ गया है कि केंद्र में आने वाली नई सरकार आर्थिक नीतियों के तहत इन राज्यों के लिए तीन बातों पर फोकस करे। पहली, इन राज्यों के नागरिकों तथा श्रमिकों में विभिन्न प्रकार के कौशलों का विकास किया जाए, ताकि उन्हें अच्छा रोजगार उपलब्ध हो। दूसरी, इन राज्यों की भौगोलिक संरचना के अनुसार जिन उद्योगों को यहां पर अधिक सफलता मिल सकती है, उनके लिए एक पूर्ण समर्पित आर्थिक नीति बनाई जाए।

तीसरी सबसे महत्वपूर्ण बात, कि भारत के युवाओं को अपने स्टार्टअप्स को पूर्वोत्तर के इन राज्यों पर केंद्रित करने चाहिए तथा उच्चतर शिक्षण संस्थाओं (आईआईटी और आईएमएम) में इन राज्यों के विकास के संबंध में विशेष तौर पर उद्यमिता से संबंधित विशेष पाठ्यक्रम संचालित किए जाएं, ताकि युवा अपनी उद्यमिता के सफर के लिए इन राज्यों के प्रति अग्रसर हों।
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