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ढोंगी बाबाओं के चंगुल में
क्षमा शर्मा
Updated Tue, 26 Dec 2017 06:17 PM IST
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क्षमा शर्मा
कभी आसाराम, कभी राम रहीम और कभी वीरेंद्र देव दीक्षित। ये सबके सब मशहूर बाबा तो थे ही इनके आश्रमों में बड़ी संख्या में लड़कियां और महिलाएं भी पाई जाती हैं। ये खुद को उनका बापू या पिता बताते थे, तो कभी किसी देवता का अवतार कहते थे। खुद को शिव का अवतार बताने वाले वीरेंद्र देव दीक्षित के नए-नए कारनामे इन दिनों रोज सामने आ रहे हैं। इसके आश्रम देश के बहुत से शहरों में हैं। इन आश्रमों के आसपास रहने वाले लोग बता रहे हैं कि इनमें हमेशा से संदिग्ध गतिविधियां चलती रही हैं। कई बार शिकायत भी की गई, मगर कुछ नहीं हुआ।
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अधिकांश राजनीतिक दल भी वोट कटने के डर से इन बाबाओं के खिलाफ अपना मुंह नहीं खोलते। पुलिस भी हंगामे के डर से कुछ करने से बचती है। इन बाबाओं के पास न केवल बेशुमार संपत्ति है, बल्कि लग्जरी कारों यथा ऑडी, पजेरो, बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज आदि का काफिला भी होता है। इनकी जीवन शैली देखकर दुनिया के अमीर लोग भी गश खा सकते हैं, मगर ये त्यागी होने और भोग-विलास से दूर रहने का दावा करते हैं। अपनी संपत्ति और अकूत दौलत को भक्तों की आस्था कहते हैं।
अपने प्रवचनों में भक्तों को सांसारिक सुख छोड़ने की सलाह और संन्यासी (झूठे) होने के नाम पर ये खुद न केवल हर सुख-सुविधा का उपभोग करते हैं, बल्कि बड़ी संख्या में लड़कियों और स्त्रियों का शोषण करते हैं। हां, दिखावे के लिए जरूर ये हर स्त्री को मां-बहन की नजर से देखने की बातें करते हैं। मगर जब पकड़े जाते हैं और तमाम बातें खुलती हैं, तो पता चलता है कि यहां रहने वाली लड़कियां किन-किन कष्टों से गुजरती हैं। क्या ऐसे ही लोगों के बारे में तुलसी ने लिखा था-नारि मुई गृह संपत्ति नासी, मूंड़ मुड़ाय भए संन्यासी। जिन लड़कियों को ये अपनी बेटियां बताते हैं, उनके साथ भी दुष्कर्म करने से बाज नहीं आते। आखिर इन ढोंगियों के चक्कर में लोग आते कैसे हैं? न केवल खुद आते हैं, बल्कि जिन लड़कियों के पढ़ने-लिखने, बाहर जाने, अपनी मर्जी से विवाह करने पर घर वाले प्रतिबंध लगाते हैं, वही मां-बाप आखिर किस भरोसे इन बाबाओं के चंगुल में लड़कियों को भेजते हैं। इन लड़कियों/ महिलाओं की आंखों पर श्रद्धा का ऐसा पर्दा पड़ता है कि वे अपने इन कथित धर्मगुरुओं के बारे में कुछ सुनना नहीं चाहतीं। लेकिन जब लड़कियां मुंह खोलती हैं, तो इन बाबाओं को सलाखों के पीछे पहुंचने में वक्त नहीं लगता। जैसा कि राम रहीम या आसाराम के साथ हुआ। एक तरफ लड़कियां हर जगह असुरक्षित हैं, तो दूसरी तरफ पिता बने इन नकली बाबाओं की शरण में उन्हें सौंपकर आखिर किस भरोसे सुरक्षित मान लिया जाता है।
सचाई तो यह है कि घर के लोग भी लड़कियों से जितनी जल्दी हो पिंड छुड़ाना चाहते हैं, इसीलिए तो वे अपनी लड़कियों को आश्रमों में भेजकर निश्चिंत हो जाते हैं। कई बार लड़कियां किसी के बहकावे में आकर भी इन आश्रमों में चली आती हैं। बताया जाता है कि ये बाबा उन्हें उनकी तकलीफों को दूर करने का भरोसा देते हैं। उनके निजी जीवन की हर बात जानकर उन्हें ब्लैकमेल भी करते हैं।
लड़कियों को तो पहले अपने परिवार से मिलने नहीं दिया जाता। अगर वे मिलती भी हैं और कुछ शिकायत करें, तो परिवार वाले ध्यान ही नहीं देते। अपनी ही लड़कियों पर घर वालों का इतना अविश्वास और इन ढोंगियों पर इतना विश्वास, क्यों? लड़कियों की आफत ही यह है कि जिस परिवार में वे पैदा होती हैं, वहीं उन पर सबसे अधिक अविश्वास किया जाता है।