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तलाश सही जानवर की
दिलीप गुप्ते
Updated Mon, 22 Jul 2013 09:17 PM IST
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‘किसी भयानक जानवर का नाम सुझाओ।’ मेरे मित्र ने कहा। ‘मैं अपने भाषण से सब विरोधियों के मुंह बंद करना चाहता हूं। फिर किसी की हिम्मत नहीं पड़ेगी कि कोई मेरे आगे खड़ा हो सके।’
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‘भई, सभी जानवर भयानक होते हैं, भले ही छोटे हों। चींटी को ही लो, दिखने में कितनी छोटी है। हाथी पर बैठ जाए, तो कुछ नहीं होगा और यदि वह हाथी की सूंड में घुस गई, तो समझो हाथी बच नहीं सकता। और मच्छर? एक मच्छर साला आदमी को...’ मैंने फिल्मी डायलॉग मारा।
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‘मजाक नहीं यार। मैं सीरियस हूं। चुनाव पास आ रहे हैं। सभी नेता एक दूसरे को जानवर बता रहे हैं। मुझे कोई नया जानवर सुझाओ।’
‘ऐनाकोंडा, यानी अजगर कैसा रहेगा? जहरीला नहीं होता, पर सभी इससे डरते हैं। और तुम तो जानते ही हो कि सरकार में अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम वाला फॉरमूला अपनाया जाता है।’
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‘लेकिन हमारे यहां कितने लोगों ने ऐनाकोंडा देखा होगा? समझ ही नहीं पाएंगे।’
‘कौवा ठीक रहेगा? बहुत चालाक होता है। नेताओं की तरह।’
‘अरे सदन में हम कांव-कांव ही तो करते हैं। यह दांव उलटा पड़ जाएगा।’ ‘तो विरोधियों को गधा कह दो।’
‘तुम समझते नहीं, गधा कहने में वह डर पैदा नहीं होता। वह तो बेचारा मार ही खाता है।’
‘तुम जानवरों के ही पीछे क्यों पड़े हो। बेचारों को इंसानों में घटीस रहे हो। साफ-साफ धोखेबाज, सट्टेबाज, माफिया या रंगीला रतन क्यों नहीं कहते।’ मुझे गुस्सा आ गया।
'राजनीति में इंसानों का क्या काम', वह बोल तो गया, लेकिन अचकचा गया।'
‘मेंढक बढ़िया रहेगा। तुम्हारा वह दोस्त जो कभी तुम्हारी सहेली पार्टी में था, फिर तुम्हारी विरोधी पार्टी नंबर एक में गया। फिर विरोधी नंबर दो में। तब तुमने ही उसे मेंढक कहा था।’
‘नहीं यार उसका कोई भरोसा नहीं। हो सकता है कि वह फिर उछलकर हमारी पार्टी में आ जाए।’
‘तो उल्लू कैसा रहेगा। वह किसी के लिए शुभ होता है, किसी के लिए अशुभ।’
अरे वह नाम तो मुझे ही दिया गया है। याद है न, मैंने तीन बार पार्टी बदली थी। दो बार सरकार बनी। दोनों बार गिर गई।