फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   In favor of those girls

उन बच्चियों के हक में

Sun, 13 Jan 2019 08:05 PM IST
Raman Singh तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Published by: Raman Singh Updated Sun, 13 Jan 2019 08:05 PM IST
विज्ञापन
In favor of those girls
तवलीन सिंह

जब इतनी सारी महिला पत्रकारों ने 'मी टू' के इस दौर में इस मुहिम में भाग लेकर अपने यौन शोषण का इतना हल्ला मचाया है, तब यह देखकर आश्चर्य होता है कि इनमें से किसी ने उन बच्चियों के लिए आवाज नहीं उठाई, जिन पर बिहार के शेल्टर होम में ऐसा अत्याचार हुआ, जिसके बारे में लिखना कठिन है।


loader

सीबीआई की जांच रिपोर्ट के आधार पर पोस्को अदालत में कानूनी कार्रवाई शुरू हो गई है, लेकिन इस रिपोर्ट का मीडिया में इतना कम प्रचार हुआ है कि संभव है कि खलनायक ब्रजेश ठाकुर भविष्य में चुपके से रिहा हो जाए और फिर से बिहार के किसी दूसरे शहर में अपना घिनौना कारोबार चलाने लग जाए। सीबीआई के मुताबिक, उसकी पहुंच लंबी थी, सो बिहार सरकार के आला अधिकारी यह जानते हुए भी चुप रहे कि ब्रजेश ठाकुर के शेल्टर होम में बच्चियों का शोषण हो रहा था।

मुजफ्फरपुर स्थित उस शेल्टर होम में बच्चियों के साथ जो हो रहा था, वह शायद मुंबई-दिल्ली के कोठों में भी नहीं होता। सीबीआई की रिपोर्ट कहती है कि बच्चियों को नींद की गोलियां दी जाती थीं, और जब वे बेहोश हो जाती थीं, तब कई 'अंकल' उनका यौन शोषण करते थे। रिपोर्ट यह भी बताती है कि इन बच्चियों को अधनंगी कर ठाकुर अपने ग्राहकों के सामने नाचने पर मजबूर करता था। कोई लड़की अगर ठाकुर का कहा नहीं मानती थी, तो उसे नंगा करके पीटा जाता था। इस मामले में अब 21 लोगों पर मुकदमा चलाया जाएगा, लेकिन इनमें वे अधिकारी नहीं हैं, जिन्होंने सब कुछ जानते हुए इस दरिंदे को रोका नहीं। ठाकुर कभी पत्रकार हुआ करता था या पत्रकार होने का नाटक करता था, सो बिहार सरकार के आला अधिकारियों के दफ्तरों में उसका आना-जाना था।
 
अगर कुछ समाज सेवकों ने पर्दाफाश न किया होता, तो शेल्टर होम के नाम पर यह कोठा शायद आज भी चल रहा होता। इसके बाद कुछ दिनों के लिए ब्रजेश ठाकुर का नाम सुर्खियों में रहा, लेकिन इतने थोड़े दिनों के लिए कि पिछले सप्ताह जब सीबीआई रिपोर्ट के बारे में जानकारी मिली, तो इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया। यह देखकर मुझे निजी तौर पर दुख हुआ, क्योंकि मुझे अच्छी तरह याद है बीती सदी के सत्तर के दशक के वे दिन, जब पत्रकारिता में महिलाएं आने लगी थीं और महिलाओं के शोषण के बारे में डटकर लिखा करती थीं।
 
पत्रकारिता में जब तक महिलाएं थोड़ी थीं, तब तक दहेज के कारण किसी महिला को मार दिए जाने की खबर इतनी छोटी बनती थी, जैसे यह कोई बड़ी घटना न हो। महिला पत्रकारों के आने के बाद हर ऐसी मौत की खोजबीन कर हमने विस्तार से लिखना शुरू किया। जब भी किसी घर की रसोई में किसी महिला की ‘सिलेंडर फटने’ से मौत की खबर मिलती थी, तब महिला पत्रकार इसकी पूरी जांच करतीं। जब हर बेमौत मरने वाली लड़की की खबर की खोजबीन होने लगी, तब दहेज के किस्से सामने आए। इसके बाद दहेज के विरोध में आंदोलन छिड़ा देश भर में और उसके बाद ही दहेज की घिनौनी प्रथा को रोकने के लिए कानून बना।

पिछले वर्ष जब से अपने देश में 'मी टू' आंदोलन पहुंचा, मैंने इसका विरोध किया और खूब गालियां खाईं। मेरे विरोध का आधार यह था कि महिला पत्रकारों का पहला फर्ज उन बेजुबान महिलाओं की आवाज उठाना होना चाहिए, जो वास्तव में शोषित और बेसहारा हैं, न कि उनका जो इतनी सशक्त हैं कि एक मंत्री को हटा सकी। अगर हम बेजुबान महिलाओं की आवाज नहीं उठाएंगी, तब महिलाओं का पत्रकारिता में होना बेमतलब है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed