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सेवा-परोपकार जैसे सद्कर्मों का महत्व
शिवकुमार गोयल
Updated Thu, 31 Oct 2013 06:22 PM IST
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सभी संप्रदायों के धर्मग्रंथों में मानव जीवन को दुर्लभ बताया गया है। अतः जीवन के एक-एक पल का सदुपयोग करने में ही मनुष्य जीवन की सार्थकता है।
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राजा विक्रमादित्य को संस्कृत का यह श्लोक अत्यंत प्रिय था-प्रत्यर्ह प्रत्यवेक्षत नरच्चरितमात्मनः। किन्नु म पशुभितुलयं किन्नु सत्पुरुषैरिव। अर्थात, मेरे इस बहुमूल्य जीवन का जो दिन व्यतीत हो रहा है, वह पुनः लौटकर कभी नहीं आएगा। अतः प्रतिदिन हमें यह चिंतन करना चाहिए कि आज का जो दिन व्यतीत हुआ, वह पशुवत गुजरा अथवा सत्पुरुष की तरह।
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राजा विक्रमादित्य प्रतिदिन सवेरे शैय्या त्यागते ही ईश्वर से प्रार्थना किया करते थे कि उनका वह दिन पूर्णरूपेण कर्तव्यपालन करने में, लोगों के हित चिंतन और भगवान के पावन स्मरण में व्यतीत हो। उपरोक्त श्लोक एक दीप के समान हमेशा उनका मार्गदर्शन करता रहता था।
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आदि शंकराचार्य ने भी इसी तरह कहा था, अरे मूढ़ मानव, न जाने कितने पुण्यों से पशु की जगह यह मानव योनि प्राप्त हुई है। यदि तूने इसे केवल भोग-विलास और ऐश्वर्य में बिता दिया, तो अंत में सिर पीट-पीटकर रोने के सिवाय तेरे हाथ और कुछ नहीं आएगा।
मनुष्य जीवन का एक-एक क्षण कीमती है। अतः उसे सद्गुणों को ग्रहण करने, भगवान की भक्ति करने और सेवा-परोपकार जैसे सद्कर्मों में व्यतीत करने में ही भलाई है।