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एकतरफा चुनाव के मायने

Tue, 07 Jan 2014 12:49 AM IST
महेंद्र वेद
महेंद्र वेद Updated Tue, 07 Jan 2014 12:49 AM IST
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Implications of one sided election

आम चुनावों के बावजूद बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा। बेगम खालिदा जिया की अगुआई वाले प्रमुख विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी समर्थित इस्लामिक गुटों ने चुनावों का बहिष्कार कर दिया था। रविवार को मतदान के दिन वहां भारी हिंसा हुई, जिसमें 21 लोग मारे गए, वहीं 2013 के दौरान तकरीबन 500 लोग इस हिंसा के शिकार बने।

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चुनाव के मद्देनजर देश भर में भारी सैन्य बल की तैनाती की गई थी, इसके बावजूद कई मतदान केंद्र जला दिए गए और प्रदर्शनकारियों से निपटने में सैन्य बलों को खासी मशक्कत करनी पड़ी। तब से विरोध प्रदर्शन लगातार जारी है और निकट भविष्य में इनके खत्म होने के कोई आसार भी नहीं दिख रहे हैं।
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दरअसल बांग्लादेश की राजनीतिक परंपरा ऐसी रही है, जिसमें विजेता का फैसला एकतरफा ढंग से होता है। मतगणना के प्राथमिक नतीजों के मुताबिक, इस बार भी शेख हसीना को जातीय संसद में तीन-चौथाई बहुमत मिल रहा है, वहीं पराजित पक्ष सड़कों पर उपद्रव कर रहा है।
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हालांकि इन चुनावों की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है। चूंकि चुनावों के नतीजों के बारे में सबको पहले ही पता था। चुनावों को लेकर मतदाताओं के कम होते उत्साह की भी शायद यही एक प्रमुख वजह रही। हिंसा के माहौल में हुए इन चुनावों में मतदान 20 प्रतिशत से बस कुछ ही ज्यादा रहा है। पहले के सभी चुनावों की भांति इस बार भी अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय निशाने पर रहा। रविवार की शाम को मतदान के ठीक बाद पश्चिम बंगाल की सीमा पर बसे जेसोर गांव में जमात के लोगों ने काफी कहर बरपाया।

हिंसा से सराबोर इस जीत ने अवामी लीग को नई सरकार बनाने का अधिकार दिया है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि वह जल्द ही नौवीं जातीय संसद को भंग करेंगी। वैसे भी इसका कार्यकाल आगामी 24 जनवरी को खत्म हो रहा है। लेकिन इस पड़ोसी देश में हालात जल्दी शांत होने के आसार कम ही दिख रहे हैं।

बीएनपी पहले ही एक और हड़ताल की घोषणा कर चुकी है। पिछले दिसंबर के 26 दिन पहले ही हड़ताल की भेंट चढ़ चुके हैं। खासकर, शहरों में सामान्य जनजीवन और अर्थव्यवस्था पर इसका बहुत बुरा असर पड़ रहा है। बांग्लादेश में विदेशी मुद्रा का सबसे बड़ा स्रोत वस्त्र उद्योग भी मरणासन्न हालत में है।

अंतरराष्ट्रीय हितैषियों की नसीहतों और सिविल सोसाइटी व स्वतंत्र मीडिया के दबाव के बावजूद, बांग्लादेश की दोनों प्रमुख महिला नेत्री बातचीत की किसी पहल के लिए तैयार नहीं दिख रही हैं। बांग्लादेश का सबसे बड़ा अंग्रेजी दैनिक अखबार द डेली स्टार, जो कि अपने स्वतंत्र विचारों और अमूमन शेख हसीना के समर्थक के तौर पर जाना जाता है, मतदान के दिन लिखता है, 'सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष, दोनों ने हमें निराश किया है।'

अगर कम शब्दों में कहें, तो बांग्लादेश की कहानी दो बेगमों की अंतहीन लड़ाई की दास्तान है। इनमें से शेख हसीना बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की पुत्री हैं। जबकि खालिदा जिया, दिवंगत जियाउर रहमान की पत्नी हैं, जिनकी 1975 में मुजीब की हत्या में संदेहास्पद भूमिका रही थी।

दोनों बेगमों ने देश पर बारी-बारी से दस वर्षों तक शासन किया। दमनात्मक कार्रवाइयों और भ्रष्टाचार के मामलों में दोनों ही बेगमें बदनाम रही हैं। तकरीबन बीस वर्षों के अपने शासन में दोनों ही देश को सुशासन देने में नाकामयाब रही हैं।

दरअसल, दोनों परस्पर विरोधी राजनीतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करती हैं। नफरत का आलम यह है कि दोनों ने वर्षों से एक-दूसरे से बात तक नहीं की है। ऐसे हालात में, राजनीतिक अस्थिरता लाजिमी है।

1971 में निहत्थे नागरिकों पर जुल्म ढाने वाले और आजादी की लड़ाई का विरोध करने वालों को फांसी देने का फैसला कर शेख हसीना ने अतीत में हुए अन्याय से देश को राहत दी। हालांकि इन युद्ध अपराधियों को सजा सुनाकर शेख हसीना को पश्चिमी देशों का समर्थन कतई हासिल नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि भारत की मदद से बांग्लादेश के गठन से पहले तक पश्चिम ने न सिर्फ इसका विरोध किया है, बल्कि इनमें से कुछ दोषियों को शरण भी दी है।

अगर भारत के संदर्भ में देखें, तो आठ निकटतम पड़ोसी देशों में से किसी में भी राजनीतिक अस्थिरता उसके लिए अच्छी बात नहीं है। फिर बांग्लादेश तो वैसे भी भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा है। बांग्लादेश के साथ भारत न सिर्फ सबसे लंबी सीमा रेखा साझा करता है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों के अलावा सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी दोनों देशों को एक-दूसरे के लिए जरूरी बनाती हैं।

सुरक्षा संबंधी मसलों पर पिछले पांच वर्षों में भारत ने हसीना सरकार के साथ्ा पूरा सहयोग किया है। बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए भारत उसे एक अरब डॉलर का ऋण दे चुका है। यह अलग बात है कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद और तीस्ता नदी जल बंटवारे को लेकर अब भी तनातनी बनी हुई है।

भारत यह जताने की भी कोशिश कर रहा है कि वह केवल अवामी लीग का ही समर्थक नहीं है। इसी वजह से पिछले वर्ष खालिदा जिया और मोहम्मद इरशाद समेत बांग्लादेश के तमाम नेताओं को भारत आमंत्रित भी किया गया था।


हालांकि कूटनीति अपनी जगह है, भारत हमेशा यह चाहेगा कि हसीना सरकार सत्ता में आए। लेकिन यह जिस तरह से हो रहा है, वह भारत के लिए भी चिंता का सबब होना चाहिए।

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