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आंकड़े और चुनौतियां: आईएमएफ ने भारत की आर्थिक नीतियों की सुसंगतता की पुष्टि की, अब चुनौतियों से मुकाबले का समय
Tue, 25 Mar 2025 07:59 AM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Tue, 25 Mar 2025 07:59 AM IST
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आईएमएफ के आंकड़े से देश की आर्थिक नीतियों की सुसंगतता की पुष्टि
- फोटो :
अमर उजाला / एजेंसी
विस्तार
पारस्परिक टैरिफ पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों को लेकर व्याप्त अनिश्चितताओं के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के आंकड़ों का यह दर्शाना कि भारत ने पिछले दस वर्षों में अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को दोगुना कर लिया है, एक बड़ी आर्थिक सफलता तो खैर है ही, इससे भारत की आर्थिक नीतियों की सुसंगतता की भी पुष्टि होती है। उल्लेखनीय है कि 2015 से 2025 के बीच देश की जीडीपी के आकार में करीब 105 फीसदी की ऐतिहासिक वृद्धि हुई है।देश की अर्थव्यवस्था के बारे में शुभ संकेत
यह उपलब्धि तब और महत्वपूर्ण हो जाती है, जब हम इसे वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं, जहां भारत ने तमाम प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं को दशकीय वृद्धि के मामले में काफी पीछे छोड़ दिया है। यह ध्यान देने योग्य है कि इस महीने की शुरुआत में प्रस्तुत अपनी एक रिपोर्ट में भी आईएमएफ ने भारत पर भरोसा जताते हुए कहा था कि यह वित्त वर्ष 2026 में दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा और अब ताजा आंकड़े भी देश की अर्थव्यवस्था के बारे में शुभ संकेत ही देते हैं।
भारत वैश्विक व्यापार और निवेश का एक आकर्षक गंतव्य
दरअसल, जीएसटी, मेक इन इंडिया, डिजिटल क्रांति, स्वरोजगार को बढ़ावा और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (पीएलआई) जैसे अभियानों का असर अब स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है, जिनकी बदौलत भारत वैश्विक व्यापार और निवेश का एक आकर्षक गंतव्य तो बना ही है, घरेलू बाजार की मांग को बनाए रखने में भी सफल रहा है। गौरतलब है कि देश में विनिर्माण बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की गई पीएलआई योजना के तहत नवंबर, 2024 तक कुल 1.61 लाख करोड़ रुपये का निवेश तो हुआ ही है, 11 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार भी मिला है।
श्रम बाजार में महिलाओं की न्यून हिस्सेदारी भी चिंताजनक
हालांकि, जीडीपी के आंकड़े राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की समग्र स्थिति का संकेत तो देते हैं, लेकिन समावेशी विकास तभी संभव है, जब इसका लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे। इसलिए जरूरी है कि आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ रोजगार सृजन, आय में असमानता और ग्रामीण विकास के मुद्दों पर भी ध्यान दिया जाए। श्रम बाजार में महिलाओं की न्यून हिस्सेदारी भी चिंताजनक है, जो ग्रामीण व शहरी, दोनों क्षेत्रों में देखी जा सकती है। पारिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक बाधाओं के चलते महिलाएं श्रम बाजार से अलग हो रही हैं, जिसे रोकने के लिए नीतिगत व सामाजिक, दोनों बदलावों की जरूरत है।
जर्मनी से बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की उम्मीद
ऐसे में, आईएमएफ के आंकड़ों को प्रशंसा नहीं, बल्कि एक चुनौती की तरह भी देखा जाना चाहिए। वर्ष 2025 में जापान और 2027 तक जर्मनी से बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की उम्मीद सकारात्मक है, लेकिन यह भी जरूरी है कि भारत केवल जीडीपी के आंकड़ों में ही नहीं, जीवन की गुणवत्ता और सामाजिक प्रगति में भी अग्रणी हो।