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मुहब्बत कर तो लें लेकिन ...

Sun, 09 Aug 2015 05:54 PM IST
यशवंत व्यास
यशवंत व्यास Updated Sun, 09 Aug 2015 05:54 PM IST
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If we fall in love, but...

कुछ ही वक्त हुआ, जर्मनी में एक फैक्टरी में एक रोबोट के हाथों मजदूर कुचला गया। गुनाहगार की खोज यहां जाकर खत्म होती है कि रोबोट की गलती थी, उसकी भावनाएं भड़क गई थीं या महज एक मशीन में आई खराबी थी, जो मजदूर की असावधानी से मिलकर हादसे में बदल गई। कृश्न चंदर के 'दूसरा आदमी' नॉवेल में बिल्कुल इंसानी रग-रेशे वाले रोबोट बगावत पर उतर आते हैं। पूरा द्वीप खूनी क्रांति में बर्बाद होने के चरम पर पहुंचता है। पता नहीं चलता कि कौन इंसान है और कौन रोबोट। मगर अंत में एक मर्द और एक औरत दिखने वाले रोबोट बचते हैं, जिनमें भावनाओं का इंसानी अंकुर जन्म लेकर उन्हें संवेदनशील प्राणी में तब्दील कर देता है।

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यह अंकुर बहुत कश्मकश लाता है। तमाम साइंस फंतासियों के रोमांच का सार वहां से निकलता है। एक किरण है, जो फूटती है। एक भावना है, जो सिर उठाकर बगावत कर देती है। एक चमक है, जो पूरे आसमान को उजाले से भर देती है।
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टेक्नोलॉजी जब लगातार ऊंची होती जा रही है, पिछले दिनों रोबोट के हाथों मजदूर की मौत का यह किस्सा नए सिरे से 'सामाजिक रोबोट' बनाने वाले विशेषज्ञों के बीच रिसर्च का मुद्दा बन गया है।
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केट डार्लिंग की इस रिसर्च में महारत है। उम्मीद की जा रही है कि उनका शोध पर्चा सबके काम का साबित होगा। उन्होंने खास तरह के प्रयोग किए, ताकि पता लगाया जा सके कि भावनाएं कैसे काम करती हैं और किस तरीके से मुहब्बत और नफरत को मशीनों के मामले में भी मोड़ा जा सकता है।

उन्होंने कॉकरोच के आकार के मशीनी अवतार बनाए। फिर अलग-अलग तरह के ग्रुप चुने। पहला उनका, जिन्हें कॉकरोच पसंद नहीं थे। दूसरे वे, जिन्हें मालूम था कि ये मशीनी हैं। तीसरे वे, जिन्हें हर एक मशीनी कॉकरोच का नाम देकर बताया गया था। जो कॉकरोच नापसंद करते आए थे, वे उन्हें मारने में बिल्कुल नहीं हिचके। जिन्हें पता था कि ये मशीनें हैं, उन्होंने भी हिचक का स्तर उस भावना से तय किया। लेकिन, जब नाम देकर पुकारी गई मशीनों का प्रयोग हुआ, तो दोनों किस्म के लोग ठिठके। वे महज मशीनी कॉकरोच नहीं रह गए थे। उन्हें मारने वाले लोगों का प्रतिशत एकदम घट गया। यानी नाम दो, तो मुहब्बत हो जाती है।

यह बड़ा संकट है। रोबोट टेक्नोलॉजी के साथ यह नैतिक सवाल है कि वे इसे कैसे बरतें? जब आरी से हाथ कटता है, तो आप कहते हैं, आपकी चूक से हादसा हो गया, मगर इंसानी शक्ल का रोबोट मार दे तो मन कहता है, ऐसी तो उम्मीद नहीं थी।

हम मशीन को मशीन की तरह से नहीं देखते। वे आभासी चरित्र होते हैं, जो हमारे जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। कार को 'रामप्यारी' नाम देने के बाद जो मानवीकरण होता है, वह भावनात्मक संघर्ष खड़ा कर देता है। पर विशेषज्ञ कहते हैं, जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी आगे जाएगी, कुछ नीतियां बनानी पड़ेंगी, वर्ना मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक दुर्घटनाओं के अंबार लगने लगेंगे। जैसे फौज में कुछ फौजियों ने बारूदी सुरंगों का पता लगाने वाले रोबोट का इस्तेमाल इसलिए रोक दिया कि उन्हें उनकी जान खतरे में डालते हुए बड़ा अफसोस हो रहा था। एक उपकरण जो उनकी जान बचाने के लिए बनाया गया था, उसकी जान की परवाह में वे अपनी जान लगाने की मनोदशा में आ गए। यह तो कोई अपेक्षा नहीं करता था। बोस्टन डायनेमिक्स कंपनी मिलिटरी रोबोट के नाम रखकर भेजती है। आकार अक्सर जानवरों से मिलते-जुलते होते हैं, जिन्हें इंसानी जिंदगी के साथ घुलते-मिलते सदियां हो चली हैं। ताजा रिसर्च के बाद इन्हें जाने-पहचाने प्राणियों की शक्ल भी देना चाहिए या नहीं? इस प्यार का अंजाम कैसे देखें?

नाम से तत्काल रिश्ता बनाता है, अनाम से नहीं। रूप से उसकी करीबी आपकी भावनाओं में समा जाती है। 'अरे बेकार मशीन है, ठीक से काम नहीं कर रही' वाली प्रतिक्रिया 'ओह, राहुल से यह हुआ, अरे बार-बार गलती मत करो भाई' में बदल सकती है।

भावनाओं के इस खेल का दूसरा पक्ष अस्पताल में दिखा। दवाइयां बांटने में मदद के लिए जो रोबोट बनाए गए थे, उनके प्यारे-प्यारे नाम थे। नर्सों में उनके लिए वात्सल्य का भाव आ गया। मरीजों में उन मशीनों की अनुभूति ने स्नेह का कोना खोज लिया। उनके लिए खास जगह थी, खास व्यवहार था, खास भावनात्मक रिश्ता था। इसने अस्पताल की फिजां बदल दी।

तो, आखिर बात यहां पहुंची कि किसका नाम रखें, किसका नहीं? किसकी शक्ल कैसी हो? किसके लिए दिल में जगह काम की होगी और किसके लिए ठंडी, मशीनी संवेदना की पहचान बनाए रखी जाएगी? वर्ना आप कभी रोबोट को मशीनी गलती के बावजूद हत्यारा कहने लगेंगे, मिनी डायनासोर रोबोट खिलौने के खराब होने पर उसकी सेवा-सुश्रुषा में दिमागी संतुलन खो बैठेंगे या अपने साथ बिठाकर उससे भावनाओं का नया संसार शुरू करेंगे?

जहां मशीन से चले वहां मशीन ही दिखे, जहां भावनाओं की जरूरत हो वहां मशीनें हमारी दुनिया के प्राणियों की तरह ही हों, यह माथापच्ची, उस्तादों के एजेंडे पर है।


हम इंसानों की फितरत का यह अजब मुकाम है, गजब मजबूरी है। हमें मुहब्बत में मशीनों से भी 'सिलेक्टिव' होना पड़ेगा। जहां नाम से काम चले, पुकार लो; जहां मन पर ही संकट खड़ा हो जाए, वहां दूर का रास्ता लो। प्रकृति का सच और सभ्यता का अस्तित्व जिंदगी की बेहतरी के लिए हमेशा से साइंसदानों के मूलभूत नियामक तत्व रहे हैं।

वे ‘प्रैक्टिकल' होते हैं। 'इमोशनल' से ‘प्रैक्टिकल' लड़ रहा है।

मजदूर और रोबोट में, कारखाना कैसे तय करे कि कसूर किसका है?
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हां, ठीक है कि वह हम जैसा दिखता है, पर वह इंसान नहीं है।

हां, ठीक है कि उसमें जबर्दस्त अक्लमंदी है।

हां, ठीक है कि वह अनूठा शाहकार है।

पर हे प्रियतम, उसमें आत्मा नहीं है।

    -कारेल चॉपेक से प्रेरित

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