यह टैक्स लगाना जरूरी है क्या
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मुख्यमंत्रियों के एक पैनल ने सिफारिश की है कि देश में स्वच्छता अभियान को बढ़ावा देने और उसका खर्च जुटाने के लिए सरकार पेट्रोल-डीजल सहित कुछ और वस्तुओं तथा सेवाओं पर दो प्रतिशत का एक टैक्स लगाए। अब यह तय है कि जल्द ही केंद्र सरकार इस टैक्स को लागू कर सकती है। लेकिन इस सिफारिश ने यह सवाल खड़ा किया है कि सरकार फिर एक नया टैक्स क्यों लगाना चाहती है। अब भी डीजल पर प्रदूषण उपकर लगा ही हुआ है और उससे सरकार को करोड़ों रुपये आ रहे हैं। पेट्रोल की कीमत तो सरकारी लूट का सबसे बड़ा नमूना है। दिल्ली में डीलरों को 29.23 रुपये प्रति लीटर की दर से दिया जाने वाला पेट्रोल 61.20 रुपये में बिकता है! शेष सारी रकम टैक्स, ड्यूटी और वैट में जाती है। टेलीकॉम सेवाओं पर 14 प्रतिशत सेवाकर तो है ही। अब इसके बाद फिर एक और सेस या टैक्स लगाने का क्या औचित्य है?
सरकारों की पुरानी आदत है कि वे किसी भी बड़े खर्च के लिए अलग से टैक्स लगाने को तैयार रहते हैं। पुराने लोगों को याद होगा कि 1971 में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों के लिए इंदिरा गांधी की सरकार ने एक उपकर लगाया था, जो डाक टिकट खरीदने वालों से कई वर्ष तक वसूला जाता रहा। उन पैसों से लाखों शरणार्थियों के खाने-पीने और रहने की व्यवस्था की गई थी। उसमें करोड़ों रुपये खर्च हुए। तब उस वसूली पर किसी ने बुरा नहीं माना, लेकिन कई वर्षों तक जब वह टैक्स वसूला जाता रहा, तो लोगों को तकलीफ होने लगी। इसके बाद सरकार ने उस टैक्स को उसी का हिस्सा बना दिया। यह बात लोगों को नागवार गुजरी। ऐसा ही कुछ शिक्षा उपकर के मामले में हो रहा है। यह टैक्स देश की शिक्षा का स्तर सुधारने और मिड डे मील की व्यवस्था करने के लिए 2004 में तत्कालीन वित्त मंत्री ने लगाया था। यह कुल आयकर का दो प्रतिशत है। शुरुआत में इस टैक्स को अच्छा माना गया था और इसकी सराहना होती रही, लेकिन कुछ वर्षों के बाद यह सवाल उठा कि इस पैसे का क्या इस्तेमाल हो रहा है। आंकड़े बताते हैं कि शुरू में यह पैसा न तो देश के बच्चों की शिक्षा के लिए पूरी तरह खर्च हो पाया और न ही उनके मिड डे मील पर। पहले साल ही इस मद में 5,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि इकट्ठा हुई थी। यह राशि लगातार बढ़ती गई और 2014-15 में यह 40,105 करोड़ रुपये हो गई। यह सही है कि सरकार इससे ज्यादा पैसे बच्चों की शिक्षा और मिड डे मील पर खर्च करती है, लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या कोई उपकर एक दशक से ज्यादा समय तक लगा रह सकता है?
टेलीकॉम सेवाओं, पेट्रोल-डीजल, मिनरल वाटर वगैरह पर एक उपकर लगाने की मुख्यमंत्रियों के पैनल की सिफारिश, जिसका पैसा क्लीन इंडिया कैंपेन पर खर्च हो, विवादास्पद तो नहीं है, लेकिन कई सवाल उठाती है। इस उपकर की घोषणा बजट में की गई थी और अगले पांच वर्षों में देश को स्वच्छ बनाने में इससे प्राप्त राशि खर्च होगी। लेकिन इससे टेलीकॉम सेवाएं, पेट्रोल-डीजल और मिनरल वाटर महंगे हो सकते हैं। अब सवाल है कि इस देश का मध्यवर्ग अपनी कुल आय पर तकरीबन 54 प्रतिशत तक टैक्स, लेवी वगैरह दे देता है, तो उससे यह अतिरिक्त उपकर वसूलना कितना उचित होगा? क्या इसके लिए कोई और रास्ता नहीं ढूंढा जा सकता था? इस बजट में और पिछले बजट में भी लगातार सेवाकर और उसका दायरा बढ़ाया जाता रहा है। देश का मध्यवर्ग, जिसके बूते यह अर्थव्यवस्था चलती है, आज आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है। मकानों के बढ़ते किराये, बच्चों की पढ़ाई का बढ़ता खर्च, खाने-पीने की चीजों के बढ़ते दाम, ट्रांसपोर्ट और बिजली की बढ़ती कीमतें और फिर ऊंची टैक्स दरें उसकी माली हालत बिगाड़ने के लिए काफी हैं। इसके बाद फिर से टैक्स में बढ़ोतरी उसके लिए बहुत भारी है। इस देश में महज चार प्रतिशत लोग टैक्स भरते हैं और इनमें से महज 1.5 फीसदी ही हैं, जो 20 लाख या उससे अधिक कमाते हैं।
सरकार आयकर का दायरा बढ़ाने के लिए कारगर कदम नहीं उठा पाई, जबकि ऐसे छोटे कारोबारियों की तादाद लाखों में है, जो आसानी से एक लाख रुपया या उससे अधिक मासिक कमा रहे हैं। इसी तरह धनी किसानों पर कर लगाने की बात आई-गई हो गई है। सिर्फ नौकरीपेशा लोगों को टैक्स के जाल में रखकर सरकार कितने दिनों तक काम चला सकती है? सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें आने वाली हैं, और यह सरकार के अनुत्पादक खर्च में वृद्धि करेगी। इसकी भरपाई कैसे होगी?
इस तरह के तात्कालिक कदमों से सरकारों की योजनाएं नहीं चलतीं। इसके लिए हिम्मत जुटाने की जरूरत है। सरकार को यह बात समझनी होगी कि आयकर का दायरा बढ़ाए बगैर देश की कल्याणकारी योजनाएं चल नहीं सकतीं। इन पर अरबों रुपये का खर्च आता है। हर बार एक नई योजना तैयार होती है और उसके लिए सरकार को धन की जरूरत पड़ती है। इसके लिए जरूरी होगा कि बिना टैक्स बढ़ाए प्रत्यक्ष करों की वसूली बढ़ाई जाए। यानी आयकर का दायरा बढ़ाने के बारे में सोचा जाए। देश में नौकरी करने वालों की तादाद कम है और उसकी तुलना में छोटे किस्म के कारोबारियों और दुकानदारों की संख्या कहीं ज्यादा है। वे किसी तरह का आयकर नहीं देते।
सवाल यह भी है कि सरकार अपने खर्च में कटौती क्यों नहीं करती। सरकार चलाने की लागत में कटौती करना भी उतना ही जरूरी है। सरकार का खर्च बढ़ता ही जा रहा है। इस पर अंकुश नहीं लग पाया है और आगे कोई गुंजाइश भी नहीं दिखती। ऐसे में सिर्फ टैक्स बढ़ाना ही एक विकल्प रह जाता है। फिर सवाल है कि क्या हम पुराने दिनों की ओर वापस लौट रहे हैं, जब आयकर अव्यावहारिक रूप से इतना ऊंचा था कि टैक्स चोरी आम बात थी। बाद में कर ढांचे को विवेकपूर्ण ढंग से तैयार कर वसूली बढ़ाई गई। लेकिन अब किसी न किसी बहाने सरकार टैक्स बढ़ाती जा रही है। यह एक गलत परंपरा है।