राजनीति बदले तो देश बदले

दीपांकर गुप्ता Updated Fri, 25 Jan 2013 11:45 PM IST
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if politics change then country

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जब भी दुनिया में लोकतंत्र की नजीर दी जाती है, तो भारत का कई तरह से उल्लेख होता है। चौंसठवां गणतंत्र दिवस मनाते हुए मंथन यही है कि क्या वास्तव में हमारे पास एक आदर्श लोकतंत्र है? अगर हमारे पास एक व्यवस्थित लोकतंत्र है, तो फिर तमाम उलझनें, दिक्कतें क्यों हैं? इसे बड़े देश की बड़ी उलझन कहकर नजरंदाज नहीं किया जा सकता।
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कहने का मूल भाव यही है कि हमारी व्यवस्था और तंत्र में कुछ ऐसी खामियां हैं, जिससे हम लोकतंत्र का उत्सव उल्लास से नहीं मना पाते। हम दूसरों से कुछ बेहतर हो सकते हैं, पर हिचकते हुए कहना पड़ता है कि हम जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था में जीते हैं, उसे बेहतर स्वरूप में लाने के लिए कई तरह के बदलाव की जरूरत है। इसमें राजनीतिक बदलाव और चुनाव प्रक्रिया में सुधार सबसे अहम है।


जब भी भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की बात उठती है, तो इसे अंकों से देखा जाता है। लोकतंत्र को जब हम केवल मताधिकार से देखते हैं, तो अधूरे रहते हैं। केवल वोट देने की प्रक्रिया या वोट देने की आजादी एक परिपक्व लोकतंत्र की अभिव्यक्ति नहीं है। बल्कि जरूरी यह भी है कि लोकतंत्र, केवल वोटों की गणना का आधार बनकर नहीं रहे। हमारी व्यवस्था कुछ इस तरह हो गई है कि उसमें केवल वोट को देखकर ही सारे फैसले लिए जाते हैं, जिससे कई बार असंगत फैसले भी लेने पड़ते हैं।

फिर आजादी के इतने साल बाद भी तंत्र को ठीक करने का तरीका क्या हो सकता है। सबसे अहम बात यही है कि राजनीतिक तंत्र को बदलना पड़ेगा। राजनेता जिस तरह से चीजों को नियंत्रित कर रहे हैं, उसमें आप समाधान की बहुत उम्मीद नहीं कर सकते। यही वजह है कि जहां कार्यपालिका को काम करना चाहिए था, विधायिका को गंभीर होना चाहिए था, वहां न्यायपालिका को आगे आना पड़ता है। फिर वह आदिवासियों और किसानों की जमीन का मामला हो, एफडीआई हो, काला धन हो या 2 जी स्पेक्ट्रम से संबंधित घोटाला, आरक्षण का मसला हो, या गरीबी की रेखा की परिभाषा।
 
अल्पसंख्यक, आंतरिक सुरक्षा, रोजगार, महंगाई या फिर हाल में उभरे एफडीआई जैसे किसी भी मामले पर इस देश में बहस खूब हुई है। एक स्वस्थ बहस तभी हो सकती है, जब सोच बहुत साफ हो और उद्देश्य बड़े हों। मगर हर बार यही देखने को मिला है कि हर किसी ने अपने नफे-नुकसान को देखकर ही बहस को मोड़ा है। कुछ कदम उठे हैं, तो उनके पूरे फायदे इसलिए नहीं मिले कि हम हर बार मूल सिद्धांत से भटके हैं।

पार्टियों ने हर विषय को अपने नजरिये से देखा है, यह नहीं सोचा कि आखिर व्यापक स्तर पर देश हित में क्या होना चाहिए। चुनाव प्रक्रिया या पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार की बहस हो, तो  राजनीतिक दलों में कहीं न कहीं हिचक रहती है। मसलन, जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफारिश में यही संकेत है कि महिला सुरक्षा के मामले में बहुत गंभीरता से कभी सोचा ही नहीं गया।

गणतंत्र को याद करने की इस बेला में यह रेखांकित करना भी जरूरी है कि गरीबी से लड़ने की न तो इच्छाशक्ति दिखाई देती है और न ही कोई स्पष्ट सोच। महत्व इस बात का नहीं कि गरीबी की रेखा के नीचे 20 फीसदी या 26 फीसदी लोग हैं। दरिद्रता हर तरफ नजर आती है। समस्याएं हर तरफ हैं। और यह स्थिति इसलिए है कि हमने जो भी लक्ष्य निर्धारित योजनाएं बनाई हैं, उन्हें कार्यान्वित करने के लिए भ्रष्ट हाथों में सौंपते रहे। फिर उनका बेहतर परिणाम कैसे मिलता?

बीते वर्ष में व्यवस्था के विरुद्ध काफी आवाजें उठी हैं। कहा गया कि मध्यवर्ग अपने जज्बातों के साथ आगे आया है। इसे इस तरह देखा गया कि मध्यवर्ग में, जिसमें युवाओं की संख्या अच्छी-खासी है, असंतोष उभर कर आया है, और अब वह पूरी तरह मुखर है। वास्तविकता यह है कि दुनिया में जब भी शासकों को हैरान करने वाले आंदोलन या क्रांतियां हुईं, वह मध्यवर्ग से ही हुई है। इंग्लैंड, फ्रांस या अमेरिका के इतिहास में इसकी पुष्टि की जा सकती है।
 
फिर गणतंत्र के स्वरूप पर आते हैं। हम एक विचित्र-सी स्थिति में चल रहे हैं। एक बार चुना हुआ व्यक्ति पराजित होता है, तो दूसरे चुने हुए व्यक्ति से भी हमें थाह नहीं मिलती। गणतंत्र ने हमें चुनाव का अवसर तो दिया, लेकिन हमारे सामने राजनीति का जो स्वरूप है, उसमें नियंत्रण नहीं है।

मजबूरी में हम बारी-बारी से ऐसे ही लोगों को चुनते हैं, जिनकी कार्य प्रक्रिया, तौर-तरीके लगभग एक जैसे होते हैं। इससे व्यक्ति बदलने पर भी कहीं आमूल परिवर्तन नहीं आता। लोग इस ढांचे में बेबस रहते हैं। तब यही कहा जा सकता है कि सबसे पहले यही बदलाव होना चाहिए। आखिर कानून भी केवल कह सकता है। लोग भी केवल मतदान ही कर सकते हैं। सबसे बड़ा और पहला बदलाव तो राजनीति के माध्यम से ही हो सकता है।

अगर कानून में कहीं बदलाव की जरूरत है, तो वह भी राजनेताओं के माध्यम से ही संभव होगा। अगर राजनीति में अपराधीकरण को रोकना है, तो इसकी पहल भी राजनीतिक पार्टियों से ही हो सकती है। राजनीतिक वर्ग ही ऐसा तंत्र विकसित कर सकता है, जिसमें राजनीतिक भ्रष्टाचार और अपराधीकरण पर रोक लग सके।
 
अच्छी बात यह है कि देश के आम लोगों ने व्यवस्था की खामियों के खिलाफ आवाज उठाई है और उनका हस्तक्षेप भी बढ़ा है। बिगड़ी चीजें ठीक हो रही हैं। हमने हर पहलू पर सोचना जरूर शुरू किया है। बस जरूरत संकल्प की है।

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