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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   If Pakistan army surrendered on 25 December 1971 may be changed Kashmir scenario in Bangladesh liberation war

बांग्लादेश युद्ध: जब हमने नक्शा बदल दिया...अगर वक्त मिलता तो इतिहास भी बदल जाता

Sat, 02 Dec 2023 07:43 AM IST
r vikram singh आर विक्रम सिंह
Updated Sat, 02 Dec 2023 07:43 AM IST
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सार
पाकिस्तान की पूर्वी सेना के कमांडर जनरल नियाजी यदि 16 दिसंबर के बजाय 25 दिसंबर, 1971 को हथियार डालते, तो शायद हम कश्मीर को आजाद करा चुके होते। उससे परिदृश्य बदल जाता।
 
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If Pakistan army surrendered on 25 December 1971 may be changed Kashmir scenario in Bangladesh liberation war
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

तीन दिसंबर, 1971 की भोर को पाकिस्तान ने भारत के पश्चिमी वायु ठिकानों पर जबर्दस्त हवाई हमला बोल दिया था। उसी के साथ भारत-पाक का युद्ध प्रारंभ हो गया, जिसकी परिणति 16 दिसंबर को ढाका में पाकिस्तान की पूर्वी सेना के कमांडर जनरल नियाजी और उनके साथ 93 हजार सैनिकों के ऐतिहासिक आत्मसमर्पण में हुई। भारत के लिए आजादी के बाद के इतिहास का वह महानतम क्षण था, जब हमने दक्षिण एशिया का मानचित्र बदला था।



जब पाकिस्तान का आक्रमण हुआ, तब तक हमारी सेना मुक्ति वाहिनी के साथ मिलकर अपनी कार्रवाई प्रारंभ कर चुकी थी। वह मुक्ति वाहिनी हमारी सेना के जनरलों की रणनीति की उपज थी। भारतीय सेना परंपरागत रणनीति के विपरीत मुख्य रास्तों को छोड़कर पाकिस्तानी मोर्चों को बाइपास करती हुई तीन दिशाओं से आगे बढ़ती गई।


तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अपेक्षा थी कि पाक सेना द्वारा 25 मार्च को बंगालियों पर किए गए हिंसक क्रैकडाउन के बाद हमारी सेना तत्काल कार्रवाई प्रारंभ कर दे। लेकिन जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) मानेक शॉ ने कैबिनेट को साफ शब्दों में मना कर दिया कि अभी हम न तो रणनीतिक दृष्टि से और न सैन्य साजो-सामान की दृष्टि से तैयार हैं। धनाभाव के कारण हमारे टैंकों की सर्विसिंग तक नहीं हो सकी थी। स्टोरेज की सुविधाएं भी नहीं थीं। जनरल का कहना था कि सेना का मूवमेंट होते-होते बरसात आ जाएगी, अभी चीन के दखल का खतरा है, इसलिए हमें हिमालय के दर्रों पर बर्फ पड़ने तक इंतजार करना पड़ेगा।

जनरल के तर्कों को मानना पड़ा। बहरहाल, सेना ने अपनी तैयारियां प्रारंभ कीं। इंदिरा जी की ओर से सवाल आया कि इस बीच हम क्या कुछ कर सकते हैं। तब जनरल के मस्तिष्क में भारतीय सेना द्वारा प्रशिक्षित बंगालियों की गुरिल्ला फोर्स का विचार आया। इस तरह मुक्ति वाहिनी का जन्म हुआ। उस समय हमारे पास आज के आधुनिक अस्त्र-शस्त्र नहीं थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के जमाने का तोपखाना व 25 पाउंडर तोपें और छोटी माउंटेन तोपें ही थीं। फिर भी सेना का आदर्श ऊंचा था।

विश्व में सब ओर पाक सेना द्वारा किए जा रहे भीषण नरसंहार के समाचार जा रहे थे। लेकिन नैतिकता व मानवीयता के आधार पर वैश्विक समर्थन हमारे साथ नहीं था। जब युद्ध शुरू हुआ, तो सिर्फ तत्कालीन सोवियत संघ का समर्थन मिला था। उससे हमने मित्रता की संधि की। अमेरिकी रुख अत्यंत निराशाजनक था। भारत पर दबाव बनाने के लिए उसने अपना सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेज दिया था। लेकिन सेना अपने अभियान में लगी हुई थी। टांगाइल में कमांडो सैनिकों के पैराड्रॉप ने बड़ा समाचार बनाया। पाकिस्तानी सैनिकों का साहस जवाब देने लगा था। ढाका प्रवेश पर भारतीय सेना का जो स्वागत हुआ था, लोग बताते हैं कि आजादी के उस भाव को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। दुनिया के इतिहास में विजेताओं का ऐसा स्वागत कम ही हुआ होगा। नए देश में पाकिस्तानियों के लिए जबर्दस्त घृणा थी, क्योंकि उन्होंने 30 लाख बंगालियों की नृशंस हत्या की, ढाका विश्वविद्यालय में बुद्धिजीवियों को चुन-चुनकर मारा, महिलाओं से दरिंदगी की। अब वे सब हथियार डालकर कैंपों में कैदी थे।

यदि 16 दिसंबर, 1971 की उपलब्धियों को उनके असल अंजाम तक ले जाया गया होता, तो पाकिस्तानी हुक्मरानों का यह साहस न होता कि वह कभी कह सकते कि हमारे पास एटम बम है। निक्सन-किसिंजर चिंतित थे कि कहीं बांग्लादेश के बाद भारत पश्चिम में पलट कर पाकिस्तान को निशाना न बना ले। अमेरिकी प्रशासन ने इंदिरा गांधी पर इतना दबाव बनाया कि उस लौह महिला को पश्चिमी कमान को रक्षात्मक युद्धनीति का आदेश देना पड़ा। जनरल मानेक शॉ ने उसका घोर विरोध किया था। सोचता हूं कि यदि नियाजी का आत्मसमर्पण 16 दिसंबर के बजाय 25 दिसंबर को हुआ होता, तो संभवतः हम कश्मीर के एक बड़े हिस्से को आजाद करा चुके होते। तब चीन-पाकिस्तान का जमीनी संपर्क न रह जाता और संपूर्ण रणनीतिक परिदृश्य बदल चुका होता...!

वह युद्ध एक महान विजय के साथ अधूरा-सा इतिहास लिखकर ही समाप्त हो गया, अपनी पूर्णता तक नहीं पहुंचा। -पूर्व सैनिक, पूर्व आईएएस।

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