क्या अब सुरक्षित हैं देश की बेटियां
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काश कि हमारे सांसदों को उतना ही गुस्सा आता बच्चियों के साथ बलात्कार की बढ़ती घटनाओं को लेकर, जितना गुस्सा उन्हें उस वृत्तचित्र को देखे बिना आया पिछले दिनों! काश कि उन्हें गुस्सा आता इसे लेकर कि बलात्कार के मुकदमे इतने लंबे चलते हैं कि कई दशक लग सकते हैं पीड़ित बेटियों को न्याय मिलते! गृह मंत्री ने लोकसभा में भावुक अंदाज में अपनी पीड़ा व्यक्त की कि एक अपराधी को अपनी बात कहने का मौका दिया गया है वृत्तचित्र में। उन्हें उस समय दुख क्यों नहीं हुआ, जब कुछ दरिंदों ने एक लड़की के बलात्कार का वीडियो इंटरनेट पर डाल दिया था?
सांसदों की मांग के कारण उस वृत्तचित्र पर प्रतिबंध लग गया। तो क्या अब बच गई है भारत की इज्जत? क्या अब सुरक्षित हैं भारत की बेटियां? सच यह है कि जो थोड़े बहुत अंश इस वृतचित्र के हम देख पाए हैं, वह एक दर्पण की तरह है, जिसमें दिखती है झलक हमारे लोगों की गंदी मानसिकता की। इस मानसिकता ने प्रधानमंत्री मोदी को इतनी तकलीफ दी है कि लाल किले के प्राचीर से उन्होंने महिलाओं की दुर्दशा पर दुख व्यक्त किया था- याद कीजिए मां-बाप के वे शब्द, जो बेटियों से तो पूछते रहते हैं कि कहां थी, इतनी देर क्यों कर दी? क्या अपने बेटों से नहीं करने चाहिए ये प्रश्न? काश कि प्रधानमंत्री ने इस वृतचित्र को देखने के बाद फैसला लिया होता प्रतिबंध लगाने का।
माना कि अपराधियों को प्रचार का 'ऑक्सीजन' नहीं मिलना चाहिए। लेकिन जो हिस्से मैंने देखे हैं इस वृत्तचित्र के, उनको देखकर ऐसा लगा मुझे कि इसको अगर दिखाया जाता, तो शायद 'बेटों' को उनकी मानसिकता की झलक दिखती। जावेद अख्तर उन मुट्ठी भर सांसदों में हैं, जिन्होंने प्रतिबंध का विरोध इस आधार पर किया कि इसे देखकर वे लोग सुधर जाएंगे, जो इसी तरह की मानसिकता रखते हैं महिलाओं के प्रति।
उदाहरण इसी वृतचित्र से पेश करती हूं उन दो वकीलों का, जिन्होंने बलात्कार का दोष निर्भया पर डालने की कोशिश की यह कहकर कि जो लड़कियां रात नौ बजे के बाद बाहर जाती हैं, उनके साथ तो ऐसा होगा ही। एक ने कहा कि महिला फूल की तरह होती है, जिसको घर के अंदर ही रखना चाहिए, क्योंकि मर्द कांटों की तरह हैं, जो उसे बर्बाद कर सकते हैं। दूसरे ने गर्व से कहा कि मेरी बेटी रात को अपने बॉयफ्रेंड के साथ बाहर जाने की कोशिश भी करती है, तो उसको 'मैं अपने फार्म हाउस में जिंदा जला दूंगा।' ऐसी बातें अपने इस भारत महान में रोज सुनने को मिलती हैं उन लोगों से, जो अपने आपको शरीफ मानते हैं, जो देश की संस्कृति और परंपराओं की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।
ऐसी मानसिकता पुलिसवालों में इतनी दिखती है कि पीड़ित महिलाएं थानों में जाने से डरती हैं। पिछले सप्ताह एनडीटीवी पर सोनिया सिंह ने लखनऊ की एक ऐसी महिला से बात की, जिसके साथ बलात्कार तब हुआ था, जब वह सिर्फ तेरह वर्ष की थी। अब वह तेईस वर्ष की हो गई है, पर अभी तक मुकदमा शुरू ही नहीं हुआ, क्योंकि बलात्कारी की राजनीतिक पहुंच लंबी है। और हम हैं कि एक वृत्तचित्र पर प्रतिबंध लगाते फिर रहे हैं, क्योंकि हम भारत की छवि पर दाग नहीं देखना चाहते! इस प्रयास में मोदी सरकार के मंत्री शायद भूल गए हैं कि भारत माता की छवि पर दाग हर बार लगता है किसी बच्ची के साथ दुष्कर्म की खबर से। यह फिल्म दिखाई गई होती इस देश में, तो दर्पण का काम करती।