क्या एक तस्वीर इतिहास बदल सकती है?
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इस सप्ताह हममें से बहुतों ने अपने बारे में कुछ ऐसा जाना, जो हम जानते तो थे, पर गहराई से नहीं। एक समस्या को उसके अमूर्त रूप में या केवल संख्याओं के जरिये समझना मुश्किल है। हम तस्वीरों और व्यक्तियों की कहानियों के जरिये ज्यादा आसानी से चीजों को समझ लेते हैं। इस सप्ताह हमें यह तीन साल के एक सीरियाई बच्चे आयलन कुर्दी की तस्वीर देखकर प्राप्त हुआ, जिसकी लाश तुर्की के समुद्र तट पर मिली। कुर्दी की यह तस्वीर किसी नए भय के बारे में बेशक नहीं बताती। लेकिन उस मासूम के नंगे पांव और नन्हे जूते के जरिये हम युद्ध से उपजे भय, क्षमता से अधिक लोगों से लदी नावों के कारण होती त्रासदी और सुरक्षित आश्रय की खोज में भागते शरणार्थियों की पीड़ा को समझ सकते हैं, जो कुर्दी और दूसरे अनेक लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गई थी। मीडिया रिपोर्टें हमें बताती हैं कि शरणार्थियों से भरी हुई दो नावों के, जिनमें क्षमता से अधिक लोग लदे हुए थे, डूबने से मारे गए लोगों में उस बच्चे के पांच साल का भाई और उसकी मां भी थी।
तुर्की के समुद्र तट पर पड़े हुए उस बच्चे की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है। भारत के कई अखबारों ने, शुरुआती हिचक के बाद, उस तस्वीर को मुखपृष्ठ पर जगह दी है। और पूरी दुनिया की तरह हम भी यह बहस कर रहे हैं-कि क्या तस्वीरें जन नीति को प्रभावित कर सकती हैं, क्या वे इतिहास बदल सकती हैं? इसका संक्षिप्त जवाब है-हां।
इस तस्वीर ने ब्रिटेन को इतना द्रवित किया है कि अब उसने कुछ हजार शरणार्थियों को अपने यहां जगह देने की घोषणा की है, जबकि इससे पहले वह युद्धक्षेत्र से भागते लोगों के प्रति इतना सहानुभूतिशील नहीं था। लेकिन इस एक तस्वीर से अपने यहां बदले जनमत ने उसे अपना रुख बदलने के लिए प्रेरित किया। आयरलैंड के सार्वजनिक खर्च और सुधार मंत्री ब्रेंडेन हाउलिन ने कहा है कि उनका देश 600 शरणार्थियों के तय कोटे से अधिक लोगों को शरण देगा। कई यूरोपीय देशों की सरकारों का इस मुद्दे पर रुख अभी साफ नहीं है, लेकिन वहां के आम नागरिक शरणार्थियों की मेजबानी करने के लिए तैयार हैं। इस तस्वीर ने कनाडा में ऐसी हलचल मचाई है कि वहां वह चुनावी मुद्दा बन गई है। कनाडा के विपक्षी नेता का दावा है कि उनकी पार्टी उस बच्चे के परिवार को कनाडा बुलाना चाहती है, लेकिन उसके आवेदन को उनकी अपनी सरकार ने अभी तक मंजूरी ही नहीं दी है।
यह पहली बार नहीं है, जब एक तस्वीर ने जनता और सरकारों के नजरिये को बदला है। विख्यात भारतीय फोटोग्राफर पाब्लो बार्थोलोमेव की उस तस्वीर को याद कीजिए, जिसमें एक आदमी अपने बेटे को दफनाने जा रहा है, या भोपाल गैस त्रासदी की पृष्ठभूमि में रघु राय द्वारा खींची गई एक बच्चे के चेहरे की उस तस्वीर के बारे में सोचिए, जिसका पूरा शरीर मलबे में दबा है। इस संदर्भ में निक उट की 1972 में खींची गई नौ साल की जली हुई भागती लड़की किम फुक की तस्वीर की याद आना स्वाभाविक है। हमले में भागती उस लड़की के कपड़े जल गए थे। द गार्जियन में छपे एक हालिया लेख में इयान जैक ने हमें याद दिलाया है कि इस तस्वीर ने न सिर्फ वियतनाम युद्ध की अलोकप्रियता में वृद्धि की, बल्कि पिछली सदी की सबसे मर्माहत करने वाली भी बनी।
कमोबेश यही बात इन दिनों युद्ध का रूपक बन गए बियाफ्रा गणराज्य के एक स्कूल परिसर में डॉन मैकुलिन द्वारा खींची गई ेउस तस्वीर के बारे में कही जा सकती है, जिसमें नौ साल का एक भूखा लड़का, जो बहुत मुश्किल से खड़ा हो पा रहा है,कॉर्न्ड बीफ का एक खाली डब्बा लिए खड़ा है।
जाहिर है कि तस्वीरें हमारी चेतना जागृत करती है और स्थायी तौर पर लोगों का नजरिया बदलने में भी मदद करती हैं। लेकिन क्या ऐसी तस्वीरें प्रकाशित करने में नैतिकता आड़े आ सकती है? इस प्रश्न का जवाब आसान नहीं है। दुनिया भर के न्यूजरूम्स में इस मुद्दे पर व्यापक बहस हुई है। आयलन कुर्दी की तस्वीर की ही बात करें, तो कई न्यूज एजेंसियों ने हू-ब-हू वह तस्वीर छापी, जबकि कुछ वेबसाइट्स ने छापते हुए उसके शरीर और चेहरे को धुंधला कर दिया। मैं यह कहना चाहती हूं कि जिस दौर में मानवीय गुणों में कमी आई है, उस समय तस्वीरें और लोगों की कहानियां व्यापक बदलाव ला सकती हैं।
आयलन कुर्दी की तस्वीर देखकर मुझमें वर्षों पहले उत्तर प्रदेश के एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक मृत बच्चे की याद ताजा हो गई। वह कंपकंपाते दिसंबर की एक सुबह थी। प्रसूति विभाग की खिड़कियां टूटी हुई थीं। उस अभागी मां के पास एक कंबल तक नहीं था। रात को वहां उसकी देखभाल करने के लिए भी कोई नहीं था, नतीजतन कम वजन का वह बच्चा मर गया। जब मैं वहां पहुंची, तो दादी उस मृत बच्चे को गोद में लिए हुई थी। वह परिवार अचंभे में था कि आखिर क्या गलत हो गया। मैंने उस बच्चे की एक तस्वीर ली, लेकिन वह कहीं छपी नहीं। वह तस्वीर मुझे इसकी याद दिलाती रही कि बगैर पैसे और ताकत के इस देश में बच्चे को जन्म देना भी कितना भीषण हो सकता है। पत्रकारिता में कई बार नैतिकता के आग्रह से हम बहुत सारी चीजें कहने और छापने से बचते हैं। इससे लोगों का नजरिया और सरकार का रुख बदल पाने का मौका हम गंवा बैठते हैं। तस्वीरें परेशान करने वाली हो सकती हैं। कुछ तस्वीरें गुस्सा पैदा करती हैं, तो कुछ तस्वीरें अविलंब कुछ करने के लिए प्रेरित करती हैं। हम इनसे बचने की कितनी भी कोशिशें करें, लेकिन इनका असर नहीं जाता।