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मैंने तब राजकपूर की एक नहीं सुनी
कैलाश वाजपेयी
Updated Sat, 13 Apr 2013 10:24 PM IST
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धर्मवीर भारती ने धर्मयुग के संपादक का कार्यभार संभाल लिया था। उनके सम्मान में श्रीरामनिवास रुइया ने अपने आवास पर एक छोटा सा आयोजन किया। हमें भी उस आयोजन में ले जाने के लिए उन्होंने राजस्थान के एक रचनाकार मनहर को भेजा। मन बिल्कुल नहीं था। फिर भी राम मनोहर त्रिपाठी और धर्मवीर भारती के साथ हम गए।
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माउंट प्लेजेंट या ऐसे ही किसी मार्ग पर रहते थे रामनिवास रुइया। मनहर नाम वाले एक स्थानीय कवि ने हम सभी को एक मंच पर स्थापित कर सामने की कुर्सियों पर बैठे बीस-बाइस अतिथि श्रोताओं से हमारा परिचय कराया। स्वयं रामनिवास जी ने सबसे पहले अपनी दो छोटी कविताएं पढ़ीं। इसके बाद बारी-बारी से हम सभी ने काव्यपाठ किया। स्थानीय रचनाकारों में इंदीवर भर का नाम याद है। उर्दू के शायर शमीम जयपुरी की रचना ''मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज ना दो'' उनकी पाठशैली के कारण सराही भी गई।
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हमारी दूसरी रचना ''मैंने फिर घबराकर अपना शीशा तोड़ दिया।'' की समाप्ति के बाद पीने-पिलाने का दौर शुरू हुआ। कविता सुनने आए लोगों में राजकपूर भी थे। शराब का गिलास हाथ में लिए हुए राजकपूर हमारे पाए आए और छूटते ही बोले, 'डॉक्टर! आई ऑफर यू फॉर फिल्म्स।' हम एकदम सकपका गए। पास खड़े राम मनोहर ने भी सुना, भारती जी ने भी। हमारे मुंह से निकला 'इन व्हॉट केपेसिटी?' राजकपूर ने इस बीच दूसरा घूंट पिया, फिर बोले 'फॉरगेट अबाउट दैट, आई एम ए टैलेंट हंटर।'
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हम चुप। तब तक राजकपूर ने तीसरा सिप लिया। शराब पीने का ढंग कई तरह का होता है मगर राजकपूर में हमें एक उतावलापन दिखा। उन्होंने अगला वाक्य बोला, 'व्हाट आर यू डूइंग हियर इन बॉम्बे' (उन दिनों मुंबई की जगह बॉम्बे प्रचलित था) अगले कई प्रश्नोत्तर अंग्रेजी में होने के कारण उन्हें दोहराना अपने पाठकों के साथ अन्याय होगा, इसलिए यहां इतना भर कहना अहम होगा कि हमारे द्वारा यह बताए जाने पर कि हमें छह दिन पहले ही टाइम्स ऑफ इंडिया में चार सौ रुपयों की नौकरी मिली है, राजकपूर ने तपाक से कह दिया 'आई विल गिव यू फाइव टाइम्स मोर'।
पास ही खड़े रुइया से बातें करते हुए अपने भारती जी ने भी सुना जो दो दिन पहले पंद्रह सौ रुपयों पर 'धर्मयुग' का कार्यभार संभालने मुंबई आए थे। अगले दिन टाइम्स के दफ्तर में यह खबर आग की तरह फैल गई कि यूपी से आए भइया के लिए राजकपूर ने आर के फिल्म्स का द्वार खोल दिया है। किसी ने कहा, ''छह दिन में ही क्या छक्का मारा है'' कोई और बोला ''बैसवारे का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है।'' धर्मवीर भारती ने अपने कक्ष में बुलाकर बड़े भाई की तरह समझाते हुए क़हा, ''फिल्म की दुनिया तुम जैसे गंभीर प्रकृति के अध्यावसायी के लिए उपयुक्त नहीं है।
यहां भगवती बाबू, नागर जी जैसे कई हिंदी साहित्यकार आए और खीजे हुए लौटकर गए। मैं तो सोचता हूं कि तुम धर्मयुग में आकर सहायक बनो। अपन दोनों हिंदी की सेवा करने यहां आए हैं आदि-आदि। शाम होते-होते चेम्बूर स्थित आर. के स्टूडियो से दोबारा बुलावा आ गया। उसी शाम को हम चेम्बूर स्थित आर. के स्टूडियो पहुंचे। वहां उस वक्त हमें गायक मुकेश, चांद माथुर, शंकर, शैलेंद्र (जिन्हें राजकपूर ने कविराज कहा) के अतिरिक्त ख्वाजा अहमद अब्बास भी मिले। यह वही ख्वाजा अहमद अब्बास हैं, जिनके बाबा अल्ताफ हुसैन हाली मिर्जा गालिब के शिष्य थे और जिनके संबंधी ख्वाजा गुलाम अब्बास 1857 में पानीपत में आजादी की लड़ाई लड़ते हुए शहीद हुए थे।
राजकपूर ने कहा,'' यह ख्वाजा साहब की लेखनी का कमाल है, इन्हीं की लिखी कहानी और संवादों के फलस्वरूप 'आवारा', 'श्री चार सौ बीस' और 'जागते रहो' जैसी फिल्में यहां बनीं।" एकाएक 'बस दो मिनट' कहकर राजकपूर दूसरे छोर पर अपने ग्रीनरूम में चले गए। इस बीच हमने कविराज से नरगिस के बारे में पूछा, शैलेन्द्र ने मुंह पर उंगली रखकर चुप रहने को कहा। तभी जयकिशन जी आ गए। उनके साथ कोई और भी था। राजकपूर जब अपने ग्रीनरूम से बाहर आए तो उन्होंने फिर दोहराया डॉक्टर! क्या सोचा? 'वक्त दें', हमारा संक्षिप्त सा उत्तर था। राजकपूर ने फिल्मों के बारे में जो कुछ कहा वह अभी तक याद है ''दरअसल हम अभिनेता लोग तो अनपढ़ पुतले-पुतलियां हैं। हमें सिर्फ संवाद रटना आता है। श्रम और दिमाग आप लोग लगाते हैं। हम सिर्फ मलाई खाते हैं।''