फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   How was Rameshwaram established? Learn story

जानना जरूरी है: संस्कृति के पन्नों से... कैसे हुई रामेश्वरम की स्थापना?

Sun, 28 Dec 2025 06:37 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 28 Dec 2025 06:37 AM IST
विज्ञापन
सार
श्रीराम ने वेलावन पहुंचकर श्रीरामेश्वर नाम से महादेव की स्थापना कर विधिवत पूजन किया। भगवान रुद्र प्रकट होकर बोले, ‘रघुनंदन ! जब तक यह पृथ्वी, यह संसार और यह सेतु रहेगा, तब तक मैं यहीं निवास करूंगा।’
loader
How was Rameshwaram established? Learn story
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

एक दिन श्रीरघुनाथ जी एकांत में बैठे थे। बाहर सब कुछ शांत था, पर उनके मन में हलचल थी। वह सोच रहे थे कि राक्षस कुल में जन्म लेकर भी विभीषण धर्मपूर्वक लंका का शासन कर रहे हैं। पर क्या उनका राज्य सदा निर्विघ्न रह पाएगा? मैंने रावण का वध देवताओं के हित के लिए किया था। यदि विभीषण सत्मार्ग से कभी विचलित हुए, तो लंका फिर संकट में पड़ सकती है। मुझे स्वयं जाकर उन्हें हित की बात समझानी चाहिए।


वह इसी विचार में डूबे थे कि भरत आ पहुंचे। भाई को चिंतामग्न देखकर वह बोले, ‘देव! आप किस बात का चिंतन कर रहे हैं? यदि कोई गोपनीय बात न हो, तो मुझे भी बताइए।’ राम ने स्नेहपूर्वक कहा, ‘भरत, मेरी चिंता केवल इतनी है कि विभीषण सदा देवताओं के अनुकूल आचरण करें। इसी उद्देश्य से मैं लंका जाना चाहता हूं।’ भरत ने बिना सोचे कहा, ‘तो मैं भी आपके साथ चलूंगा।’ राम मुस्कुराए और बोले, ‘अवश्य।’ फिर लक्ष्मण से कहा, ‘वीर! जब तक हम लौटें, तुम अयोध्या की रक्षा करना।’


श्रीराम ने पुष्पक विमान का स्मरण किया। आकाशमार्ग से चलते हुए उन्होंने भरत को वे सभी वन, पर्वत और पथ दिखाए, जहां वह कभी सीता की खोज में भटके थे। हर स्थान उनकी स्मृतियों से भरा था। किष्किंधा पहुंचकर उन्होंने सुग्रीव से भेंट की। जब सुग्रीव को ज्ञात हुआ कि श्रीराम लंका जा रहे हैं, तो वह भी उनके साथ चल पड़े। पुष्पक विमान के लंका में उतरते ही नगर में हलचल मच गई।

राक्षसों ने तुरंत विभीषण को सूचना दी - ‘महाराज ! भगवान श्रीराम पधारे हैं।’ यह सुनते ही विभीषण दौड़ते हुए आए। विमान पर विराजमान राम को देखकर उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया।

इसके बाद विभीषण भाव-विभोर स्वर में बोले, ‘भगवन्! आज मेरा जीवन सफल हो गया।’ फिर वह भरत और सुग्रीव से भी गले मिले।

उसी समय विभीषण की पत्नी सरमा आगे आईं। उन्होंने कहा, ‘भगवन्! अशोक वाटिका में मैंने एक वर्ष तक माता सीता की सेवा की थी। आप उन्हें साथ क्यों नहीं लाए? आपके बिना सीता और सीता के बिना आप अधूरे प्रतीत होते हैं।’ श्रीराम उनकी बात सुनकर स्नेहपूर्वक मुस्कुराए। फिर उन्होंने विभीषण को उपदेश दिया, ‘निष्पाप विभीषण! सदा देवताओं का प्रिय कार्य करना। उनके आदेशों का पालन करना। यदि लंका में कोई मनुष्य आ जाए, तो उसका वध मत करना, बल्कि अतिथि की भांति उसका सत्कार करना।’ विभीषण ने हाथ जोड़कर कहा, ‘प्रभो! आपकी आज्ञा मेरे लिए धर्म है।’ तभी वायुदेव प्रकट हुए और बोले, ‘महाभाग! यहां भगवान विष्णु की वामनमूर्ति है, जिसे मेघनाद विजयचिह्न के रूप में इंद्रलोक से उठा लाया था। इसे आप स्थापित करें।’ श्रीराम की सम्मति जानकर विभीषण ने वामन भगवान के विग्रह को रत्नों से सजाकर उन्हें सौंप दिया। श्रीराम ‘तथास्तु’ कहकर विमान पर आरूढ़ हुए।  

विभीषण ने विनयपूर्वक श्रीराम से पूछा, ‘प्रभो! यदि सेतु के मार्ग से मनुष्य यहां आकर मुझे सताएं, तो मैं क्या करूं?’ विभीषण की बात सुनकर श्रीराम ने अपना धनुष उठाया और सेतु के दो टुकड़े कर दिए। फिर वे वेलावन पहुंचे। वहां उन्होंने श्रीरामेश्वर नाम से महादेव की स्थापना कर विधिवत पूजन किया। पूजा से प्रसन्न होकर भगवान रुद्र प्रकट होकर बोले, ‘रघुनंदन! जब तक यह पृथ्वी, यह संसार और यह सेतु रहेगा, तब तक मैं यहीं निवास करूंगा।’  

महादेव ने श्रीराम से कहा, ‘रघुनंदन! आपका कल्याण हो। आप देवताओं के भी आराध्य देव और सनातन पुरुष हैं। नर रूप में नारायण हैं। देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए ही आपने यह अवतार लिया था, सो अब इस अवतार का कार्य आपने पूर्ण कर दिया है। इस स्थान पर जो मनुष्य मेरा दर्शन करेगा, उसके सारे पाप नष्ट हो जाएंगे।'
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed