ट्रंप-जिनपिंग अमेरिका और चीन को ले डूबेंगे : विवाद आसानी से हल होने वाला है, तो शायद आप गलत हैं
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यदि आप सोचते हैं कि अमेरिका-चीन व्यापार विवाद आसानी से हल होने वाला है, तो शायद आप गलत हैं। आप जितना सोच सकते हैं, यह उससे भी ज्यादा गंभीर और खतरनाक है। अगर राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति शी जिनपिंग को शीघ्र इसे खत्म करने का उपाय नहीं सूझा, तो हम बताते हैं कि हम कहां जा रहे हैं-इससे वैश्वीकरण की व्यवस्था भंग होगी, जिसने पिछले सत्तर वर्षों में इतिहास के किसी भी कालखंड की तुलना में दुनिया को पहले से ज्यादा शांत और समृद्ध बनाया है।
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यदि आप सोचते हैं कि अमेरिका-चीन व्यापार विवाद आसानी से हल होने वाला है, तो शायद आप गलत हैं। आप जितना सोच सकते हैं, यह उससे भी ज्यादा गंभीर और खतरनाक है। अगर राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति शी जिनपिंग को शीघ्र इसे खत्म करने का उपाय नहीं सूझा, तो हम बताते हैं कि हम कहां जा रहे हैं-इससे वैश्वीकरण की व्यवस्था भंग होगी, जिसने पिछले सत्तर वर्षों में इतिहास के किसी भी कालखंड की तुलना में दुनिया को पहले से ज्यादा शांत और समृद्ध बनाया है।
और इसकी जगह पर हम एक डिजिटल बर्लिन की दीवार तथा दो इंटरनेट, दो प्रौद्योगिकी की दुनिया पैदा करने वाले हैं, जिनमें से एक पर चीन का वर्चस्व होगा और दूसरे पर अमेरिका का। यह बहुत ज्यादा अस्थिर और कम समृद्ध दुनिया होगी। ट्रंप और शी को सब कुछ छोड़कर बातचीत के लिए बैठना चाहिए, इससे पहले कि यह लोकलुभावन और राष्ट्रवाद के ईंधन से चालित एवं दोनों देशों में सोशल मीडिया द्वारा प्रवर्धित द्रुत ट्रेन बन जाए।
दरअसल दो चीजें बदल गई हैं-अमेरिका और चीन के व्यापार का चरित्र बदल गया, यह 'गहरा' हो गया और दोनों नेताओं ने खुद को ज्यादा मजबूत समझने की गलती करके एक-दूसरे को बाहर कर दिया। 'व्यापार के गहराने' का क्या मतलब है? पहले तीन दशकों तक अमेरिका चीन से टीशर्ट, टेनिस के जूते और खिलौने खरीदता था और चीन सोयाबीन तथा बोईंग जेटलाइनर अमेरिका से खरीदता था। और जब तक ऐसा चल रहा था, अमेरिका को इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि चीन की सरकार साम्यवादी, पूंजीवादी, अधिनायकवादी, उदारवादी या शाकाहारी है।
पिछले एक दशक में चीन मध्य आय वाला देश और अपनी प्रौद्योगिकी वाला महाशक्ति बन गया है। उसने मेड इन चाइना 2025 नामक एक योजना बनाई है। शी की योजना है कि वह टीशर्ट, टेनिस के जूते और खिलौने बेचना छोड़कर वही उच्च तकनीक वाले उपकरण बनाए और बेचे, जो अमेरिका और यूरोप बेचते हैं-स्मार्ट फोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम, 5 जी इंफ्रास्ट्रक्चर, इलेक्ट्रिक कार और रोबोट।
और एक बार जब वे पैठ बना लेते हैं, तो उन्हें बाहर निकालना मुश्किल होता है। हमें इस खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं आंकना चाहिए- हर कोई हर किसी की हर जगह जासूसी करता है-लेकिन चीन के साथ हमारा रिश्ता शीत युद्ध के समय सोवियत संघ से हमारे रिश्ते से भिन्न है। आर्थिक और प्रौद्योगिकी के मामले में रूस और हम एक दूसरे पर निर्भर नहीं थे।
जब आप 'गहरी तकनीकों' का व्यापार करते हैं, तो विश्वास पहले से ज्यादा मायने रखता है। हम परस्पर भरोसे और उच्च स्तर के साझा मूल्यों के बिना न तो किसी को गहरी तकनीक बेच सकते हैं और न खरीद सकते हैं। यही वजह है कि ट्रंप ने चीन की 5जी निर्माता कंपनी हुवावे को अमेरिका में काम करने से प्रतिबंधित कर दिया।
इस व्यापार युद्ध का दूसरा कारण यह है कि ट्रंप और शी, दोनों बहुत आगे निकल चुके हैं। पांच-छह साल पहले चीन में काम करने वाली अमेरिकी कंपनियां चीन के तमाम दबावों और तकनीकी चुरा लिए जाने के बावजूद वहां मुनाफा कमाने के चलते व्यापार करना चाह रही थीं।
लेकिन हाल के वर्षों में बहुत ज्यादा अमेरिकी कंपनियों ने शिकायत की कि चीन के बाजार में उनकी पहुंच बाधित हो रही है, जबकि उनके चीनी प्रतिस्पर्धी चीन के संरक्षित बाजार में बड़े पैमाने पर ताकत हासिल कर रहे थे और अमेरिकी कंपनियों के साथ वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। आखिर किसी को उसका खेल बिगाड़ना था और यही ट्रंप ने किया, लेकिन मूर्खतापूर्ण ढंग से!
फिर ट्रंप को शी को बताना चाहिए था कि हम और हमारे प्रशांत व यूरोपीय साझेदार एक नई व्यापार व्यवस्था पर उनके साथ गुप्त वार्ता करना चाहते हैं, जिसमें किसी को कोई घाटा नहीं होगा। उस गुप्त वार्ता में वैश्विक व्यापार मूल्य और मानक बनाम चीनी मूल्य-मानक होते। लेकिन ट्रंप ने इसे अमेरिका बनाम चीन बना दिया। जब हर चीज में 'अमेरिका फर्स्ट'की बात होगी, तो कोई क्यों हमारी मदद करेगा?
इसलिए अब हम 'जैसे को तैसा' वाले व्यापार युद्ध में शामिल हैं, जहां कोई सहयोगी नहीं है। हमने इसे राष्ट्रवादी गौरव का सवाल बना दिया है कि किसकी छवि पहले धूमिल होगी-शी की या ट्रंप की? इसलिए इसे हल करना कठिन हो गया है। बेशक ट्रंप की मूल प्रवृत्ति सही है, लेकिन वह दशकों में पैदा हुई अमेरिका-चीन व्यापार से संबंधित सभी समस्याओं को एक ही समझौते से हल करना चाहते हैं, जो बहुत मुश्किल है। दोष शी जिनपिंग का भी है।
उन्होंने 2025 तक हर नई प्रौद्योगिकी उद्योग पर हावी होने की योजना की घोषणा करके पश्चिम को डरा दिया है, जबकि पिछले 30 वर्षों के समान व्यापार प्रतिबंधों को बरकरार रखा है। उनके वार्ताकारों ने कुछ अनुचित व्यापार प्रथाओं को छोड़ने के संकेत दिए थे, फिर पलट गए।
एपीसीओ चाइना के चेयरमैन जिम मैकग्रेगर कहते हैं कि अगर मैं ट्रंप की जगह होता, तो 30 करोड़ डॉलर के चीनी निर्यात पर ताजा 10 फीसदी टैरिफ रद्द कर देता, और फिर चीन को प्रस्ताव देता कि पहले जो व्यापार व्यवस्था थी, वह इस धारणा पर आधारित थी कि अमेरिका अमीर है और चीन गरीब। पर अब चीन आर्थिक मामले में अमेरिका की बराबरी कर रहा है।
चीन को यह गरिमा प्रदान करते हुए कहना चाहिए कि हम पारस्परिकता के आधार पर इसे फिर शुरू करना चाहते हैं और हमें एक दूसरे की अर्थव्यवस्था तक समान पहुंच होनी चाहिए। अगर दोनों पक्ष इससे बेहतर उपाय नहीं ढूंढ पाते हैं, तो जैसा कि हम जानते हैं, दुनिया बदलने जा रही है।