सड़क हादसे कैसे रुकें
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सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या और उनमें होती जनहानि चिंता का विषय है। समय पर चिकित्सा सुविधा न मिलने से लोग मर रहे हैं। अभी तक सड़कों पर ट्रॉमा सेंटर नहीं बन पाए हैं और एंबुलेंस की पहुंच कम है। सुविधाभोगियों को कुछ सुविधाएं मिलती हैं, पर आम जनता के लिए सुविधाओं का अभाव है। इसका एक कारण यह है कि हमने कई समाज बना दिए हैं, जबकि दायित्वबोध पैदा करने की दिशा में कम प्रयास किए हैं। मोटर वाहन क्रांति तेज रफ्तार का पर्याय बन गई, पर विकास और तेज रफ्तार में सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाया। भारतीय सड़कों पर दुर्घटनाएं आज विश्व में सर्वाधिक हैं, जिससे जीडीपी के तीन फीसदी का नुकसान हो रहा है। यहां सालाना करीब ड़ेढ लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। सड़क सुरक्षा के लिए जागरूकता पैदा करने का काम शुरू तो हुआ है, पर आबादी की तुलना में यह प्रयास और व्यापक संसाधन व नेटवर्क विकसित करने की मांग करता है।
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कंपनियों ने वाहनों की गुणवत्ता में कुछ सुधार किए, पर अब भी 70 फीसदी दुर्घटनाएं मानवीय गलतियों के कारण हो रही हैं। ऐसे में, क्रेता को बेहतर सड़क सुरक्षा और सतर्कता का पाठ पढ़ाने का तंत्र विकसित करना होगा। वाहन निर्माता कंपनी यह जिम्मेदारी लें, तभी चीजें बदलेंगी। चालकों में दायित्वबोध पैदा करने का मामला समाज में दायित्व पैदा करने से जुड़ा है। यह शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के साथ समाज के हर वर्ग की सामाजिक उन्नति करने का मामला भी है। सामाजिक संवेदना बढ़ाने के लिए सामाजिक भेदभाव दूर करना जरूरी है। विकसित देश सड़क दुर्घटनाओं को रोकने में सफल हुए, क्योंकि वहां पूरा तंत्र समानता और विकास से जुड़ा है और मानव जीवन का मूल्य समझा गया है। जबकि हमारे यहां हिंसा और हत्या की घटनाएं बताती हैं कि मानव मूल्य के प्रति हम लापरवाह हैं।
सड़क सुरक्षा सड़क पर चलने वालों को प्रशिक्षित करने से ही संभव है। यह प्रशिक्षण पैदल चलने वालों से लेकर वाहन चलाने वालों तक-सबको देना होगा। चालकों को प्रशिक्षित करने के लिए गुणवत्तायुक्त मोटर ट्रेनिंग स्कूल जरूरी हैं। आबादी के दबाव के कारण सड़कों का निर्माण और अलग-अलग वाहनों के लिए अलग लेन बनाने का काम मुश्किल होता जा रहा है। आवारा जानवरों के सड़कों पर आ जाने तथा दोपहिया चालकों द्वारा हेलमेट के इस्तेमाल को गंभीरता से न लेने से दुर्घटनाओं में वृद्धि हो रही है। सड़क सुरक्षा के उपाय और ट्रैफिक संकेतों की उपयोगिता का पाठ ग्रामसभा स्तर तक पहुंचाना होगा।
दुर्घटनाएं रोकने के लिए एक अलग नियंत्रणकारी विभाग की जरूरत है, जो वाहनों और सड़कों की डिजाइन तथा प्रवर्तन कार्यों से लेकर चिकित्सा सुविधा का काम देखे। पाठ्यक्रमों में छठी कक्षा से यातायात नियमों और सड़क संकेतों को पढ़ाने की व्यवस्था होनी चाहिए। सड़क का इस्तेमाल करने वाले सभी लोगों के लिए प्रशिक्षण अनिवार्य करना चाहिए। ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने के पूर्व पर्याप्त प्रशिक्षण देने की दिशा में भी सुधार होना चाहिए। परिवहन कार्यालयों में गाड़ी चलाने व जांच हेतु न मैदान हैं, न जरूरी साजो-समान की व्यवस्था। सड़कों की दशा सुधारने के साथ जिम्मेदार चालक तैयार करने होंगे। सड़कों पर प्रशिक्षित कर्मचारियों की संख्या बढ़ानी होगी और क्लोज सर्किट कैमरे, रडार, नशे और गति की जांच हेतु उपकरण जरूरी हैं। तभी हम ‘सड़क सुरक्षा, जीवन रक्षा’ का बेहतर संदेश दे सकते हैं।