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राजनीति को कितना बदल पाएंगे

Tue, 22 Jan 2013 11:30 PM IST
विनीत नारायण
विनीत नारायण Updated Tue, 22 Jan 2013 11:30 PM IST
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how much will change politics

काफी ना-नुकुर करने के बाद राहुल गांधी ने आखिरकार कांग्रेस की बागडोर संभालने का औपचारिक निर्णय ले लिया। इससे स्वाभाविक रूप से कांग्रेसियों में उत्साह है। जयपुर में संपन्न कांग्रेस के चिंतन शिविर की जो बातें रेखांकित करने की हैं, उनमें यह भी है कि खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने स्वीकार किया है कि राजनीति से मध्यवर्ग की बेरुखी बढ़ती जा रही है।

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इसे हम व्यापक रूप से देखें, तो सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी हमारी व्यवस्था की धारा मोड़ सकते हैं? 1984 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई, तो अचानक ताज राजीव गांधी के सिर पर रख दिया गया था। वह युवा थे, सरल और सीधे थे, इसलिए एक उम्मीद जगी कि कुछ नया होगा। उनके भाषण लिखने वालों ने उनसे कई ऐसे बयान दिलवा दिए, जिससे देश में संदेश गया कि अब तो भ्रष्टाचार और सरकारी निकम्मापन नहीं सहा जाएगा। सब कुछ बदलेगा। बदला भी, लेकिन संचार और सूचना के क्षेत्र में। भ्रष्टाचार और प्रशासनिक व्यवस्था में अंतर नहीं आया।
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अभी हाल का उदाहरण उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का है। साइकिल से घूम-घूमकर अखिलेश यादव ने युवाओं का मन मोह लिया। लगा कि उत्तर प्रदेश में नई बयार बहेगी। पर उनकी सरकार को नौ महीने बीत चुके हैं और उनके अनुभवी पिता और सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव कम से कम चार बार सार्वजनिक मंचों से आगाह कर चुके हैं कि प्रदेश के कई मंत्री और नौकरशाह ठीक तरीके से काम नहीं कर रहे हैं।
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दरअसल, देश और प्रदेश की सरकारों में भारी घुन लग चुका है। कोई जादू की छड़ी दिखाई नहीं देती, जो इन व्यवस्थाओं को रातोंरात सुधार दे। इसलिए यह कहना कि राहुल गांधी के मोर्चा संभालते ही कांग्रेस का भविष्य उज्ज्वल हो गया, अभी लोगों के गले नहीं उतरेगा।
   
राहुल की दिक्कत यह है कि वह पार्टी के उपाध्यक्ष भले ही बन गए हों, केंद्र सरकार डॉ मनमोहन सिंह की है, जिसमें अलग-अलग राय रखने वाले मंत्रियों के अलग-अलग गुट हैं। ये गुट एकजुट होकर राहुल के आदेशों का पालन करेंगे, ऐसा नहीं लगता। फिर सहयोगी दलों के मंत्रियों के आचरण को नियंत्रित रखने की चुनौती भी उन पर होगी। ऐसे में सरकार की छवि सुधारना सरल नहीं होगा।

दूसरी तरफ, आगामी आम चुनाव में राहुल गांधी का सीधा मुकाबला नरेंद्र मोदी से होने जा रहा है, जिनकी रणनीति यह है कि जो करना है, धड़ल्ले से करो, बड़े लोगों को फायदा पहुंचाओ। यही उन्होंने पिछले चुनावों में किया भी था। जबकि राहुल का व्यक्तित्व दूसरे तरीके का है। वह जमीनी हकीकत को जानने की कोशिश कर रहे हैं और राजनीति के एक गंभीर छात्र होने का प्रमाण दे रहे हैं। इसलिए चुनावी समर में राहुल की भूमिका को लेकर आकलन अभी करना गलत होगा।
 
राहुल गांधी को अगर वास्तव में अपनी सरकार को जवाबदेह बनाना है, तो उन्हें प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार के क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे। काले धन, पुलिस व्यवस्था, न्यायिक सुधार, कठोर भ्रष्टाचार विरोधी कानून जैसे अनेक मुद्दों पर एक से बढ़कर एक आयोगों की रिपोर्ट केंद्र सरकार के दफ्तरों में धूल खा रही हैं, जिन्हें झाड़-पोंछकर फिर से पढ़ने की जरूरत है।

इन समाधानों को लागू कराने के लिए राहुल गांधी को युवाओं के बीच जाकर देशव्यापी अभियान चलाना चाहिए। युवा जागरूक बनें और प्रशासनिक व्यवस्था को जवाबदेह बनाएं, तभी जनता कांग्रेस से जुड़ेगी। उनकी मां ने जिस मध्यवर्ग को लेकर चिंता जताई है, उसकी नाराजगी के पीछे भी यही वजह है।

दरअसल मध्यवर्ग प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही चाहता है, जो उसे नहीं मिल रही। इससे वह नाराज है। पर वह यह भी जानता है कि इसके लिए किसी एक राजनीतिक दल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए उसका गुस्सा बढ़ता जा रहा है।


राहुल गांधी हों या अखिलेश यादव या फिर किसी अन्य प्रांत के मुख्यमंत्री के वारिस युवा नेता, अब सबको इन सवालों पर गंभीरता से विचार करना होगा, क्योंकि नारों से बहकने वाला मतदाता अब बहुत सजग हो गया है। इससे बेशक पारंपरिक राजनीति बदल सकती है, पर वह आम जनता से कितना जुड़ पाएगी, अभी कहना मुश्किल है।

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