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...और बगल में अफगानिस्तान

Tue, 26 Feb 2019 06:33 PM IST
kuldeep talwar कुलदीप तलवार
Updated Tue, 26 Feb 2019 06:33 PM IST
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... and Afghanistan
कुलदीप तलवार

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चंद दिन पहले युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में तैनात अमरीकी-नाटो 14,000 सैनिकों में से 7,000 को अगले छह महीने में वहां से वापस बुलवाने के अपने फैसले की घोषणा की थी। साथ ही वहां शांति बहाली के लिए पाकिस्तान से तालिबान को बातचीत के लिए राजी करने की अपील की थी। ट्रंप मंत्रिमंडल के कई सांसदों ने इसका कड़ा विरोध किया। अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी ने भी अप्रसन्नता जताई। भारत भी इससे खुश नहीं था, क्योंकि फैसला लेने से पहले ट्रंप ने भारत को भी विश्वास में नहीं लिया था, जिसका अफगानिस्तान में बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। पर ट्रंप ने अब इस फैसले पर अमल रोक दिया है।


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दरअसल ट्रंप पर चारों तरफ से दबाव पड़ रहा था। अमेरिकी सीनेट ने सैनिकों को वापस बुलवाने के ट्रंप के फैसले के खिलाफ भारी बहुमत से एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया। जिसमें कहा गया कि सीरिया व अफगानिस्तान से सेना को वापस बुलवाने पर हम मुश्किल से हाथ आई सफलता गवां सकते हैं और अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाल सकते हैं।

एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने आशंका जताई कि अगर फौज को वापस बुलवा लिया गया, तो पाकिस्तान आतंकी संगठन पड़ोसी देशों और दूसरी जगहों पर दहशत फैलाने के लिए अपनी सुरक्षित पनाहगाहों का फायदा उठाते रहेंगे। अफगान एक बार फिर आशंका जताने लगे हैं कि पाकिस्तान के सेना प्रतिष्ठान अपने वफादार आतंकियों द्वारा अफगानिस्तान पर प्रभाव बनाने में जुटे हैं। ऐसे समय में जब पाकिस्तान समर्थक आतंकी डूरंड रेखा पर ठिकाना बनाए हुए हैं, तब ये स्थिति अमेरिका के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है। इससे जंग से प्रभावित अफगानों की परेशानी भी बढ़ सकती है। पाकिस्तान समर्थक आतंकियों को पाक हर तरह से मदद और हथियार दे रहा है। तालिबान जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को बेदखल करने और सत्ता पर कब्जा जमाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। हाल ही में पाकिस्तान के बदनाम आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने  पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आत्मघाती हमला करवाया, जिसमें 40 जवान शहीद हो गए। जिसकी जैश-ए-मोहम्मद ने जिम्मेदारी ली है। काबिलेगौर है कि इस तरह का हमला पहली बार जम्मू-कश्मीर में हुआ। जबकि अफगानिस्तान में इस तरह के हमले होते ही रहते हैं। इससे पाकिस्तान की नई रणनीति का पता चलता है।

अमेरिका और तालिबान के बीच कतर में चली छह दिवसीय बैठक में तालिबान ने अमेरिकी को यकीन दिलाया था कि इस्लामिक स्टेट या अल कायदा समेत किसी भी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय दहशतगर्द संगठन को अमेरिका या किसी दूसरे देश के खिलाफ अफगानिस्तान की धरती इस्तेमाल नहीं करने देंगे। यह एक झूठा वायदा था। तालिबान जानते हैं कि अफगानिस्तान से जाने के बाद अमेरिका इस वायदे पर अमल कराने पर उन्हें मजबूर नहीं कर सकता। यह बात अलग है कि तालिबान को अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के लड़ाकुओं से तगड़ी चुनौती मिल रही है, जिसने अफगानिस्तान में अपने कदम जमा लिए हैं। वे न केवल वहां की सरकार से मोर्चा लिए हुए हैं, बल्कि तालिबान की ताकत को तोड़ने में बहुत बड़ा रोल अदा कर रहे हंै। इस समय अफगानिस्तान में आईएस के हजारों दहशतगर्द मौजूद हैं। खुफिया एजेंसियों का मानना है कि इस्लामिक स्टेट का खतरा अब भी बना हुआ है।

आम ख्याल यह है कि अमेरिका-नाटो की फौजों की वापसी होते ही अफगान सरकार और फौज के पांव उखड़ जाएंगे। जुलाई में राष्ट्रपति का चुनाव होना है, जो बेमायने हो जाएगा। सच तो यह है कि अगर अमेरिकी संकल्प कमजोर पड़ गया, तो तालिबान का रुख और कठोर हो जाएगा।

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