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कितनी राहत दे पाएंगे चिदंबरम
मधुरेंद्र सिन्हा
Updated Fri, 08 Feb 2013 12:12 AM IST
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हमारे वित्त मंत्री पी चिदंबरम के सामने एशिया की तीसरी और दुनिया की दसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को और गतिशील बनाने की चुनौती है। भारतीय अर्थव्यवस्था जहां राजस्व घाटे के जबर्दस्त संकट से जूझ रही है, वहीं जनता महंगाई की मार से। मंदी की छाया से भारत निकल तो गया है, लेकिन अब भी तेजी का दौर नहीं दिख रहा है। जीडीपी के विकास की दर पहले से अनुमानित छह प्रतिशत से अब नीचे चली गई है। इसका सबसे बड़ा असर सरकारी खजाने पर पड़ रहा है।
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सरकार के खर्च हैं कि घटने के बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं। इसका मतलब हुआ कि राजस्व घाटा और ज्यादा होगा, जो चिंताजनक है। राजस्व घाटे के बारे में आंकड़े उत्साहजनक नहीं हैं। सरकार का अनुमान है कि राजस्व घाटा जीडीपी का 5.3 प्रतिशत रहेगा, जबकि यह 5.8 प्रतिशत की ओर जाता दिख रहा है।
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बढ़ता राजस्व घाटा अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। वित्त मंत्री इसे थामने के लिए सब्सिडी घटा तो रहे हैं, पर क्या वह बजट में सरकारी खर्चों पर अंकुश लगाने की व्यवस्था करेंगे? कच्चे तेल और सोने की कीमतों में बढ़ोतरी से हमारे चालू खाते का घाटा भी बढ़ता जा रहा है, जो वित्त मंत्री की नींद उड़ाने के लिए काफी है। यह यूपीए-दो सरकार का आखिरी बजट है और उसे आम चुनाव से रूबरू भी होना है। इसलिए इस बजट में जनकल्याण के लिए काफी कुछ होना है, पर इसके लिए भी फंड चाहिए।
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लेकिन एक आम नौकरीपेशा या छोटे कारोबारी के लिए बजट इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह करों की दिशा तय करेगा। कयास लगाए जा रहे हैं कि वित्त मंत्री आर्थिक निवेश को बढ़ावा देने के लिए आयकर में राहत का ऐलान कर सकते हैं। सरकार को इसका लाभ भी होगा, क्योंकि धन की तरलता बढ़ेगी। पर यदि डायरेक्ट टैक्स कोड (प्रत्यक्ष कर संहिता) इस साल अप्रैल में लागू हो गया, तो निवेश पर करों में राहत खत्म होने लगेगा। ध्यान रहे, इसमें कई बचत योजनाओं से पैसा निकालने पर कर लगाने का भी प्रावधान है। वित्त मंत्री इस तरह की स्थिति से निपटने के लिए क्या व्यवस्था करेंगे, यह देखने की बात है।
सरकार ने इस बार बजट के पहले ही रेलों के किराये बढ़ा दिए, कई तरह के सर्विस टैक्स लागू कर दिए तथा रसोई गैस और डीजल से सब्सिडी घटाना शुरू कर दिया है। सोने के आयात पर तो सरकार ने पहले ही ड्यूटी बढ़ा दी। इससे मध्यवर्ग को भारी चोट पहुंची है और इसलिए अब लगता है कि बजट में उस पर खास प्रहार नहीं होने वाला है।
अब वह छोटी-मोटी राहत की ओर आंखें बिछाए बैठा है। मगर चुनाव को देखते हुए क्या सरकार लोकलुभावन बजट लाने की कोशिश करेगी? हो सकता है, वित्त मंत्री बड़े वोट बैंक को ललचाने के लिए कुछ ऐसी घोषणाएं करें, लेकिन ऐसे कदम अर्थव्यवस्था पर गहरी चोट पहुंचा सकते हैं। हमने जनता को लुभाने वाली कई योजनाओं का हश्र देखा है। इन पर सरकार ने अरबों रुपये फूंक दिए, लेकिन परिणाम कुछ भी नहीं रहा।
इनके अलावा ऐसी योजनाएं, जो परोक्ष रूप से जनता को अकर्मण्य बनाएं, नुकसानदेह साबित होंगी। यह उस सिद्धांत के भी विरुद्ध होगा, जिसके तहत सरकार सब्सिडी से मुक्ति पाना चाहती है। यह सच है कि सब्सिडी अर्थव्यवस्था पर बोझ बनती है, लेकिन महंगाई के बोझ तले दबी जनता को सरकार इससे कुछ समय के लिए राहत दिला सकती है।
बजट में ऐसा कुछ प्रावधान होना चाहिए, जिससे महंगाई पर अंकुश लगे और खाने-पीने के सामान सस्ते हों। भारत अनाज और खाद्य तेल में दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता देशों में है और यहां आयात करके भी कीमतों को गिरा पाना संभव नहीं है। ऐसी महत्वपूर्ण जिंसों के आयात की प्रक्रिया को बजट के जरिये आसान बनाकर वित्त मंत्री जनता का भला कर सकते हैं।
यह हैरानी की बात है कि इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बाद भी हमारे देश में आयकर देने वालों की संख्या नगण्य है और बीस लाख रुपये से ज्यादा की आय दिखाने वाले तो महज सवा चार लाख लोग ही हैं। यानी मुट्ठी भर लोगों से वसूले गए आयकर से देश चलता है। वित्त मंत्रालय ने कभी किसी बजट में टैक्स का दायरा बढ़ाने की कोशिश नहीं की। देश में लाखों लोग प्रोफेशनल होने का लाभ उठाकर टैक्स देने से बच रहे हैं।
इनमें वकील, डॉक्टर, सीए वगैरह हैं जिनकी आय अब लाखों में है। कृषि के जरिये मोटी कमाई करने वाले तो हर बजट में बच जाते हैं। अब देखना है कि चिंदबरम साहब इन्हें कर के जाल में लाने की कोशिश करते हैं या फिर बराक ओबामा के नक्शे कदम पर चलते हुए धनाढ्य लोगों को ज्यादा कर देने के लिए बाध्य करेंगे। अगर ऐसा होता है, तो यह आर्थिक सुधारों से पीछे जाने वाला कदम होगा। कर सुधार की दिशा में जीएसटी यानी गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स जैसा बड़ा काम होना भी बाकी है। यह राज्य और केंद्र सरकारों के बीच उलझा हुआ है। इस बजट में यदि इसकी घोषणा की जाती है, तो यह बहुत बड़ा कदम होगा।
आज देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिनके पास अपना मकान तो क्या, रहने के लिए ढंग की जगह भी नहीं है। मकान बनाना महंगा होता जा रहा है। वित्त मंत्री को इस दिशा में भी कदम उठाने चाहिए। उन्हें हाउसिंग सेक्टर को इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर घोषित कर देना चाहिए। इसके अलावा मकानों के लिए लिए गए कर्ज पर ब्याज में राहत की व्यवस्था करनी चाहिए।
इस सेक्टर पर कई तरह के टैक्स हैं, जिन्हें हटाने का वक्त आ गया है। हालांकि देश में अभी बुनियादी ढांचे को और मजबूत करने की जरूरत है। पूरा देश ऊर्जा की कमी से जूझ रहा है और इससे अर्थव्यवस्था को हजारों करोड़ों रुपये का सालाना घाटा हो रहा है। इसी तरह बढ़िया सड़कों की कमी के कारण भी परेशानी हो रही है। सड़क निर्माण बड़े पैमाने पर रोजगार तो देता ही है, अर्थव्यवस्था को भी सहारा देता है। वित्त मंत्री इस दिशा में क्या कदम उठाते हैं, यह दिलचस्पी का विषय है।