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सोना कैसे बदल रहा है केरल की सियासत

K. Vikram Rao के. विक्रम राव राव
Updated Sun, 26 Jul 2020 12:31 AM IST
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How is gold changing in Keralas politics
Kerala CM P Vijayan - फोटो : ANI

केरल की वामपंथी सरकार पर मार्क्सवादी चिंतन के आयात के साथ स्वर्ण तस्करी का अभियोग भी लग गया है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी काबीना के एक प्रमुख मंत्री को इस अपराध में शामिल पाया गया। सरकार-विरोधी अभियान प्रारंभ चल रहा है।


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सहयोगी घटक, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के दैनिक जनयुगम (20 जुलाई, 2020) ने प्रमुखता से टिप्पणी प्रकाशित की है कि, 'एक माकपाई काबीना मंत्री ने अपराध में खास भूमिका अदा की।' टिप्पणीकर्ता हैं माकपा के सचिव के. प्रकाशबाबू। उधर, माकपाई मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने अपने प्रमुख सचिव एम. शिवशंकरन को तत्काल निकाल दिया। वह सीधे संलिप्त पाए गए थे।

माजरा यह है कि गत छह जुलाई को तिरुवनंतपुरम हवाई अड्डे पर सीमाकर अधिकारियों ने तीस किलो सोना पकड़ा था। यह बक्सा राजधानी-स्थित संयुक्त अरब अमीरात के दूतावास के नाम था। लोगों का कहना है कि गत कुछ वर्षों से बड़ी मात्रा में दुबई से सोना चोरी-छुपे लाया जाता रहा है।

इसके मुख्य खरीदार मलयाली फिल्म उद्योग वाले हैं। शिक्षा मंत्री के.टी. जलील, जो मुस्लिम-बहुल मल्लपुरम जिले से हैं, का कहना है कि ईद के अवसर पर अरब राष्ट्र के मुसलमान खाद्य पदार्ध का तोहफा भेज रहे थे। पर ताज्जुब तो यह है कि खाद्य पदार्थ किस वक्त, कहां कैसे पीली धातु में बदल गए?

इस अजूबे की तहकीकात भारत सरकार की तीन संस्थाएं कर रही हैं: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) तथा सीबीआई। खुद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह निगरानी रख रहे हैं।

मुख्य अभियुक्त का नाम है स्वप्ना सुरेश। कम्युनिस्ट नेता के अनुसार मुख्यमंत्री के कार्यालय में उसका बेरोकटोक, बेझिझक आना-जाना है। सूरज ढलते ही उसके आवास पर पार्टियां होती हैं। इसमें, पड़ोसियों की गवाही के अनुसार, माकपा मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सदा विशेष अतिथि होते हैं।

केरल हाई कोर्ट अगले सप्ताह स्वप्ना की अग्रिम जमानत की याचिका पर निर्णय देगी। फिलहाल वह भूमिगत है। माकपा के श्रमिक संगठन सेंटर ऑफ ट्रेड यूनियंस (सीटू) के एक वरिष्ठ नेता स्वप्ना को बचाने की हिमालयी कोशिश कर रहे हैं।

केरल विधान सभा में नेता (कांग्रेस) विपक्ष रमेश चेन्नीथला जो कभी राज्य के गृह मंत्री थे, ने तो वामपंथी सरकार की खाट खड़ी कर दी। उनका कहना है, 'मुख्यमंत्री विपक्ष को अक्सर दोषी मानते हैं। हम तो उन्हें बस आईना दिखाते हैं। कोविड-19 से निपटना इस वामपंथी सरकार की महती विफलता है, और अब यह स्वर्ण तस्करी।'

इस समस्त प्रकरण की विडंबना यही है कि आज के यही मुख्यमंत्री पिनराई विजयन कभी पार्टी के विद्रोही हुआ करते थे। तब इन्होंने अत्यंत सुलभ तथा ईमानदार मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन को उखाड़ फेंकने में कोर कसर नहीं छोड़ी थी। दो बार माकपा केंद्रीय नेताओं ने विजयन की चुगली पर इस अस्सी-वर्षीय नेता का चुनावी टिकट काट दिया था।

केरल की सड़कों पर जनांदोलन हुआ। विवश होकर पार्टी हाईकमान को अच्युतानंदन को टिकट देना पड़ा। माकपा की सरकार बन गई। आज के नवउदारवादी दौर में भी अच्युतानंदन की अक्षुण्ण अवधारणा है कि कम्युनिस्ट को भ्रष्टाचारी नहीं होना चाहिए। पिनरायी विजयन सीबीआई की अदालत में चार अरब रूपये के गबन के मुकदमे में आरोपी रहे थे।

प्रकाश करात तथा सीताराम येचुरी विजयन को तरजीह देते हैं, क्योंकि सर्वहाराओं की पार्टी को उन्होंने मालामाल बना दिया है। भारी-भरकम बैंक बैलेंस, बड़े होटल और मनोरंजन रेसार्ट, कई विशाल भूखंड तथा बहुमंजिला इमारतें, दो टीवी नेटवर्क, बहुसंस्करणीय दैनिक, आलीशान निजी आवासीय बंगले आदि की अरबों की संपत्ति की स्वामिनी केरल माकपा है।

गौरतलब है कि विश्व में मतदान से कम्युनिस्ट कभी भी सत्ता पर नहीं आए। प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री थे ईएमएस नंबूदरीपाद थे, जो 1957 में केरल में जीते। अमीर ब्राह्मण जमींदार कुटुंब के वारिस नंबूदरीपाद ने सब तजकर पार्टी कार्यालय के एक कमरे में ही आधी बाहों वाली कमीज और लुंगी पहनकर पूरा जीवन बिता दिया।

उच्चकोटि के पुजारी परिवार में जन्मे वह घोर अनीश्वरवादी थे। एक और माकपाई मुख्यमंत्री हुए ई. के. नयनार जो अपने किस्म के अनूठे थे। उनकी वित्तीय ईमानदारी और मुंहफटपना लाजवाब था।

एक बार की घटना है। हम श्रमजीवी पत्रकार लोग राजधानी तिरुवनंतपुरम में मुख्यमंत्री निवास गए। उन्हें हमारे आईएफडब्ल्यूजे अधिवेशन में आमंत्रित करना था। उनके समीप ही एक युवक खड़ा था, जिसे नयनार डांट रहे थे। इतनी जोर से डांट रहे थे कि हर देखनेवाले को बुरा लगा। जब दुबारा डांटा तो हमने हल्के से प्रतिवाद किया।

पूछा कि कारण क्या है? मुख्यमंत्री बोलेः 'मुझसे रुपये मांग रहा है। मैंने कहा कि पहली तारीख को आना दे तब दे दूंगा। उस दिन मुझे मेरा वेतन मिलेगा। नहीं मान रहा। आज ही लेने की जिद कर रहा है। ये मेरा बेटा है और जेब खर्च लेता है।'

यहां प्रश्न राजनीतिक ईमानदारी और नैतिकता का है, जिसपर माकपा एकाधिकार का दावा करती है। पार्टी नेतृत्व की हरकतों से माकपा अब पहाड़ के नीचे आ गई है। क्या वह तस्करी के इस मुद्दे पर अपनी नीयत साफ रखेगी? दोषी पार्टीजन दंडित होंगे? आखिर अंतः करण की आवाज को माकपा नेतृत्व सुनेगा?

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