धूप आने दो: गजेंद्र मोक्ष पाठ की रचना कैसे हुई, संस्कृति के पन्नों से होता है खुलासा
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विस्तार
काल बड़ा बली है। यह सांप के समान प्रचंड वेग से सबको निगल जाने के लिए दौड़ता रहता है। इससे भयभीत होकर जो कोई भगवान की शरण चला जाता है, उसे प्रभु अवश्य बचा लेते हैं। राजा इंद्रद्युम्न, भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। उनके मन में भगवद्भक्ति इतनी बढ़ी कि उन्होंने राज्य त्याग दिया और तपस्या में लीन हो गए। एक दिन इंद्रद्युम्न स्नानादि करके ध्यान में बैठे थे कि तभी महर्षि अगस्त्य वहां पहुंच गए। इंद्रद्युम्न ध्यान में लीन थे, इसलिए उन्होंने अगस्त्य को प्रणाम नहीं किया। महर्षि कुपित हो गए और उन्होंने इंद्रद्युम्न को शाप दिया - “ऋषि का अपमान करने वाला यह राजा, हाथी के समान जड़बुद्धि है, इसलिए यह हाथी के रूप में जन्म ले!”
इस बीच एक अन्य ऋषि देवल, सरोवर में स्नान कर रहे थे। वहीं हूहू नाम का गंधर्व भी जल-क्रीड़ा कर रहा था। उसने देवल को रोकने का प्रयास किया, तो ऋषि ने हूहू को ग्राह (मगरमच्छ) के रूप में जन्म लेने का शाप दे डाला। अगस्त्य के शाप से इंद्रद्युम्न, हाथियों का राजा (गजेंद्र) बन गया और देवल के शाप से हूहू, सरोवर में ग्राह बनकर रहने लगा। संयोग से, एक दिन गजेंद्र, उसी सरोवर में पानी पीने पहुंच गया। पानी पीकर गजेंद्र ने जल-क्रीड़ा आरंभ कर दी। तभी गजेंद्र पीड़ा से चिंघाड़ा। जल में बैठे ग्राह (हूहू) ने गजेंद्र का पैर पकड़ लिया।
गजेंद्र ने पैर छुड़ाने का भरपूर प्रयास किया, परंतु उसे सफलता नहीं मिली। गजेंद्र छटपटाता रहा। उसके साथी गज असहाय खड़े देखते रहे। दोनों के बीच संघर्ष चलता रहा। गजेंद्र स्वयं को पानी से बाहर खींचता और ग्राह उसे भीतर खींचता। सरोवर का जल मैला हो गया। उसमें खिले कमल-दल क्षत-विक्षत हो गए। गजेंद्र का शरीर शिथिल पड़ने लगा, परंतु ग्राह जलचर था, इसलिए उसकी शक्ति में कमी नहीं आई। गजेंद्र समझ गया कि उसके प्राण संकट में हैं और यदि जल्द कोई उपाय नहीं किया गया, तो उसका जीवित बचना कठिन हो जाएगा। गजेंद्र का साहस पस्त हो चुका था। उसे जब कोई अन्य उपाय नहीं सूझा तो उसने आंखें मूंद लीं।
वह आंख बंद किए चुपचाप खड़ा था कि तभी पूर्वजन्म में इंद्रद्युम्न के रूप में की गई भक्ति और आराधना के प्रभाव से गजेंद्र के मन में भगवान की स्मृति जाग गई। उसे विश्वास हो गया कि अंत समय में भगवान का स्मरण करने से उसे मुक्ति अवश्य मिल जाएगी। हूहू ग्राह अब भी गजेंद्र को पूरी शक्ति से पानी के भीतर खींचने का प्रयत्न कर रहा था।
उसने अपने इष्ट भगवान विष्णु की शरण में जाने का निश्चय किया। ग्राह द्वारा दी जा रही पीड़ा पर ध्यान न देकर गजेंद्र सोचने लगा - “काल बड़ा बली है। यह सांप के समान बड़े प्रचंड वेग से सबको निगल जाने के लिए दौड़ता रहता है । इससे भयभीत होकर जो कोई भगवान की शरण चला जाता है, उसे प्रभु अवश्य बचा लेते हैं। वही प्रभु सबके आश्रय हैं। मैं उन्हीं की शरण ग्रहण करता हूं।”
गजेंद्र, एकाग्रचित्त से पूर्वजन्म में सीखे स्तोत्र के जप द्वारा भगवान की स्तुति करने लगा। स्तुति सुनकर भगवान विष्णु वहां प्रकट हो गए। गजेंद्र ने गरुड़ पर आरूढ़ भगवान विष्णु को देखा तो कमल का एक सुंदर पुष्प अपनी सूंड़ में लेकर ऊपर उठाया और कष्टपूर्वक कहा - “नारायण! जगद्गुरो! भगवान! आपको नमस्कार है।” गजेंद्र को इस तरह पीड़ित देखकर भगवान विष्णु, गरुड़ की पीठ से नीचे उतरे और गजेंद्र के साथ ग्राह को भी सरोवर से बाहर खींच लाए। फिर उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से ग्राह का मुंह फाड़कर गजेंद्र को मुक्त कर दिया। देवल के शाप से ग्रस्त हूहू गंधर्व भी ग्राह योनि से मुक्त हो गया। उसने भगवान विष्णु की परिक्रमा की और उनके चरणों में प्रणाम करके अपने लोक को लौट गया।
भगवान विष्णु ने गजेंद्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया। उसकी स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने कहा- “हे गजेंद्र! जो लोग ब्रह्म मुहूर्त में उठकर तुम्हारी की हुई स्तुति से मेरा स्तवन करेंगे, उन्हें मैं मृत्यु के समय निर्मल बुद्धि का दान करूंगा।”
गजेंद्र द्वारा की गई यही स्तुति ‘गजेंद्र मोक्ष पाठ’ कहलाती है। श्रीमद्भागवद पुराण के आठवें स्कंध में गजेंद्र मोक्ष की कथा का विस्तार से उल्लेख मिलता है। इस स्तोत्र में 28 श्लोक हैं। यह कथा शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सुनाई है।