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समाज : हम कैसे नजरें फेर लेना चुनते हैं, छद्म प्रतिबिंबों में सिमटी स्याह हसरतों का आईना है मेरठ हत्याकांड

Thu, 27 Mar 2025 06:57 AM IST
Advaita Kala अद्वैता काला
Updated Thu, 27 Mar 2025 06:57 AM IST
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सार
मेरठ में सौरभ की हत्या इसका भी प्रमाण है कि हम कैसे नजरें फेर लेना चुनते हैं। बेटी का स्वभाव जानते हुए भी उसे अकेले रहने की अनुमति देने वाला परिवार हो, लड़के के अपनी मर्जी से विवाह कर लेने से उससे दूरी बनाने वाले मां-बाप हों या अवैध संबंधों पर शांत रहने वाला समाज, हम सभी ने वह होने दिया, जिसे रोका जा सकता था।
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How do we choose to turn our eyes away, Meerut massacre is mirror of dark desires hidden in false reflections
साहिल शुक्ला और मुस्कान - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पूरा देश इस वक्त मेरठ में हुई एक ऐसी हत्या की खबरों की चपेट में है, जो इतनी जघन्य है कि इससे समाज के ताने-बाने पर ही सवाल उठने लगे हैं। इस संगीन अपराध ने उजागर किया है कि रोजमर्रा के भारत में सुरक्षा और शालीनता के मध्यमवर्गीय विचारों के भ्रम के पीछे आखिर छिपा क्या है? यह सच्चाई उस आदमी के अवशेषों से प्रकट हुई है, जो एक नीले प्लास्टिक के ड्रम के अंदर सीमेंट में दफन था और जिसे उस महिला द्वारा दुनिया से मिटा दिया गया, जिसने कभी उसके नाम का मंगलसूत्र पहना था।



सौरभ राजपूत के साथ जो हुआ, वह महज एक हत्या नहीं है। यह देश के लोगों में दिख रहे नैतिक पतन की यात्रा का ही एक पड़ाव है। वारदात को लेकर हुए खुलासे तो और भी अजीब हैं। 29 वर्षीय सौरभ, जो मर्चेंट नेवी के भूतपूर्व अधिकारी थे, अपनी पत्नी और बेटी का जन्मदिन मनाने के लिए लंदन से दो साल बाद घर आए थे। वहां वह एक बेकरी में काम करते थे, जहां उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। यह कोई हाई-प्रोफाइल नौकरी तो नहीं थी, लेकिन परिवार के लिए एक स्थिर आय जरूर सुनिश्चित करती है, जिसे अगर रुपयों में बदला जाए, तो यह आकर्षक भी लगती थी। हालांकि इसकी पूरी संभावना है कि सौरभ की नौकरी को इंग्लैंड में मामूली ही माना जाता होगा, लेकिन इसकी बदौलत ही भारत में उन्होंने अपने परिवार को तमाम विलासितापूर्ण चीजें उपलब्ध कराईं, मसलन, बेटी के लिए अच्छा स्कूल, पत्नी और पत्नी के परिवार के लिए नवीनतम आईफोन, एक अच्छी जगह पर किराये का एक आवास।


सौरभ की घर वापसी तक सब अच्छा चल रहा था। एक वायरल वीडियो में पूरा परिवार नाचता और जश्न मनाता दिख रहा है। सौरभ को भनक भी नहीं थी कि सिर्फ तीन दिन बाद उसकी हत्या होने वाली है। लेकिन हम आजकल ऐसी ही दुनिया में रह रहे हैं। सोशल मीडिया के प्रतिबिंब रोजमर्रा की जिंदगी की हकीकत को छिपाते हैं। जिंदगी को संपादित कर हम रील्स बनाते हैं, और इसे लोगों की ईर्ष्या के लिए पेश कर देते हैं। उस रील में भी ऐसा परिवार था, जिससे सकारात्मक अर्थों में ईर्ष्या होनी चाहिए थी, लेकिन आश्चर्यजनक ढंग से तीन दिनों के भीतर सब कुछ बदल गया। अपनी हत्या की रात सौरभ ने अपने पसंदीदा कोफ्ते खाए, जिसमें मुस्कान ने नींद की दवा मिला दी थी। उसे गहरी बेहोशी में देख, मुस्कान ने अपने प्रेमी साहिल को बुला लिया। साहिल उसके स्कूली दिनों का साथी था और 2019 में एक क्लास रीयूनियन के दौरान वे फिर से मिले थे। समय के साथ उनकी बातचीत बढ़ती गई, प्रेम संबंध बन गए, जिसका पता सौरभ को चला। उसने तलाक के लिए अर्जी दी थी, लेकिन पहले से एक बेटी होने के कारण परिवार और मुस्कान के वफादारी के वादों की वजह से उसने मन बदल लिया।

यह बहुत घातक गलती थी, लेकिन भारत में यह बहुत आम है, जहां तलाक को विषाक्त रिश्ते में रहने से भी बड़ा पाप माना जाता है। इसके बाद भी मुस्कान के साहिल के साथ संबंध खत्म तो नहीं हुए, लेकिन अगले कुछ वर्षों तक वह वैवाहिक वफादारी का दिखावा करती रही। इससे सौरभ को दो साल के लिए इंग्लैंड में रहने का आश्वासन मिला, तो मुस्कान को अपने जुनून-साहिल और अब ड्रग्स में लिप्त होने की आजादी भी मिली। इसके बाद, दोनों प्रेमी नशे की लत और एक-दूसरे के लिए अतृप्त भूख से प्रेरित एक लापरवाह प्रेम-संबंध में डूब गए, जो एक किस्म के रहस्यवाद पर भी टिका हुआ था। एक विकृत कल्पना, जिसमें उनका एकसाथ आना तभी मुमकिन होगा, जब वे सौरभ का ‘वध’ कर देंगे और तीन मार्च की रात को उन्होंने यही किया। जब सौरभ नींद में था, तब मुस्कान उसके ऊपर झुकी और उसके दिल में चाकू घोंप दिया। उसके बाद साहिल ने उसका सिर धड़ से अलग किया। यह कोई जुनूनी अपराध नहीं था। हत्या में इस्तेमाल चाकू पहले से ही खरीदा गया था, साथ ही प्लास्टिक का ड्रम भी, जिसमें उसके शरीर के टुकड़े छिपाए गए। इसके बाद साहिल का जन्मदिन मनाने और अपने नशे की जरूरतों को पूरा करने के लिए ये दोनों छुट्टियां मनाने हिमाचल निकल गए। एक बार फिर, सोशल मीडिया की रील्स में इस जोड़े को अपराध बोध की छाया से मुक्त जिंदगी का भरपूर आनंद लेते हुए दिखाया गया है।

मुस्कान और साहिल केवल प्रेम में ही नहीं, नैतिक पतन में भी भागीदार थे। प्लास्टिक का वह ड्रम दरअसल, हमारे समाज में व्याप्त गहरी सड़ांध का प्रतीक है, जिन्हें हम उन मूल्यों के सीमेंट से ढक देते हैं, जिन्हें हम तेजी से त्यागते जा रहे हैं। एक वक्त था, जब भारत में नैतिकता सरल होने के बावजूद दम घोंटने वाली थी, जिसमें परिवार और सामाजिक दबाव व्यक्तित्वों का गला घोंट देते थे। दूसरी तरफ, आज हम दूसरी चरम सीमा पर पहुंच चुके हैं, जहां जिंदगी नैतिकता से रहित विकल्पों का नतीजा बन गई है। ऐसे विकल्प, जहां सिर्फ अपनी खुशी ही देखी जाती है और इसकी कोई परवाह नहीं की जाती कि इसका सामूहिक या अपने करीबियों पर क्या असर पड़ेगा।

मुस्कान की छह साल की बेटी पीहू, इसकी मिसाल है, जिसने अपने पिता को खो दिया। यह पूरा प्रकरण इसका भी प्रमाण है कि हम कैसे नजरें फेर लेना चुनते हैं। कैसे माता-पिता अपनी बेटी का स्वभाव जानते हुए भी पति के विदेश जाने के बाद एक ही शहर में रहते हुए उसे अलग रहने की अनुमति देते हैं? एक माता-पिता ने अपने बेटे से सिर्फ इसलिए दूरी बना ली, क्योंकि उसने ऐसी दुल्हन चुनी, जिसे वे स्वीकार नहीं करते थे और नतीजा यह हुआ कि वह एक कुटिल महिला की चालों के सामने कमजोर पड़ गया? समाज ने अवैध संबंधों को देखते हुए भी पति को सूचित करना जरूरी नहीं समझा? हम सभी ने इसे होने दिया, क्योंकि दौड़ती हुई जिंदगी में अपने आसपास देखने की तुलना में दूर देखना आसान होता है। हमने चुपचाप मान लिया कि कलियुग है, कुछ भी हो सकता है। लेकिन ऐसा होने की जरूरत नहीं थी। इस अपराध का मूल कारण ड्रग्स नहीं, बल्कि हम हैं।  

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